गांधी गये नहीं, हमारे बीच ही हैं

इतिहास की दीवार पर लिखी गांधी नामक यह इबारत अमिट है। गांधी थे नहीं, गांधी हैं। गांधी रहेंगे। गांधी ने कभी किसी से घृणा नहीं की, लेकिन उनसे घृणा में जी रहे वधिक वृत्ति के उनके बैरी जानते हैं कि गांधी का जीवित रहना उनके लिए कितना घातक है। उनकी फ़िक्र यही है कि गांधी को मारने के बाद गांधी की आत्मा को कैसे मारा जाए। हर ईसा और हर गांधी अपनी सलीब अपने कांधे लेकर चलता है।

गांधी आज हमारे बीच नहीं हैं। गांधी का हमारे बीच न होना गांधी के होने की ज़रूरत है। उनकी अनुपस्थिति उनकी उपस्थिति की इंगिति है। उजाला हो तो उसकी क़ीमत का हमें पता नहीं चलता। अंधियारे में उजाले की ज़रूरत और अहमियत बढ़ जाती है। तमस में हम आलोक का स्मरण करते हैं और आवाहन भी। ये पंक्तियां भी उन्हें टेरने जैसी हैं, क्योंकि महात्मा गांधी विश्व इतिहास की ऐसी अपूर्व और अद्भुत शख़्सियत हैं। गांधी ऐसे अलीक योद्धा हैं, जो सदा लीक छोड़कर चले। बड़ी बात यह नहीं कि उन्होंने लीकें तोड़ीं, वरन् बड़ी बात यह कि उन्होंने नयी लीकें रचीं।

विश्व इतिहास की महान विभूतियों में गांधी वह व्यक्ति हैं, जिन्हें वर्गीकृत करना कठिन है। गांधी आज़ादी की लड़ाई के अपने पूर्ववर्ती समस्त रणबांकुरों से भिन्न हैं। वे भगवान बुद्ध के बाद इस भूखण्ड में पहले व्यक्ति हैं जिन्होंने इस महादेश की आत्मा को पहचाना, समूचे देश को आलोड़ित किया और सारा देश इस फ़क़ीर के पीछे चल पड़ा। गांधी अपने आयुधों से विश्व की सबसे शक्तिशाली हुकूमत के ख़िलाफ़ जंग ही नहीं छेड़ते हैं, वरन् इस गौरवशाली अतीत के पददलित, शोषित और विपन्न महादेश के समक्ष नया सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक फलसफा भी प्रस्तुत करते हैं।

घोर असहमति के पार भी स्वीकार्य व्यक्तित्व

गांधी महान क्यों हैं? इसलिए कि उनसे घोर असहमति भी उन्हें खारिज नहीं कर सकती। इसलिए भी कि एक पंक्ति में उन्हें बयां नहीं किया जा सकता। वे गृहस्थ हैं, लेकिन वीत-रागी। कोई आश्चर्य नहीं यदि बापू को बचपन में राम का वनगमन और बुद्ध का गृहत्याग का प्रसंग झकझोरता रहा हो। उपवास, आश्रमों की स्थापना, शाकाहार, प्राकृतिक चिकित्सा के प्रयोग, पदयात्रा, सत्याग्रह, अहिंसा जहां उन्हें अनायास आर्ष ऋषियों, बौद्ध व जैन श्रमणों से जोड़ देती है, वहीं उनकी करुणा उन्हें प्रभु यीशु की सलीब के निकट ले जाकर खड़ा कर देती है। उनका फक्कड़पन कबीर और मंसूर की याद दिलाता है और सत्य के लिए उनका अदम्य आग्रह सुकरात की।

आज़ादी की लड़ाई के अनेक प्रसंगों में वे हठयोगी नज़र आते हैं। बेशक वे निर्मोही हैं और उनका मोह किसी पार्थिव तत्व से नहीं है। उनका साध्य पवित्र है और साधन भी पूत। नौरोजी, तिलक और गोखले का चिन्तन उनमें एक साथ परिष्कार व उन्नयन पाता है। वे किसी की परवाह नहीं करते, किसी की कोई फ़िक्र नहीं, बेिफा-बेपरवाह, हद्द छोड़कर बेहद्द हुई शख़्सियत हैं गांधी। जेब में बार एट लॉ की सनद, मगर पारम्परिक ढंग से वकालत नहीं। चौरी-चौरा काण्ड हुआ कि सत्याग्रह स्थगित।

