समय की सूझबूझ का साहस

विश्व प्रसिद्ध इंजीनियर विश्वेश्वरैया ने अपने अधीनस्थ सभी इंजीनियरों की आपात बैठक बुलाई और विचार-विमर्श किया कि जल के वेग को बढ़ने से कैसे रोका जाए।

कावेरी नदी में भयंकर बाढ़ आई हुई थी। दो-चार फुट जल और बढ़ने पर कृष्णराज सागर बांध क्षतिग्रस्त होने की आशंका थी, जिससे जन-धन की भारी तबाही हो सकती थी। विश्व प्रसिद्ध इंजीनियर विश्वेश्वरैया ने अपने अधीनस्थ सभी इंजीनियरों की आपात बैठक बुलाई और विचार-विमर्श किया कि जल के वेग को बढ़ने से कैसे रोका जाए।

विश्व प्रसिद्ध इंजीनियर विश्वेश्वरैया ने अपने अधीनस्थ सभी इंजीनियरों की आपात बैठक बुलाई और विचार-विमर्श किया कि जल के वेग को बढ़ने से कैसे रोका जाए। सभी इंजीनियर एक स्वर में बोले, ‘यदि बांध के सबसे नीचे लगे दरवाजे खोल दिए जाएं तो जल का वेग कम हो जाएगा।’

अब प्रश्न था, लबालब भरे बांध के नीचे जाकर दरवाजे खोले कौन? उसमें जान का जोखिम था। सब एक-दूसरे का मुंह ताकने लगे। मैकेनिकल इंजीनियर भालचंद्र पंत केतकर ने खड़े होकर विश्वेश्वरैया से कहा, ‘श्रीमान ! मुझे आदेश दीजिए, मैं दरवाजे खोल सकता हूं।’

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ऐसा आदेश देने के लिए अपने होंठों को खोलना दरवाजे खोलने जितना ही कठिन था। अतः विश्वेश्वरैया कुछ कह न सके। किंतु केतकर बिना उत्तर मिले तीव्र गति से दरवाजे खोलने के लिए दौड़ पड़े। उनकी देखादेखी उनके पीछे नौ-दस जवान और दौड़ पड़े। सबने मिलकर सूझ-बूझ से दरवाजे खोल दिए। यद्यपि काम खतरे से खाली नहीं था, फिर भी सबका जीवन सुरक्षित रहा।

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