चितिरई उत्सव : परंपरा, प्रेम और लोक-जीवन का उल्लास

मीनाक्षी अम्मन मंदिर का चितिरई उत्सव इस वर्ष 18 अप्रैल से 2 मई तक आयोजित किया जा रहा है।

दक्षिण भारत की सांस्कृतिक आत्मा को यदि किसी एक उत्सव में सघन रूप में देखा जा सकता है, तो वह मीनाक्षी अम्मन मंदिर का चितिरई उत्सव है। यह पर्व धार्मिक, इतिहास, लोकविश्वास, सामाजिक समन्वय और आध्यात्मिक संस्कृति का महाकुंभ होता है। मदुरै में विशेष रूप से मनाया जाने वाला यह उत्सव हर साल लाखों लोगों को आकर्षित करता है। इसमें देवता भी मनुष्यता के रंग में रंग जाते हैं। किसी संस्कृति का यही सबसे प्रबलतम पक्ष होता है, जिसके रंग में रंगने की कामना देवता भी करते हैं।
चितिरई उत्सव दो प्रमुख कथाओं से जुड़ा है- पहली कथा देवी मीनाक्षी से जुड़ी है।

देवी मीनाक्षी मदुरै की राजकुमारी थीं। शक्ति, सौंदर्य और शासन कौशल के प्रतीक भगवान शिव सुंदरेश्वर से उनका विवाह सम्पन्न हुआ। यह विवाह शक्ति और शिव (प्रकृति और चेतना) का मिलन भी था। दूसरी कथा भगवान विष्णु (अलगर) से जुड़ी है। माना जाता है कि मीनाक्षी के भाई के रूप में अलगर विवाह में शामिल होने आते हैं, जो देर से पहुंचते हैं, जिस कारण वैगई नदी के किनारे ही रुक जाते हैं। यह प्रसंग इस बात का प्रतीक है कि जीवन में समय, संबंध और भाव तीनों का संतुलन कितना महत्वपूर्ण है। चितिरई उत्सव की आत्मा है- इसका ध्वजारोहण, जिसे कोडी एट्रम कहा जाता है।

रथ यात्रा और अलगर का वैगई नदी में उतरना विशेष परंपरा

चितिरई उत्सव का प्रारंभ मीनाक्षी मंदिर में ध्वजारोहण से होता है। यह इस बात का संकेत होता है कि अब मदुरै में देवी का राज स्थापित हो चुका है। पूरा शहर पवित्र अनुष्ठान में प्रवेश कर चुका है। उत्सव का दूसरा प्रमुख हिस्सा मीनाक्षी तिरुकल्याणम् होता है। उत्सव के इस चरण में वैदिक विधि-विधान के साथ देवी मीनाक्षी और भगवान सुंदरेश्वर विवाह के बंधन में बंधते हैं। हजारों लोगों के समक्ष यह विवाह संपन्न होता है। इस विवाह समारोह में श्रद्धालु अपनी बेटी के विवाह की कल्पना करते हैं। इससे ज्ञात होता है कि भारतीय संस्कृति में देवी अपनी ही कन्या सम होती है। उत्सव का तीसरा चरण रथ-यात्रा (थेरु उत्सव) होती है।

विशाल सजे हुए रथों में सवार होकर देवी-देवताओं की मूर्तियां पूरे शहर का भ्रमण करती हैं। उत्सव का आखिरी और संवेदनशील चरण अलगर का वैगई नदी में उतरना होता है। यह चितिरई उत्सव की अनोखी परंपरा है। वास्तव में ये क्षण मनुष्य के अधूरेपन, अनुष्ठान में देर से पहुंचने और इस संबंधों में बने रहने का प्रतीक है। चितिरई उत्सव समाज को एकता के धागे में पिरोने का सांस्कृतिक उत्सव है। यह पूरे मदुरै शहर का उत्सव होता है। इसमें समाज का हर तबका पूरे उत्साह के साथ शामिल होता है। मीनाक्षी एक देवी, एक शासक और एक योद्धा के रूप में पूजी जाती हैं। यह संदेश आज भी प्रासंगिक है कि विवाह के बाद भी स्त्रियों की निजता और उनकी शक्ति का सामर्थ्य बना रहता है।

-धीरज बसाक

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