सबका रोष सिर माथे, मगर टस से मस नहीं। अविचलित, निर्विकार। ब्रिटिश हुकूमत का दम्भ चूर-चूर करने के लिये वे अपने हाथों नमक का चूरा बनाते हैं। सनातनी समाज की कोपदृष्टि से बेख़बर वे अछूतोद्धार और अस्यपृश्यता उन्मूलन का अभियान छेड़ देते हैं। लिवरपूल की मिलों के करघे रोकने के लिए वे चरखा कातते हैं। देखते-देखते खादी राष्ट्र की पोशाक बन जाती है। उन्हें गूंगी या विदेशी जुबान में आज़ादी नहीं चाहिए। उनकी आज़ादी की लड़ाई हिन्दी की लड़ाई भी है।

आइंस्टाइन की दृष्टि में गांधी: इतिहास का विरल व्यक्तित्व

आज़ादी के मौके पर जब बीबीसी संवाददाता साक्षात्कार के लिए आता है, बापू कहते हैं- जाओ, दुनिया से कह दो गांधी अंग्रेजी भूल गया। अल्बर्ट आइंस्टाइन सच कहते हैं- आने वाली सदियां इस बात पर शायद ही य़कीन करें कि इस धरती पर हाड़मांस का ऐसा भी कोई आदमी हुआ था। गांधी सत्यनिष्ठ योद्धा हैं। वे सत्य की लाठी से धरती को मुक्ति की ओर ठेलने का उपक्रम करते हैं। ज्ञात इतिहास में गांधी बिरले हैं कि वे ईश्वर सत्य है कहने के बजाय सत्य ही ईश्वर है कहते हैं। उनका यह बोध आजीवन कायम रहता है, सत्यनिष्ठा से वह कभी या कतई डिगते नहीं।

एक नहीं छह बार उनके प्राण लेने की चेष्टा होती है, लेकिन वे न कभी विचलित होते हैं, न भयभीत और न ही सशंकित। वे अडिग रहते हैं। सत्यनिष्ठा उनकी शक्ति है, अपरिमित शक्ति। गांधी का राम नाम से अटूट रिश्ता रहा। राम नाम का मंत्र उन्हें बचपन में उनकी धाय रंभा से मिला था। इस मंत्र से वह निर्भय हुए। गांधी ने स्वयं कहा, इस राम नाम ने जीवन के अंधकारमय समयों में सूर्य के प्रकाश-सा काम किया है।

विश्व में किसी के मुख से प्राण त्यागते समय हे, राम नहीं निकला। मेरा मानना है कि गांधी से बड़ा रामभक्त कोई दूजा न हुआ। गांधी कबीर के बाद के कबीर हैं, बीसवीं सदी के बलिदानी कबीर। लेकिन कबीर का राम दशरथनंदन राम नहीं है। वह घट-घट में व्याप्त, अणु-अणु में व्याप्त, ज़र्रे-ज़र्रे में व्याप्त, जड़-चेतन में व्याप्त अविनाशी राम है। 30 जनवरी, 1948 तो बहुत बाद की घटना है। गांधी के जीवन के गलियारे में पीछे चलें। चालीस साल पीछे। सन् 1908।

यह भी पढ़ें… जिसने ब्रिटिश साम्राज्य को हिला दिया: लाला लाजपत राय

“हे राम” और अचेत गांधी: सत्याग्रह की पहली अग्निपरीक्षा

तारीख 10 फरवरी। स्थान जोहानिसबर्ग। गांधीजी पंजीकरण के लिए जा रहे थे कि मीर आलम नामक क्षुब्ध भारतीय ने उनका रास्ता रोक लिया। पूछने पर गांधी ने कहा- तुम भी चलो। पहले तुम्हारा करवाऊंगा, फिर अपना। बात पूरी भी न हुई थी कि सिर पर जोरों का डंडा पड़ा। मुख से निकला- हे राम। वे अचेत होकर गिर पड़े। गांधी और साथियों की तब तक पिटाई हुई, जब मीर और साथियों को लगा कि गांधी मर गये।

