भारत के युवा निवेशकों को अपनी भावनाओं को नियंत्रण में रखना होगा। वो इस गिरावट से घबराकर इतने ज्यादा निराश न हों कि उन्हें लगने लगे कि सब कुछ खत्म हो गया। बाजार का अपना एक चक्र होता है और इस चक्र का गणितीय नियम यह भी है कि जो बाजार जितने नीचे धंसेगा, उतने ही ऊपर उछलेगा। इसलिए हिम्मत रखें। वैसे भी शेयर बाजार में निवेश करने के पहले का सबसे जरूरी पाठ यही होता है कि यहां घबराकर और जल्दबाजी में कोई निर्णय न लें। क्योंकि हर गिरावट के बाद अनिवार्य रूप से उछाल आता ही है। भले अनुमान के कुछ पहले आ जाए या कुछ ज्यादा ही डराए।
जब किसी हफ्ते में शेयर बाजार की शुरुआत ब्लैक मंडे और अंत ब्लैक फ्राइडे से हो तो बाजार हाहाकार का अंदाजा लगाया जा सकता है। भारतीय अर्थव्यवस्था के सबसे चमकते हुए पिछले तीन दशकों में शेयर बाजार के लिए यह सबसे डरावना समय है। पिछले 29 सालों में शेयर बाजार में पूंजी के नजरिये से इतनी बड़ी गिरावट पहले कभी नहीं देखी गयी।
पांच महीनों में निवेशकों की 90 लाख करोड़ संपत्ति घटी
इस साल की शुरुआत से यानी 1 जनवरी 2025 से 28 फरवरी 2025 तक अकेले नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (एनएसई) का निफ्टी-50 इंडेक्स करीब 15 फीसदी तक नीचे गिर गया है। सितंबर 2024 से 28 फरवरी 2025 तक निवेशकों की लगभग 1 ट्रिलियन डॉलर संपत्ति या रुपये में समझें तो 85 लाख करोड़ रुपये डूब गये हैं।
अकेले फरवरी 2025 में ही सेंसेक्स 4000 अंकों से भी नीचे गिर चुका है, अकेले फरवरी के 28 दिनों में ही बाजार 5 फीसदी से ज्यादा गिरा है, इस अवधि में बीएसई (बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज) में सूचीबद्ध कंपनियों का कुल बाजार पूंजीकरण 40 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा घट गया है। अकेले 28 फरवरी 2025 को ही सेंसेक्स 1414 अंकों की डुबकी लगाकर 73,198 में और निफ्टी 420 अंक गिरकर 22125 अंकों में बंद हुआ।
इस एक अकेले दिन की गिरावट से बीएसई में सूचीबद्ध कंपनियों का बाजार पूंजीकरण 9.61 लाख करोड़ रुपये घटकर 383.49 लाख करोड़ रुपये रह गया। 30 सितंबर 2024 को बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज में लिस्टेड कंपनियों का मार्केट कैप 474 लाख करोड़ रुपए था जबकि 28 फरवरी को यह घटकर 383.49 लाख करोड़ रुपए रह गया यानी 5 महीनों में निवेशकों की पूंजी 90 लाख करोड़ रुपए तक घट गई।
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भारतीय बाजार की गिरावट से युवा निराश
इस गिरावट का बाजार में इतना व्यापक असर पड़ा है कि हर तरफ निराशा का गहन कुहासा छा गया है। ऐसा होना स्वाभाविक भी है, क्योंकि भारतीय अर्थव्यवस्था पिछले 3 दशकों से लगातार जिस मजबूती से आगे बढ़ रही थी, उसे पहली बार इतना जबर्दस्त धक्का लगा है, निवेशकों का मनोविज्ञान बहुत गहरे तक हिल गया है।
हालांकि बाजार में निवेशकों की उम्र का कोई सटीक आंकड़ा तो उपलब्ध नहीं है, लेकिन हम सब जानते हैं कि पिछले तीन दशकों में भारतीय अर्थव्यवस्था जिस युवा आवेग से आगे बढ़ी थी, उसमें सबसे ज्यादा भागीदारी युवाओं की ही रही है। सिर्फ अर्थव्यवस्था ही नहीं बल्कि मौजूदा भारतीय समाज भी एक युवा समाज के तौरपर ही जाना जाता है।
