भक्ति के सभी हैं अधिकारी

ज्ञान-मार्ग में परीक्षा होती है। भगवान परीक्षा लेते हैं- वैराग्य परिपूर्ण है या नहीं। वैराग्य कम हो तो भगवान माया के परदे में अपने स्वरूप को छिपाते हैं, दर्शन नहीं देते हैं। भक्ति-मार्ग में भक्त सभी प्रकार का अभिमान छोड़कर भगवान् की शरण में आता है। जो शरण में आता है, भगवान उसकी परीक्षा नहीं लेते। योगियों की परीक्षा होती है, ज्ञानियों की परीक्षा होती है, लेकिन भक्त की परीक्षा नहीं होती है।

भक्ति करने का अधिकार सभी को है। कथा सुनने से पाप का नाश होता है। कथा का एक-एक सिद्धांत अपने जीवन में उतारना है। कथा करने वाले बहुत हैं। कथा कराने वाले और कथा सुनने वाले भी बहुत हैं, लेकिन कथा का एक-एक सिद्धांत, जिसने अपने जीवन में उतारा है, उसी का ज्ञानक्रियात्मक है। मानव ज्ञानी तो है, किन्तु उसका ज्ञान शब्दात्मक होता है।

ज्ञान को जीवन में उतारें, तभी मिलेगा सच्चा परिवर्तन

ज्ञान के अनुसार जो क्रिया नहीं करता है, उसका ज्ञान क्रिया के अनुसार हो जाता है। ज्ञान जब क्रियात्मक बनता है, तभी अभिमान मरता है। ज्ञान के अनुसार जो क्रिया नहीं करता है, क्रिया के अनुसार उसका ज्ञान हो जाती है। सभी जानते हैं कि सत्य बोलना चाहिए, किन्तु सभी लोग सत्य नहीं बोलते हैं। मानव जब झूठ बोलता है, तब वह मन को समझाता है कि व्यवहार में तो थोड़ा-बहुत झूठ बोलना ही पड़ता है।

ज्ञान के अनुसार क्रिया नहीं होती, तब क्रिया के अनुसार ज्ञान हो जाता है। झूठ बोलने से मन में खटकता है कि यह ठीक नहीं है। कितने लोग तो मन को समझा देते हैं कि मंदिर में जाकर भगवान् को ग्यारह रुपये भेंट करूँगा और भगवान से कहूँगा कि हे भगवान्! मेरे सब पाप को जला देना। मैं शरण में आया हूँ। भगवान कहते हैं, मेरे पास आओ, फिर देखो, मैं बताता हूँ। थोड़ी भेंट रखने से मैं तुम्हारे पाप को जला दूँगा?

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पाप भोगना ही पड़ेगा। ज्ञान जब क्रियात्मक होता है, तभी अभिमान मरता है। आप जो जानते हैं, वह जीवन में उतारें। भागवत् की कथा सुनते हो, हो सके तो भोगों की समाप्ति कर दो। बहुत सुख भोगा है, सुख भोगने से आज तक शांति मिली नहीं। अब सुख भोगने से क्या शांति मिलेगी। वैष्णव भोग की समाप्ति करते हैं, कभी भक्ति की समाप्ति नहीं करते। जिस दिन इस शरीर की समाप्ति हो, उस दिन भले ही भक्ति की समाप्ति हो जाए। भगवान् का ध्यान करके प्रेम से पूजा करो, प्रेम से भगवान् के नाम का जप करो, भक्ति-रस में अपने मन को सराबोर रखो।

डोंगरे महाराज

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