सृष्टि के प्रत्येक कण में विद्यमान है नारी चेतना

सृष्टि की रचना शिव के स्थिर तत्व और शक्ति के चंचल तत्व के योग से हुई। मानव जीवन का उद्देश्य ही धर्म, अर्थ एवं काम और मोक्ष को प्राप्त करना है। चौरासी लाख योनियों से मनुष्य के अतिरिक्त और कोई भी योनि आध्यात्मिक-पथ पर नहीं चल सकती और मोक्ष प्राप्त नहीं कर सकती। परम चेतना ने सृष्टि के सृजन, संचालन और विस्तार के लिए नर और मादा की रचना की।

दोनों को एक-दूसरे का पूरक व सहयोगी बनाया, लेकिन विविध देशों, कालों तथा परिस्थितियों में महिलाओं और पुरुषों के मध्य उनके शारीरिक बल, बुद्धि आदि के आधार पर भेदभाव किया जाने लगा। प्राकृतिक रूप से परमात्मा ने सभी को सभी क्षमताओं से परिपूर्ण बनाया, लेकिन स्त्री की सृजन-शक्ति ने उसे विशिष्ट बनाया। इस कारण तथा इस डर से कि कहीं स्त्री हम पर राज न करने लग जाए, समाज में पुरुषों ने कई कार्यों से महिलाओं को वंचित रखा।

जागरूकता और आध्यात्मिक शक्ति से महिलाएं बना रहीं अपनी नई पहचान

उनकी स्वतंत्रता और क्षमताओं को अंधविश्वासों के बंधनों में बांध दिया ताकि वे कर्म कांड व पूजा-पाठ में फंसी रहे और पुरुष वर्ग का वर्चस्व फैलता रहे। प्रकृति के नियमों के अनुसार, हर क्रिया की प्रतिक्रिया होती है। इसीलिए वर्तमान में महिलाओं में पूर्ण जागरूकता आ गई है और वे स्वयं को पुरुष के समान बुद्धिमान, शक्तिशाली तथा ज्ञानवान मानती हैं।

आध्यात्मिक दृष्टिकोण से देखा जाए तो स्त्री प्रारंभ से ही पुरुष से अधिक भावना प्रधान, धैर्यवान और विवेकवान रही है, लेकिन अज्ञानता वश उसे अपने इस सुपर पॉवर के बारे में मालूम नहीं है। वह तो केवल समानता के लिए संघर्ष करती रहती है, जबकि महिला पुरुष के समान नहीं बल्कि उससे कहीं आगे है। जिस कन्या, महिला, गृहणी या माता को सौभाग्य से किसी सद्गुरु, संत या ज्ञानी की शरण मिल उनका परिवार मोक्ष की राह पर चलने लगता है।

मोक्ष की राह पर चलने वाली महिला को यह ज्ञान हो जाता है कि क्षमा मांगने से हम किसी पुरुष से छोटे नहीं होते बल्कि भीतर से उन्नति के शिखर की ओर बढ़ते हैं। भगवान केवल भाव के भूखे होते हैं। महिलाएं जन्मजात भावना प्रधान होती हैं। उनका यही गुण उन्हें मोक्ष के मार्ग पर आसानी से ले जाता है, क्योंकि ज्ञान के साथ भक्ति का संगम होता है तब मोक्ष निश्चित है।

महिलाओं की जागरूकता से परिवार और समाज में सुख-शांति का मार्ग

ज्यादातर महिलाएं अपने कर्म को ही अपना धर्म समझती हैं, लेकिन यदि वे जो कुछ कर रही हैं, उसे कर्ता-भाव से ना करके उनके माध्यम से परम चेतना ही सब कुछ कर रही है, यह भाव रखें तो अपने दैनिक कार्यों को करते हुए सरलता और सहजता से मोक्ष पा सकती सुख-दुःख, पाप-पुण्य के भाव से परे स्थायी आनंद में स्थित होना ही मोक्ष है और इसे जीवित रहते अनुभव किया जा सकता है-मृत्यु के उपरांत नहीं।

जिस परिवार की महिला प्रशंसा, आभार, स्वीकार आदि को जीवन में उतारते हुए, व्यवहार करती हैं, उस परिवार के सदस्य आनंदित रहते हैं और आसानी से मुक्ति के मार्ग पर आगे बढ़ते हैं। महिलाओं की मुक्ति में उनकी व्यक्तिगत मुक्ति नहीं बल्कि परिवार, समाज और संसार की मुक्ति भी छुपी है। इसीलिए भारतीय परंपरा में पृथ्वी, अग्नि, नवदुर्गा आदि सब पूजनीय हैं।

पिरामिड वैली में सद्गुरु रमेशजी का आध्यात्मिक प्रवचन
सद्‌गुरु श्री रमेशजी

सृष्टि के प्रत्येक कण में चेतना स्वयं शक्ति के रूप में विद्यमान है। इसीलिए ‘मातृदेवो भव’ कहकर माँ को देवी, पत्नी को गृह-लक्ष्मी और कन्या को नवदुर्गा के रूप में पूजा जाता है। इस वर्ष महिला-दिवस पर समस्त चराचर जगत के प्रति ‘लोका समस्ता सुखिनो भवंतु’ की तरंगें फैलाकर हम सबके मोक्ष की कामना करते हैं।

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