इसलिए इसमें कोई संदेह नहीं है कि पिछले पांच महीनों में यानी सितंबर 2024 से 28 फरवरी 2025 तक लगातार शेयर बाजार में जो रह-रहकर गिरावट के भूचाल आये हैं, उनसे सबसे ज्यादा प्रभावित भारत के युवा निवेशक ही हुए हैं। दुनिया की आर्थिक मामलों में सबसे सटीक रिपोर्टिंग करने वाली न्यूज एजेंसी रायटर ने लिखा है कि भारत के शेयर बाजार में ऐसी भारी गिरावट पिछले 29 सालों में कभी नहीं देखी गई।
भारतीय बाजार में भारी गिरावट, वैश्विक बाजार स्थिर
जब महज कुछ महीनों के भीतर निवेशकों के 85 से 90 लाख करोड़ रुपये स्वाहा हो गये हों। हैरानी की बात यह है कि जितनी भारी गिरावट भारत के शेयर बाजार में देखी गई है, वैसी गिरावट ठीक इसी समय दुनिया में कहीं और नहीं देखी गयी।
पिछले पांच महीनों में अगर दुनिया के शेयर बाजार को देखें तो अमेरिकी का डाओ जोंस इंडेक्स 30 सितंबर 2024 को 42,330 के स्तर पर था और 27 फरवरी 2025 को 43,240 के स्तर पर बंद हुआ यानी इन करीब 5 महीनों में यह गिरा नहीं बल्कि 910 अंक (2.14 प्रतिशत) चढ़ा है। इसी तरह चीन का बाजार शंघाई कंपोजिट 30 सितंबर 2024 को 3336 के स्तर पर था और 27 फरवरी 2025 को यह 3388 के स्तर पर बंद हुआ।
मतलब यह कि पिछले 5 महीनों में ये 52 अंक (1.55 प्रतिशत) चढ़ा है। हांगकांग का हैंगसेंग इंडेक्स 30 सितंबर 2024 को 21,133 अंकों पर था और 27 फरवरी 2025 को यह 23718 के स्तर पर बंद हुआ। मतलब यह कि यह 2585 पॉइंट (12.23 प्रतिशत) चढ़ा है।
वैश्विक बाजार बढ़े, भारतीय बाजार ने किया निराश
जर्मनी का स्टॉक मार्केट डीएएक्स 30 सितंबर 2024 को 19324 के स्तर पर था और 27 फरवरी 2025 को यह 22378 के स्तर पर बंद हुआ। कहने का मतलब पिछले 5 महीनों में यह 3024 अंक (15.8 प्रतिशत) चढ़ा है।
वहीं लंदन स्टॉक एक्सचेंज का एफटीएसई फाइनेंशियल टाईम्स स्टॉक एक्सचेंज़-100 इंडेक्स जहां 30 सितंबर 2024 को 8,236 के स्तर पर था,वह 27 फरवरी 2025 को बढ़कर 8,756 के स्तर पर बंद हुआ यानी पिछले पांच महीनों में यह 520 पॉइंट (6.31 प्रतिशत) चढ़ा है। जबकि ठीक इसी समय भारतीय शेयर बाजार ने इतिहास का सबसे बुरा परफोर्म किया है।
अब के पहले इतना बुरा परफोर्म भारतीय बाजार ने 1995 में ही किया था,जब निफ्टी ने सितंबर 1995 से अप्रैल 1996 तक लगातार आठ महीने महीनों तक करीब 31 फीसदी गिरा था। अगर भारत के शेयर बाजार की तात्कालिक गिरावट की कोई सबसे बड़ी वजह है तो वह डोनल्ड ट्रंप की अनिश्चित और अचंभे से भरी टैरिफ धमकियां हैं।
धैर्य रखें, बाजार की अस्थिरता स्थायी नहीं होती
राष्ट्रपति ट्रंप पिछले एक महीने के अपने कार्यकाल में तीन बार करीब-करीब धमकी देने के स्तर पर यह दोहरा चुके हैं कि टैरिफ के मामले में अमेरिका जैसे को तैसा रवैय्या अपनायेगा। मतलब भारत जितना टैरिफ अमेरिकी आयात पर लगाएगा, उतना ही टैक्स अमेरिका भारतीय आयात पर लगाएगा। इस धमकी के कारण भारत के शेयर बाजार रह-रहकर धड़ाम-धड़ाम गिर रहे हैं।
