आध्यात्मिक रूप से हों परिपक्व

हर सनातनी को स्वयं को अध्यात्म की ओर प्रवृत्त करना चाहिए। इसके लिए ध्यान, योग, प्रार्थना, स्वाध्याय (अध्ययन) और सेवा जैसे अभ्यासों को अपने जीवन में शामिल करना चाहिए। अहंकार से बचना चाहिए। वर्तमान में जीना चाहिए। प्रकृति से जुड़ना चाहिए और दूसरों के प्रति प्रेम व करुणा के भाव रखने चाहिए, क्योंकि यह एक व्यक्तिगत यात्रा है, जो आत्म-खोज और आंतरिक-शांति की ओर ले जाती है।
यह मत सोचें कि इस यात्रा में आपको कुछ खोना है, बल्कि यह अपने वास्तविक स्वरूप को जानने और हर हाल में संतुष्ट रहने का मार्ग है। इसलिये आध्यात्मिक परिपक्वता की ओर बढ़ने के लिए कुछ बातों का ध्यान रखें तो अवश्य ही सफलता मिलेगी। आप दूसरों को उन्हीं के स्वभाव के साथ स्वीकारते हों, तो समझ लें कि आप आध्यात्मिक मार्ग की ओर बढ़ रहे हैं। जब आप समझते हैं कि हर किसी का दृष्टिकोण उनके लिए सही है, तो आप आध्यात्मिक पथ पर अग्रसर हो रहे हैं।
अपेक्षारहित सेवा से संबंध बनते हैं संकट-मुक्त
जब आप घटनाओं और हो रहे वक्त को स्वीकार करते हैं, तो आपमें अध्यात्म भाव हैं। जब आप आपके सारे संबंधों से अपेक्षाओं को समाप्त करके सिर्फ सेवा के भाव से संबंधों का ध्यान रखते हैं, तो आप का आध्यात्मिक पथ संकट मुक्त है। जब आप यह जानकर सारे कर्म करते हैं कि आप जो भी कर रहे हैं, वो दूसरों के लिए न होकर स्वयं के लिए कर रहे हैं, तो आप आध्यात्मिक हैं।
जब आप दुनिया को स्वयं के महत्त्व के बारे में जानकारी देने की चेष्टा नहीं करते हैं, तो आप अपने लक्ष्य के मार्ग पर अग्रसर हो रहे हैं। अगर आपको स्वयं पर भरोसा रखने के लिए और आत्मविश्वास को बढ़ाने के लिए दुनिया के लोगों के वचनों की या सराहना की ज़रूरत नहीं है तो आप परम चेतना के समीप जाने के योग्य हैं। अगर आपने भेदभाव करना बंद कर दिया है, तो आप मुक्ति के मार्ग पर हैं।
भौतिक निर्भरता से मुक्त जीवन में ईश्वर की निकटता
अगर आपकी प्रसन्नता के लिए आप सिर्फ स्वयं पर निर्भर हैं, दुनिया पर नहीं, तो आप आध्यात्मिक हैं। जब आप आपकी निजी ज़रूरतों और इच्छाओं के बीच अंतर समझकर अपनी सारी इच्छाओं का त्याग कर पा रहे हैं, तो आप अलौकिक जगत में जाने के योग्य हैं। अगर आपकी खुशियां या आनंद भौतिक, पारिवारिक और सामाजिक रूप से निर्भर नहीं है, तो आप प्रभु के प्रिय हैं।

अपने जीवन में उपरोक्त बिंदुओं को अपनाकर कर्म-भाव के आधार पर आप अध्यात्म जगत में प्रवेश पा सकते हैं। यदि आप पूजा-पाठ या भक्ति में अधिक समय न लगा सकते हों तो कम से कम दिव्य या सद् कर्म करके उस परम सत्ता के अलौकिक जगत में स्थान प्राप्त कर सकते हैं।
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