बच्चों को दीजिए संस्कार : ललितप्रभजी म.सा.

हैदराबाद, जो माता-पिता बच्चों को केवल जन्म देते हैं, वह सामान्य हैं, जो बच्चों को जन्म के साथ सुविधाएँ-संपत्ति देते हैं, वह माता-पिता मध्यम हैं, पर जो बच्चों को जन्म और सम्पत्ति के साथ संस्कार भी देते हैं, वही उत्तम कहलाते हैं। बच्चों को इतना सुयोग्य बनाएँ कि वह समाज की अग्रिम पंक्ति में बैठने लायक बन सकें और बच्चे ऐसा जीवन जिएँ कि लोग उनके माता-पिता से पूछने लग जाएँ कि आपने ऐसी कौनसी पुण्यवानी की, जो आपके इतनी अच्छी संतान पैदा हुई। बच्चों को पढ़ा-लिखाकर केवल शिक्षित ही न बनाएँ वरन् संस्कारित भी बनाएँ।

प्रवचन समारोह में राष्ट्र संत ललितप्रभजी और संतों का संबोधन

उक्त उद्गार नांदेड़ स्थित शंकरराव चव्हाण प्रेक्षागृह में सकल जैन एवं राजस्थानी समाज द्वारा आयोजित प्रवचन समारोह के समापन पर बच्चों को दीजिए कार से पहले संस्कार विषय पर प्रवचन देते हुए राष्ट्र संत ललितप्रभजी म.सा. ने व्यक्त किए। आज प्रदीप सुराणा द्वारा जारी प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार, संतप्रवर ने कहा कि अगर आप अपने बुढ़ापे को सुखी बनाना चाहते हैं, तो बच्चों को केवल कार न दें, साथ में संस्कार दें।

बच्चों में संस्कार के लिए घर का सकारात्मक माहौल आवश्यक

अच्छे संस्कार दुनिया के किसी मॉल में नहीं मिलते, यह घर के अच्छे माहौल में मिलते हैं। हमें इतना उत्तम जीवन जीना चाहिए कि हमारा जीवन ही बच्चों के लिए आदर्श बन जाए। बच्चों को संस्कारित करने का पहला सूत्र देते हुए संतश्री ने कहा कि परिवार का माहौल अच्छा बनाएँ। बच्चों पर धन के साथ समय का भी निवेश करें। घर में अच्छा साहित्य रखें। घर में सम्मान की भाषा बोलें।

नाम के पहले श्री व बाद में जी लगाएँ, बड़ों के पाँव छुएँ, मेहमानों को गेट तक पहुँचाने जाएँ, घर में लड़ाई-झगड़े का वातावरण न बनाएँ और व्यसनों का कदापि सेवन न करें। संतश्री ने कहा कि बच्चों को जीवन-प्रबंधन के गुर सिखाएँ। उन्हें जल्दी सोने, जल्दी उठने, सात्विक खाने, मर्यादित कपड़े पहनने, थाली धोकर रखने और औरों को खिलाकर खाने की प्रेरणा दें। संतश्री ने कहा कि कामयाबी के पीछे न भागें, वरन् काबिलियत बढ़ाएँ। जहाँ काबिलियत है, वहाँ कामयाबी खुद चलकर आती है।

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आत्म-ज्ञान, शांति और मोक्ष पर संतप्रवर ने दिया मार्गदर्शन

डॉ. मुनि शांतिप्रियसागरजी म.सा. ने कहा कि संबोधि योग जीवन को सुंदर बनाने के लिए है। संबोधि योग के तीन रत्न हैं आसन, प्राणायाम और ध्यान। आसन आरोग्य के लिए है, प्राणायाम से प्राण-शक्ति का विकास होता है और संबोधि ध्यान से आत्म-प्रकाश के मालिक बनते हैं, भीतर का अंधकार दूर होता है। उन्होंने कहा कि संबोधि ध्यान का लक्ष्य चंचल और उग्र मन को शांत और प्रसन्नता पूर्ण बनाना, आत्म-चेतना की ओर केन्द्रित होना है।

आत्मा में प्रेम, प्रसन्नता, आनंद, उत्साह, करुणा और सौंदर्य को सजीव करना सबसे सुंदर संबोधि साधना है। उन्होंने कहा कि मैं आत्मा हूँ, इस सत्य का अनुभव करना ही आत्म-ज्ञान है। आत्मा के अंतरतम में परमात्मा की निर्मल अनुभूति परम आत्म-ज्ञान है। उन्होंने कहा कि मोक्ष है – शाश्वत शांति, परिपूर्ण आनंद। जैसे बच्चे परीक्षा खत्म होते ही किताबों को भूलकर सहज मस्ती में आ जाते हैं, ऐसे ही खुद को चाह और चिंता के बोझ से मुक्त कर सहज आनंदमयी स्थिति को जीना मोक्ष है।

कार्यक्रम में विधायक बालाजी, पूर्व विधायक ओमप्रकाश पोखरणा, मराठा सेवा संघ के कामजी पवार, अश्विन शाह, विजय कुमार कासलीवाल, कैलाशचंद काला, चिरंजीवी लाल ढागडिया, मनोज श्रीश्रीमाल, महेंद्र जैन, नवल पारख, महावीर हीरावत, हर्षद शाह, संजय भंडारी व अन्य ने भाग लिया। राष्ट्र संत 1 दिसंबर को पूर्णा पहुँचेंगे, जहां रात 8 से 9 बजे तक सत्संग-प्रवचन रहेगा। 3-4 दिसंबर को परभणी के बाजार रोड स्थित हरिशंकर प्रसाद कार्यालय में सुबह 9 से 11 बजे तक विशेष सत्संग का प्रवचन होगा। सभी से इसका लाभ लेने का आग्रह किया गया।

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