हवाओं का भेदभाव
एक ठंडी सर्द रात में चूल्हे के सामने बैठी एक नन्ही बच्ची ने अपनी माँ से एक मासूम-सा सवाल किया- माँ, जब चूल्हे की आग कम हो जाती है तो हम फूँक मारकर उसे तेज कर देते हैं, लेकिन दीये पर फूंक मारें तो वो बुझ क्यों जाता है? हवा भेदभाव करती है क्या? बच्ची का सवाल छोटा था लेकिन उसके भीतर समाज का पूरा सच धधक रहा था। व्यवस्था तो ऐसी होनी चाहिये जिससे हवा भी चलती रहे और दीया भी जलता रहे।
दरअसल, हवा की यह दोहरी भूमिका हमारे समाज जैसी ही है। एक ओर चूल्हे हैं जो हवा मिलते ही भभक उठते हैं और दूसरी ओर मामूली दीपक हैं जो हल्की-सी हवा से भी फुर्र होकर अंधेरे में बदल जाता है। कहीं हवा मौका बन जाती है और कहीं जोखिम बन जाती है। पर आजकल हवा भी खराब हो गई है। गाँव की हवा में कभी मिट्टी की खुशबू होती थी पर अब तो चिड़ियाँ भी दिशाओं से पूछती हैं कि किधर उड़ें कि साँस बची रहे?
आज राजनीति से लेकर परिवार तक हर कोई हवा का रुख देखकर हवा में उड़ रहा है, मौका मिलते ही हवा बदल लेता है और जब सच सामने आता है तो आम आदमी की हवा निकल चुकी होती है। नेता हों या अफसर, सब अपनी-अपनी हवा बनाए रखने में जुटे हैं जबकि आम आदमी की जिंदगी की तो हवा निकली पड़ी है। जो बचे हैं उनकी हवा खराब हवा ने निकाल रखी है।
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प्रदूषण और हमारे कर्मों ने हवा का चरित्र बिगाड़ा
सबसे मजेदार बात यह है कि हम कहते हैं कि हवा खराब है पर खुद को सुधारने की हवा कभी नहीं चलने देते। गाड़ी की खिड़की बंद करके ए.सी. चला लेते हैं और पेड़ काटकर कहते हैं- विकास जरूरी है। विकास जरूरी है, पर साँस भी तो चाहिए! आजकल हवा में सिर्फ ऑक्सीजन नहीं, हमारे कर्मों का फल भरा पड़ा है। जो धुआँ कारखानों से निकला, जो जहर हमने खेतों में डाला, जो गंदगी हमने शहरों में फैलाई- सब मिलकर हवा का चरित्र प्रमाण-पत्र बना रहे हैं और फिर हम मासूमियत से कहते हैं- आजकल हवा खराब है। तो यहां सवाल यह उठता है कि आखिर इसमें दोष किसका है? इसका सीधा सा जवाब यही है कि हम सबका और हम है कि दूसरों के सिर पर दोष मढ़कर आराम से अपने घर में एयर प्यूरीफायर लगवा लेते हैं।
पहले हवा शरीर साफ करती थी, अब सी.टी. स्कैन करवाती है। हवा इतनी बदनाम हो चुकी है कि खिड़की खोलना भी साहसिक खेल बन गया है। हम हवाओं पर सम्मेलन-गोष्ठियां कर रहे हैं। बड़े-बड़े मंच और बड़ी-बड़ी बातें। फोटो खिंचवाकर घर लौट आते हैं और हवा वहीं की वहीं बेचारी। सब कुछ वैसा ही चलता है और हम दो बातें हवा की क्वालिटी पर करके अपने फर्ज की इतिश्री कर लेते हैं। क्या हमें अपने तई कुछ और प्रयास नहीं करने चाहिए जिससे हवा की क्वालिटी बेहतर हो सके? एक बर की बात है अक नत्थू छात पै खड्या ठंडी हवा खावै था अर अचानक यमराज आग्या। बोल्या- तेरी जान लेण आया हूं। नत्थू बेफिक्र तै बोल्या- ले ज्या, पड़ोस म्हं चार घर छोड़कै रहवै है।
-शमीम शर्मा
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