आध्यात्मिक शक्ति से करें प्रेम
हम सभी अपने बाहरी शारीरिक रूप की ओर से ध्यान हटाएँ और अपने सच्चे आत्मिक स्वरूप का अनुभव करें। इससे ही हमारा मानव चोले में आने का लक्ष्य पूर्ण होगा और हम सदा-सदा के लिए प्रभु में लीन होने के मार्ग पर अग्रसर हो पाएंगे।
जीवन वन में खुश रहने के लिए यह आवश्यक है कि हम स्थाई प्रेम से भरपूर रहें। सदा-सदा का प्रेम केवल प्रभु का प्रेम है, जो दिव्य व आध्यात्मिक है। जब हम इस संसार में दूसरों से प्रेम करते हैं, तो इंसान के बाहरी रूप पर ही केंद्रित होते हैं और हमें जोड़ने वाले आंतरिक प्रेम को भूल जाते हैं। सच्चा प्रेम तो वह है जिसका अनुभव हम दिल से दिल तक और आत्मा से आत्मा तक करते हैं। बाहरी रूप तो एक आवरण है, जो इंसान के अंतर मौ-से जूद सच्चे प्रेम को ढक देता है।
मान लीजिए, आपके पास खाने के लिए कुछ अनाज है। उसे प्लास्टिक की थैली में लपेट सकते हैं या डिब्बे में बंद करके रख सकते हैं। हम उस थैली या डिब्बे को नहीं, बल्कि उसके अंदर मौजूद अनाज को खाना चाहते हैं। इसी तरह जब हम किसी इंसान से कहते हैं कि ‘मैं तुमसे प्रेम करता हूँ’, तो हम उस व्यक्ति के सार-रूप से प्रेम प्रकट कर रहे होते हैं। वो बाहरी आवरण हमारा शारीरिक रूप नहीं है जिससे हम वास्तव में प्रेम करते हैं। वास्तव में हम उस व्यक्ति के सार से प्रेम करते हैं, जो उसके भीतर मौजूद है।
आत्मिक स्वरूप की पहचान ही जीवन का सच्चा उद्देश्य
हम यह कैसे जान सकते हैं? जीवन के दौरान इंसान में बहुत सारे बदलाव आते हैं। शुरू में उसका आकार एक नन्हे शिशु का होता है। उसके बाद बालक से किशोर फिर वयस्क बनता है। वयस्क से तीस, चालीस, पचास, साठ, सत्तर, अस्सी, नब्बे और सौ वर्ष की आयु को पार करता है। हम किसी व्यक्ति से अपने जीवन की संपूर्ण अवधि के दौरान प्रेम कर सकते हैं, चाहे उस व्यक्ति का बाहरी रूप लगातार बदल रहा होता है, उसकी आयु लगातार बढ़ रही होती है, लेकिन उस बाहरी आवरण के भीतर वो इंसान होता है, जिससे हम प्रेम करते हैं।
रहस्य यह है कि हम उस व्यक्ति के सार से प्रेम करते हैं। हम उस व्यक्ति के मूल स्वरूप से प्रेम करते हैं और वह मूल आत्मिक स्वरूप स्वयं प्रेम है। हमारे जीवन का उद्देश्य है कि हम अपने सच्चे आत्मिक स्वरूप का अनुभव कर पाएँ और अपनी आत्मा का मिलाप उसके स्रोत परमात्मा में करें। इस उद्देश्य को प्राप्त करने में महापुरुष हमारी सहायता करते हैं। एक पूर्ण संत अपनी रूहानी तवज्जो हमें प्रदान करता है, जि-ससे हमारी आत्मा अंतर में प्रभु की दिव्य ज्योति व श्रुति के साथ जुड़ने के लायक बन जाती है।
तब हम अपने सच्चे आत्मिक स्वरूप का अनुभव कर पाते हैं। सत्गुरु के मार्गदर्शन में नियमित ध्यानाभ्यास करते हुए, हमारी आत्मा आध्यात्मिक मार्ग पर प्रगति करती जाती है और अंततः परमात्मा में लीन हो जाती है। आइए, हम सभी अपने बाहरी शारीरिक रूप की ओर से ध्यान हटाएँ और अपने सच्चे आत्मिक स्वरूप का अनुभव करें। इससे ही हमारा मानव चोले में आने का लक्ष्य पूर्ण होगा और हम सदा-सदा के लिए प्रभु में लीन होने के मार्ग पर अग्रसर हो पाएँगे।
संत राजिन्दर सिंह महाराज
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