फिर से चांद फतह के लिए आखिर क्यों बेकरार है अमेरिका?

चांद पर लौटना केवल पुरानी उपलब्धि को दोहरानाभर नहीं है बल्कि अमेरिका आर्टेमिस-2 के जरिये नये युग की शुरुआत कर रहा है। क्योंकि वैज्ञानिक इस निष्कर्ष पर पहुंच चुके हैं कि धरती की समृद्धि की भविष्य की कुंजी चांद के संसाधन हैं। इसलिए समय रहते अमेरिका ने एक बार फिर से चांद अभियान में अव्वल रहने की दौड़ शुरु कर दी है।

एक ऐसे समय पर जब नासा के ज्यादातर अभियानों में मंगल ग्रह छाया रहता है, उसी दौर में 2 अप्रैल 2026 को नासा ने आर्टेमिस-2 मिशन लांच किया है, जिसके तहत चार अंतरिक्ष यात्री 10 दिन की चांद यात्रा पर निकले हैं। इनमें से तीन अमेरिकी और एक कनाडाई मूल का अंतरिक्ष यात्री है। चांद मिशन की यह अमेरिकी टीम आज तक की सबसे ज्यादा विविध है। इसके कमांडर रीड वाइसमैन हैं और इस मिशन के अन्य सदस्यों में पायलट विक्टर ग्लोवर, क्रिस्टीना कोच और जेरेमी हैनसेन हैं। इस मिशन में न सिर्फ पहली महिला जा रही है बल्कि पहला अश्वेत अमेरिकी और पहला गैरअमेरिकी अंतरिक्ष यात्री भी शामिल है।

आर्टेमिस-2 के कमांडर रीड वाइसमैन पूर्व नौसेना पायलट हैं, अमेरिकी नागरिक रीड वाइसमैन पूरे मिशन के मुख्य नेता और उड़ान संचालन तथा क्रू की सुरक्षा के लिए जिम्मेदार होंगे। अगर अनुभव की बात करें तो वाइसमैन इससे पहले अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन पर मिशन कर चुके हैं। इस दल के दूसरे सदस्य विक्टर ग्लोवर पहले अफ्रीकी-अमेरिकी हैं, जो चांद मिशन के लिए चुने गये हैं। ये स्पेस एक्स क्रू-1 के भी हिस्सा रह चुके हैं। इनकी भूमिका स्पेपॉफ्ट की उड़ान प्रणाली को संभालना होगा, साथ ही ये तकनीकी नियंत्रण और नेविगेशन में भी सहयोग करेंगे।

अनुभवी क्रू के साथ 54 साल बाद फिर चांद मिशन पर अमेरिका

दल की तीसरी सदस्य क्रिस्टीना कोच के पास एक महिला के रूप में सबसे ज्यादा अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन में समय बिताने का रिकॉर्ड है और अमेरिका मूल की क्रिस्टीना पहली महिला अंतरिक्ष यात्री हैं, जो चांद मिशन पर गई हैं। आर्टेमिस-2 में इनकी भूमिका विभिन्न तरह के वैज्ञानिक प्रयोग करने, सिस्टम की मॉनिटरिंग करने और मिशन के दौरान तकनीकी कार्यों को अंजाम देने की होगी। क्रिस्टीना कोच इसलिए खास हैं, क्योंकि चांद के पास जाने वाली वो पहली महिला बनेंगी। जबकि इस मिशन के चौथे सदस्य हैनसेन कनाडाई नागरिक हैं, यह कनाडियन स्पेस एजेंसी से जुड़े हुए हैं और इस मिशन में उनकी भूमिका नेविगेशन और संचार में सहयोग करने की होगी।

साथ ही वह पूरे मिशन का वैज्ञानिक अवलोकन करेंगे। इनके साथ जो ऐतिहासिक महत्व जुड़ता है, वह यह है कि चांद की यात्रा करने वाले हैनसेन पहले कनाडाई अंतरिक्ष यात्री होंगे। इस मिशन की सबसे बड़ी खासियत यह है कि सभी चारों क्रू मेंबर अनुभवी हैं, आईएसएस (अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन) में समय बिताने का उनके पास अनुभव है और आधुनिक तकनीक से लैस हैं। मगर सबसे बड़ी बात वही है कि आखिरी बार किसी अमेरिकी अंतरिक्ष यात्री ने ही 54 साल पहले चांद की धरती पर कदम रखा था और इसके बाद दुनिया मानो चांद पर जाना ही भूल गई थी। ब्रह्मांड की ज्यादातर खोजों और मिशन का केंद्र मंगल ग्रह बन गया था।

