चैतन्यता की होली, मन की मरुभूमि पर बरसते खुशियों के रंग

प्रकृति जब अपना पुराना चोला उतारकर नव-श्रृंगार करती है, जब अमराइयों में बौर महकने लगती है और टेसू के फूल जंगलों में धधकने लगते हैं, तब समझ लीजिए कि होली आ गई है। यह केवल रंगों का त्योहार नहीं, बल्कि जड़ता के विरुद्ध चैतन्य की उद्घोषणा है। अंग्रेजी कवि भले ही मार्च के बाद आने वाले दिनों को क्रूअलेस्ट मंथ कहें, लेकिन भारतीय मानस के लिए यह फागुन की वह मस्ती है, जहाँ दुष्यंत कुमार के शब्दों में- जिएं तो अपने बगीचे में गुलमोहर के तले, मरें तो गैर की गलियों में गुलमोहर के लिए।
इतिहास और मिथकों का अनूठा संगम
होली की जड़ें हमारी प्राचीन सभ्यताओं और वेदों तक गहरी हैं। त्रग्वेद में जिस नवसस्येष्टि यज्ञ का वर्णन है, वह दरअसल अधपके अन्न (होला) को अग्नि को समर्पित करने की परंपरा थी। आज भी ग्रामीण अंचलों में गेहूं और चने की बालियों को होली की आग में भूनकर होरा या होलक के रूप में प्रसाद ग्रहण किया जाता है।
पौराणिक रूप से यह पर्व कामदेव के पुनर्जन्म और शिव की तपस्या के फल स्वरूप अनंग के रूप में उनकी व्याप्ति का उत्सव है। भक्त प्रह्लाद और होलिका की कथा हमें संदेश देती है कि जब बुराई की आग प्रचंड हो, तब केवल निर्मल भक्ति और पवित्रता ही सुरक्षित रह सकती है। यह पर्व याद दिलाता है कि हिरण्यकश्यप जैसा अहंकार चाहे कितना भी शक्तिशाली क्यों न हो, वह अटूट श्रद्धा के सामने भस्म हो जाता है।
सांस्कृतिक विविधता का इंद्रधनुष
- ब्रज की लठमार होली: यहाँ का रंग-गुलाल केवल धूल नहीं, बल्कि गोप-गोपियों के प्रेम और समर्पण की पराकाष्ठा है।
- बंगाल का डोल उत्सव: चैतन्य महाप्रभु की पालकी यात्रा के साथ कृष्ण-चेतना का विस्तार।
- महाराष्ट्र की रंगपंचमी: शिवाजी महाराज के समय से चली आ रही वीरता और उल्लास की परंपरा।
- पंजाब का होला-मोहल्ला: सिख समुदाय द्वारा शक्ति-प्रदर्शन और शौर्य का संगम।
तमिलनाडु में इसे काम-दहनम के रूप में मनाया जाता है, जो काम और वासना के त्याग का प्रतीक है। वास्तव में कश्मीर से कन्याकुमारी तक यह पर्व भाषाई और क्षेत्रीय सीमाओं को तोड़कर साझा विरासत का उत्सव बन जाता है।
हुड़दंग नहीं, यह हवन का पर्व
आज के दौर में होली के स्वरूप में कुछ विकृतियाँ आई हैं, जिन्हें सुधारना आवश्यक है। होली असल में एक सामूहिक हवन है। जब हम सामूहिक रूप से कंडे, समिधा और औषधीय लकड़ियां जलाते हैं, तो वह वातावरण की शुद्धि का वैज्ञानिक तरीका है। वर्तमान समय में रासायनिक रंगों के स्थान पर हमें पुन प्राकृतिक गुलाल (टेसू, हल्दी, चंदन) की ओर लौटना होगा। हमें समझना होगा कि बुरा न मानो होली है का अर्थ आपसी कटुता को मिटाने का अवसर है।
मनोवैज्ञानिक और सामाजिक महत्व
होली एक सामाजिक मरहम का काम करती है। यह वह दिन है, जब ऊंच-नीच, वर्ग-भेद और पुरानी शत्रुता के सारे दाग़ धुल जाते हैं। सातवीं शताब्दी में हर्ष ने रत्नावली में और भवभूति ने मालती-माधव में इस बात का सुंदर चित्रण किया है कि कैसे राजा और प्रजा के बीच की दूरी इस दिन समाप्त हो जाती थी। मनोवैज्ञानिक दृष्टि से रंगों का हमारे अवसाद पर गहरा असर पड़ता है। लाल, पीला और हरा रंग हमारे भीतर नई ऊर्जा का संचार करते हैं और होली का हुड़दंग दरअसल दमित भावनाओं को बाहर निकालने का एक माध्यम है।
ग्लोबल होती होली
आज होली सात समंदर पार तक पहुँच चुकी है। विदेशी पर्यटक हज़ारों की संख्या में भारत की गलियों में सराबोर होने आते हैं। यह भारतीय संस्कृति की विजय यात्रा है। यह पर्व हमें सिखाता है कि अतीत के दुःख को भविष्य के कंधे पर लादकर नहीं चलना चाहिए, बल्कि वर्तमान के रंगों में डूबकर एक नई शुरुआत करनी चाहिए।
प्रेम का जवाब प्रेम से
होली हमें सूत्र सिखाती है कि प्रेम का जवाब प्रेम से ही देना चाहिए। यदि जीवन में केवल अवसाद और गांभीर्य रहेगा, तो जिएंगे कब? होली वह अंतराल है, जहाँ हम अपनी थकान उतारते हैं और नई ताजगी के साथ जीवन की रणभूमि में उतरने के लिए तैयार होते हैं। आइए, इस बार की होली में केवल चेहरों को ही नहीं, बल्कि मन को भी प्रेम के रंग में रंगें। पुराने गिले-शिकवे होलिका की अग्नि में स्वाहा कर दें और गुलाल के साथ भाईचारे की एक ऐसी खुशबू बिखेरें, जो साल भर हमारे रिश्तों को महकाती रहे।
-उमेश कुमार साहू
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