कांग्रेस की कमान : राहुल से प्रियंका की ओर ?
कांग्रेस – देश की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी – आज एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है, जहाँ उसका नेतृत्व एक बार फिर बहस का केंद्र बन गया है। प्रश्न यह है कि, क्या राहुल गांधी को कांग्रेस की बागडोर अपनी बहन प्रियंका गांधी वाड्रा के हाथों सौंप देनी चाहिए? यह केवल परिवार की आंतरिक राजनीति का मसला नहीं, बल्कि समकालीन भारतीय लोकतंत्र में परिवारवाद, नेतृत्व क्षमता, चुनावी रणनीति और पार्टी के अस्तित्व की लड़ाई का प्रतिबिंब है। 2026 में सिर पर खड़े कई राज्यों के विधानसभा चुनावों से पहले ही कांग्रेस अपनी दिशा तय कर ले, तो यह पार्टी के लिए बेहतर होगा।
जगज़ाहिर है कि राहुल गांधी का नेतृत्व एक दोधारी तलवार जैसा रहा है। एक ओर, उनकी भारत जोड़ो यात्रा और न्याय यात्रा ने पार्टी को जनता से जोड़ा, सामाजिक न्याय के मुद्दों को उभारा और युवाओं में उम्मीद जगाई। 2026 की शुरुआत में, लोकसभा में विपक्ष के नेता के रूप में, उन्होंने चीन सीमा विवाद और आर्थिक असमानता जैसे मुद्दों पर सरकार को घेरा है। उनकी स्पष्टवादिता और नैतिक दृष्टिकोण ने कांग्रेस को एक वैकल्पिक आवाज दी है। लेकिन दूसरी ओर, उनके खाते में चुनावी असफलताओं का जुड़ते जाना यह दर्शाता है कि वे चर्चा में बने रहने के हथकंडों के बावजूद वोटर का भरोसा जीतने में विफल रहे हैं।
राहुल गांधी की चुनावी हार और आलोचनाएँ
2014 और 2019 के लोकसभा चुनावों में हार, साथ ही कई राज्य चुनावों में खराब प्रदर्शन, ने उन्हें असफल नेता का तमगा दिया। उनकी देश में अनियमित उपस्थिति और नियमित विदेश यात्राएँ पार्टी की छवि को नुकसान पहुँचाने वाली साबित हुई हैं। हाल ही में, असम चुनाव समिति की अध्यक्षता प्रियंका को सौंपने को राहुल की असुरक्षा के रूप में देखा जा रहा है। हार की जिम्मेदारी शिफ्ट करने की अग्रिम चालाकी!
सयाने प्रियंका गांधी वाड्रा के उदय को कांग्रेस के लिए एक नई उम्मीद की तरह देख रहे हैं। 2019 से महासचिव के रूप में, उन्होंने उत्तर प्रदेश में सक्रिय भूमिका निभाई। किसान आंदोलन और महिलाओं के मुद्दों पर वे मुखर रहीं। उनकी करिश्माई शैली, इंदिरा गांधी से तुलना और जनता से सीधा संवाद उन्हें लोकप्रिय बनाता है। 2024 में वायनाड से लोकसभा सांसद चुनी गईं प्रियंका ने संसद में राहुल का बचाव किया और लोकतंत्र की रक्षा पर जोर दिया। उनके पति रॉबर्ट वाड्रा ने हाल ही में उन्हें प्रधानमंत्री पद का चेहरा बनाने की वकालत की, जो पार्टी कार्यकर्ताओं की भावना के अनुरूप है। लेकिन क्या प्रियंका तैयार हैं?
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प्रियंका का राजनीतिक अनुभव और महिला अपील
उनका राजनीतिक अनुभव सीमित है। इसके अलावा, उनके नेतृत्व को भी तो परिवारवाद का वही ग्रहण लगा हुआ है, जिसका शिकार राहुल गांधी रहे हैं! फिर भी, प्रियंका की महिला अपील और ग्रामीण जुड़ाव कांग्रेस को नए वोटरों, खासकर महिलाओं और युवाओं, तक पहुँचा सकते हैं। दरअसल, यह बहस भारतीय लोकतंत्र के एक बड़े पहलू – परिवारवाद – को छूती है। परिवारवाद ने कांग्रेस को एकजुट रखा। लेकिन योग्यता-आधारित नेतृत्व को रोका भी। माना कि वर्तमान में मल्लिकार्जुन खड़गे जैसे गैर-गांधी नेता पार्टी के अध्यक्ष हैं। लेकिन असली शक्ति तो परिवार में ही दिखती है न?
अगर राहुल पीछे हटते हैं, तो क्या प्रियंका पार्टी को पुनर्जीवित कर पाएँगी? या यह भाई-बहन का आंतरिक संघर्ष साबित होगा? हाल की अफवाहें बताती हैं कि राहुल और प्रियंका के बीच दरार है। क्योंकि पुराने नेता प्रियंका को तरजीह दे रहे हैं।अंततः याद रहे कि, लोकतंत्र में बदलाव जरूरी है, लेकिन जल्दबाजी घातक! राहुल गांधी की वैचारिक प्रतिबद्धता पार्टी की मूल विचारधारा को मजबूत अवश्य करती है। लेकिन अगर चुनावी असफलताएँ जारी रहीं, तो प्रियंका का नेतृत्व एक विकल्प हो सकता है। हाँ, निर्णय कांग्रेस कार्यकर्ताओं का होना चाहिए, न कि परिवार का। यह न केवल कांग्रेस, बल्कि भारत के बहुदलीय लोकतंत्र की सेहत के लिए भी अहम है। अत कांग्रेस अगर पुन उभरना चाहती है, तो उसे परिवार से आगे सोचना होगा – एक समावेशी, योग्यता-आधारित नेतृत्व की ओर!
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