लेकिन दुनिया के शेयर बाजारों का इतिहास गवाह है कि कोई भी बाजार कितनी बार ही पताल यात्रा न कर लें, लेकिन अंत में उसे ऊपर उठना ही होता है, यही शेयर बाजार का स्थाई चरित्र है। इसलिए युवा निवेशकों को धैर्य नहीं खोना चाहिए।
इसमें कोई दो राय नहीं है कि पिछले दो दशकों से भारत के युवा निवेशक ही शेयर बाजार के कर्ताधर्ता रहे हैं, वही इसकी अगुवाई करते रहे हैं, इसलिए कहर भी उन्हीं के कंधों पर सबसे ज्यादा टूटा है। लेकिन ये भयानक, डरावने और काले दिन भी गुजर जाएंगे, जैसे अतीत में कई बार ऐसे स्याह दिन आते जाते रहे हैं। इसलिए भारत के युवा निवेशकों को अपनी भावनाओं को नियंत्रण में रखना होगा।
निवेश में धैर्य और डायवर्सिफिकेशन की जरूरत
वो इस गिरावट से घबराकर इतने ज्यादा निराश न हों कि उन्हें लगने लगे कि सब कुछ खत्म हो गया। बाजार का अपना एक पा होता है और इस पा का गणितीय नियम यह भी है कि जो बाजार जितने नीचे धंसेगा, उतने ही ऊपर उछलेगा। इसलिए हिम्मत रखें। वैसे भी शेयर बाजार में निवेश करने के पहले का सबसे जरूरी पाठ यही होता है कि यहां घबराकर और जल्दबाजी में कोई निर्णय न लें।
क्योंकि हर गिरावट के बाद अनिवार्य रूप से उछाल आता ही है। भले अनुमान के कुछ पहले आ जाए या कुछ ज्यादा ही डराए। युवा निवेशकों के लिए यह ऐतिहासिक गिरावट एक बड़ा सबक और भविष्य के लिए ट्रेनिंग भी हो सकती है कि वे बाजार में निवेश करने के पहले निवेश के डायवर्सिफिकेशन मॉडल की ताकत को समझें।
मसलन शेयर बाजार में एक ही कैटेगिरी के शेयर में कभी भी पूरा दांव लगाना अक्लमंदी नहीं होती। निवेश के लिए कई तरह के कैप चुनें। म्युअल फंड, गोल्ड ईटीएफ, बोंड्स और रियल एस्टेट जैसे विकल्पों की भी अनदेखी न करें। एसआईपी यानी सिस्टमेटिक इन्वेस्टमेंट प्लान में भरोसा जताएं। निवेश के एक बड़े हिस्से का रिस्क लेने के बावजूद कुछ पैसे एसआईपी पर भी लगाएं, इसका जोखिम हमेशा कम होता है।
स्मार्ट निवेश: इमरजेंसी फंड और रिसर्च का महत्व
एकमुश्त का जोखिम हमेशा आर-पार का होता है। जबकि एसआईपी का गणित ही नहीं विज्ञान भी इसके उलट है। यह भी याद रखें कि इमरजेंसी फंड कभी भी शेयर बाजार में न लगाएं। अगर बाजार के मौजूदा भूचाल में कुछ युवा ऐसा करके नुकसान खा चुके हैं तो उन्हें इस नुकसान को भविष्य के सबक के रूप में याद रखना चाहिए और इमरजेंसी फंड को शेयर बाजार में कभी नहीं लगाना चाहिए।
शेयर बाजार के लिए वही पैसा निवेश के खातिर सबसे उपयुक्त होता है, जो कम से कम तीन से पांच साल तक आपके पास एक अतिरिक्त पूंजी के रूप में मौजूद हो, उसके बिना कोई काम न रुक रहा हो। हालांकि यह बात बार बार दोहरायी जाती है, फिर भी इसे याद रखना चाहिए कि शेयर बाजार में निवेश करने के पहले फंडामेंटल और टेक्निकल रिसर्च कर लेनी चाहिए।
सिर्फ ट्रेंड देखकर निवेश करना अपने साथ धोखा है। गंभीर निवेशक बनने के लिए कंपनियों की बैलेंस शीट, उनके फ्यूचरिस्टक प्लान और उस क्षेत्र विशेष की विकास दर को मौजूदा और अनुमानित भविष्य के साथ तालमेल बिठाकर ही निवेश की दिशा में आगे बढ़ें।-(लोकमित्र गौतम)