दक्षिण ध्रुव की बर्फ और हीलियम-3 पर वैज्ञानिकों की नजर

सवाल है फिर अचानक अमेरिका ने चांद पर एक बार फिर से अंतरिक्ष यात्री उतारने का निर्णय क्यों लिया है? अब नासा ने जिस तैयारी के साथ एक बार फिर से चांद अभियान आर्टेमिस-2 के साथ शुरु किया है, तो उसका सबसे बड़ा उद्देश्य चांद को प्रयोगशाला में बदलना है। मंगल पर जाना अभी भी तकनीकी रूप से बेहद कठिन है, ऐसे में अब वैज्ञानिक बिरादरी की सोच है कि क्यों न चांद पर ही स्थायी ठिकाना बनाकर जीवन समर्थक प्रणाली, रोबोटिक्स और अंतरिक्ष आवास की तकनीकों पर परीक्षण किया जाए। वैज्ञानिकों को चांद के दक्षिण ध्रुव पर जमी हुई बर्फ के प्रमाण मिले हैं, जिसका मतलब है पीने का पानी, ऑक्सीजन के साधन और रॉकेट इंंधन यानी हाइड्रोजन को हासिल करना।

साथ ही चांद पर हीलियम-3 जैसे दुर्लभ तत्व की संभावना भी खूब नजर आ रही है, जो कि भविष्य की स्वच्छ ऊर्जा का सबसे बड़ा स्रोत बन सकता है। साथ ही अंतरिक्ष अब नई भू-राजनीति का केंद्र बन गया है। भारत का चंद्रयान-3 चांद के दक्षिण ध्रुव के पास उतर चुका है और यह पहला मिशन था, जो चांद के इस क्षेत्र पर उतरा। इसके अलावा चीन की 2030 तक चांद पर मानव उतारने की तैयारी को देखकर, अमेरिका आनन-फानन में आर्टेमिस-2 के जरिये चांद के दूसरे मिशन का श्रेय भी अपने पास रखना चाहता है। नासा के प्रशासक जेरेड आइजेकमैन ने कहा है, नासा फिर से चंद्रमा पर अंतरिक्ष यात्री भेजने के व्यवसाय में लौट आया है।

निजी कंपनियों की एंट्री से अंतरिक्ष मिशन की लागत घटी

जैसा कि हम जानते हैं भारत और चीन इस समय अंतरिक्ष अनुसंधान में गहरी रूचि ले रहे हैं और सफलता भी हासिल कर रहे हैं। जिस तरह से भारत के अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन इसरो को हाल के सालों में एक के बाद दूसरी कामयाबियां मिली हैं और चीन जिस तरह अंतरिक्ष में अपना अंतरिक्ष यात्री सफलतापूर्वक भेज चुका है, उससे अमेरिका को लगने लगा है कि कहीं 21वीं सदी में उसके हाथ से अंतरिक्ष मिशन की बादशाहत न छिन जाए। इसलिए वह आनन-फानन में चीन द्वारा अपने अंतरिक्ष यात्रियों को चांद पर उतारने के पहले ही दूसरी बार के चांद मिशन का श्रेय अपने पास सुरक्षित रखना चाहता है।

इसके अलावा इसका एक बड़ा कारण स्पेस एक्स और ब्लू ऑर्जिन जैसी निजी कंपनियां हैं, जो अब अंतरिक्ष मिशनों का हिस्सा बन चुकी हैं, जिसके कारण अब इन मिशनों की लागत पहले से कम हो गई है। इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि पहले जहां अंतरिक्ष जाना मिशन होता था, वहीं अब अंतरिक्ष में जाकर वापस आना नहीं बल्कि वहां रहना मिशन है। अमेरिका, अंतरिक्ष में लूनर बेस बनाना चाहता है और यही बेस अंतरिक्ष प्रवेश के लिए भविष्य का दरवाजा बनेगा।

अब तक चांद पर उतरने वाले अंतरिक्ष यात्री

-लोकमित्र गौतम

1969 से 1972 के बीच 6 अपोलो मिशनों में कुल 12 अंतरिक्ष यात्री अब तक चांद पर उतरे हैं और ये सभी अमेरिकी थे। इन 12 अंतरिक्ष यात्रियों के नाम हैं- नील आर्मस्ट्रांग – ये चांद पर कदम रखने वाले पहले इंसान थे, उनके साथ गये दूसरे बज एल्ड्रिन अपोलो-12 के कमांडर कॉनराड, एलन बीन, एलन शेफर्ड, एडगर मिशेल, डेविड स्कॉट, जेम्स इरविन, जॉन यंग, चार्ल्स ड्यूक, यूजीन सर्नन और हैरिसन स्मिथ थे। इनमें से अब सिर्फ 90 साल से ज्यादा के उम्र के बज एल्ड्रिन इसी उम्र के डेविट स्कॉट और 80 से ज्यादा के उम्र के चार्ल्स ड्यूक तथा इसी उम्र के हैरिसन स्मिथ ही जीवित बचे हैं और बाकी 8 मून वॉकर्स का निधन हो चुका है।

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