मुस्लिम जगत का चौधरी बनने को बेकरार एर्दोगन!

जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में छब्बीस पर्यटकों की जान लेने वाले 22 अप्रैल, 2025 के कायरतापूर्ण आतंकी हमले ने भारत-पाकिस्तान तनाव को तो नई ऊँचाई दी ही और भी कइयों के चेहरों को बेनकाब कर दिया। यह अब इतिहास का हिस्सा है कि इस जघन्य अपराध के जवाब में भारत ने ऑपरेशन सिंदूर के तहत 6-7 मई को पाकिस्तान और पीओके में 9 आतंकी ठिकानों को नष्ट कर 90 से अधिक आतंकियों को मार गिराया। अनेक देशों ने भारत की इस कार्रवाई का समर्थन किया। लेकिन इस घटनाक्रम में तुर्किये के पक्षपातपूर्ण रुख ने भारत-तुर्किये संबंधों को तनावपूर्ण मोड़ पर ला खड़ा किया।

तुर्किये की चाल और एर्दोगन की मुस्लिम नेतृत्व भूख

जगज़ाहिर है कि तुर्किये ने इस दौरान पाकिस्तान का खुलकर समर्थन किया। राष्ट्रपति रेचेप तैयप एर्दोगन ने पाकिस्तानी प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ को प्रिय भाई कहकर ट्वीट किया कि तुर्की और पाकिस्तान का भाईचारा अनूठा है और कि वे हर वक़्त पाकिस्तान के साथ हैं। भारतीय सेना ने दावा किया कि तुर्किये ने पाकिस्तान को 350 से अधिक ड्रोन, मिसाइलें और सैन्य सामान दिए, जिनका उपयोग भारत के खिलाफ हुआ।

ड्रोन मलबे की जाँच ने इस संलिप्तता की पुख्ता पुष्टि कर दी। तुर्किये के इस रुख से भारत का हैरान होना लाज़मी था। भारत ने सोचा था कि विश्व महामारी कोरोना और 2023 के भूकंप के दौरान की गई मदद का तुर्किये कुछ तो लिहाज रखेगा। पर नहीं साहब, सियासत बड़ी क्रूर होती है! सयाने बता रहे हैं कि एर्दोगन की यह नीति मुस्लिम जगत का चौधरी बनने की उनकी महत्वाकांक्षा से भी प्रेरित है। वे कश्मीर जैसे मुद्दों को उठाकर और पाकिस्तान जैसे देशों का समर्थन करके इस्लामी दुनिया में अपनी छवि को मजबूत करना चाहते हैं।

संयुक्त राष्ट्र और अन्य वैश्विक मंचों पर कश्मीर पर आक्रामक रुख और इस्लामी सहयोग संगठन (ओआईसी) में प्रभाव बढ़ाने की कोशिशें उनकी इस महत्वाकांक्षा को दर्शाती हैं। उन्हें इस बात की भी परवाह नहीं कि यह रणनीति भारत जैसी उभरती विश्व शक्ति के साथ टकराव को जन्म दे रही है, जो तुर्किये के लिए दीर्घकालिक नुकसानदेह साबित होगा। जैसा कि होना ही था, भारत ने तुर्किये के इस रवैये को गंभीरता से लिया है। तुर्किये के उत्पादों और पर्यटन के बहिष्कार का कदम एकदम सही है।

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भारत-तुर्किये तनाव: संतुलित नीति की ज़रूरत

भारतीय फल पोताओं ने तुर्की के सेबों का आयात बंद किया, ट्रैवल कंपनियों ने तुर्की की बुकिंग रद्द कीं और जम्मू के व्यापारियों ने तुर्की मार्बल का बहिष्कार शुरू किया। सोशल मीडिया पर हैशटैग तुर्की बायकॉट ट्रैंड करने लगा। अनुमान है कि इस बहिष्कार से तुर्किये को 3,000 करोड़ रुपये का नुकसान हो सकता है। कूटनीतिक स्तर पर भारत ने तुर्किये की निंदा करते हुए कहा कि उसका रुख दक्षिण एशिया की स्थिरता के लिए खतरा है।

दरअसल, भारत-तुर्किये संबंधों का इतिहास उतार-चढ़ाव भरा रहा है। सांस्कृतिक और व्यापारिक रिश्ते पुराने हैं, लेकिन कश्मीर और साइप्रस जैसे मुद्दों पर दोनों का रुख अलग-अलग रहा है। 1974 में साइप्रस पर तुर्की के हमले के बाद भारत की तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने कड़े कदम उठाए थे। कहना न होगा कि वर्तमान संकट ने इस कड़वाहट को और गहरा किया है।

फिर भी, इन संबंधों को पूरी तरह खत्म करना जल्दबाजी होगा। तुर्किये की अर्थव्यवस्था पर्यटन और निर्यात पर निर्भर है और भारत उसका बड़ा बाजार है। भारत द्वारा बहिष्कार तुर्किये के लिए आर्थिक संकट ला सकता है। वहीं, भारत को तुर्किये के नाटो सदस्य होने और मध्य एशिया में उसकी भू-राजनीतिक अहमियत को भी ध्यान में रखना होगा। ऐसे में, भारत को कूटनीति और आर्थिक दबाव का संतुलित उपयोग करना चाहिए। साथ ही, अपनी रक्षा और खुफिया क्षमताओं को और मजबूत करना होगा। यह समय भारत की अपनी एकजुटता और संकल्प को दुनिया के सामने दिखाने का है।

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