बरसों बाद। 20 जनवरी, 1948। स्थान दिल्ली। बिड़ला भवन में मदनलाल पाह्वा ने धमाका किया। मगर गांधी जी बच गये। लेडी माउन्टबेटन ने इस बहादुरी के लिए बापू की प्रशंसा की, तो उन्होंने कहा- यह बहादुरी नहीं थी। मुझे कहां पता था कि कोई जानलेवा हमला होने को है। बहादुरी तो तब कहलायेगी, जब कोई सामने से गोली मारे और फिर भी मेरे मुख पर मुस्कान हो, मुंह में राम का नाम हो। पाह्वा को दोष दिये बिना उन्होंने कहा कि उसने यह मान लिया कि मैं हिन्दू धर्म का दुश्मन हूं। वह कह रहा है कि उसने यह काम भगवान के नाम पर किया।

तब तो उसने भगवान को भी अपने दुष्कर्म में भागीदार बना लिया है। पर ऐसा तो हो नहीं सकता। इसलिए जो कुछ उसके पीछे या जिन्होंने उसे हथियार बनाया है, मैं उनसे कहना चाहता हूं कि ऐसा सब करने से हिन्दू धर्म बच नहीं सकता। इसके बाद सीधे आयें 30 जनवरी की घटना पर। कुमार प्रशांत के शब्दों में, दस दिन पहले जहां मदनलाल पाह्वा विफल हुआ था, दस दिन बाद वहीं नाथूराम गोडसे सफल हुआ।

“मेरा कोई दुश्मन नहीं”: गांधी का करुणा-दर्शन

महात्मा की हत्या के प्रयासों को समेटे जो नाटक चालीस साल खेला गया और 30 जनवरी, 48 को जिसका पटाक्षेप शोकांतिका में हुआ, वह नाटक छह अंकी था। यह प्रश्न अनुत्तरित नहीं है कि उसकी स्क्रिप्ट किसने लिखी? सारी दुनिया पटकथा लेखक के नामधाम, कुल-गोत्र और उनके कुनबे को जानती है। दूसरे गोलमेज सम्मेलन के दौरान लंदन के बिशप बापू से मिलते हैं। कहते हैं- प्रभु यीशु ने कहा है कि अपने दुश्मन से भी प्यार करो। आपका क्या कहना है? चरखा कातने में निमग्न गांधीजी कहते हैं- मेरा तो कोई दुश्मन ही नहीं है।

बिशप अवाक्। बिशप ही क्यों? गांधी के सम्मुख इकबारगी विश्व अवाक् रह जाता है। गांधी का वर्गीकरण मुमकिन नहीं। वह किसी खाने में नहीं अंटते। और जिस खाने में वह खड़े होते हैं, वहां कोई और नहीं ठहरता। ऐसे थे गांधी। थे नहीं, ऐसे हैं गांधी। सहस्राब्दी की शख़्सियत। या कि इतिहास का विरल व्यक्तित्व। इतिहास की दीवार पर लिखी यह इबारत अमिट है। गांधी थे नहीं, गांधी हैं। गांधी रहेंगे।

डॉ. सुधीर सक्सेना
डॉ. सुधीर सक्सेना

गांधी ने कभी किसी से घृणा नहीं की, लेकिन उनसे घृणा में जी रहे वधिक वृत्ति के उनके बैरी जानते हैं कि गांधी का जीवित रहना उनके लिए कितना घातक है। उनकी फ़िक्र यही है कि गांधी को मारने के बाद गांधी की आत्मा को कैसे मारा जाए। हर ईसा और हर गांधी अपनी सलीब अपने कांधे लेकर चलता है। परंतु यह तो सोचिये कि उनकी हत्या का लाइसेंस उन्हें कौन देता है, जबकि हत्यारों का ईश्वरीय या रामराज्य से कहीं कोई वास्ता नहीं होता।

अब आपके लिए डेली हिंदी मिलाप द्वारा हर दिन ताज़ा समाचार और सूचनाओं की जानकारी के लिए हमारे सोशल मीडिया हैंडल की सेवाएं प्रस्तुत हैं। हमें फॉलो करने के लिए लिए Facebook , Instagram और Twitter पर क्लिक करें।

Related Articles

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *

Back to top button