होलिका दहन और विशेष ज्योतिषीय उपाय

फाल्गुन का मास नवजीवन का संदेश देता है। यह उत्सव वसंतागमन तथा अन्न समृद्धि का मेघदूत है। गुझिया की मिठास है, वहीं रंगों की बौछारों से तन-मन भी खिल उठते हैं। यह पर्व शुद्ध प्रेम व स्नेह के प्रतीक कृष्ण के रास का अवसर है, होलिका-दहन, अच्छाई की विजय का भी परिचायक भी है। सामूहिक गानों, रासरंग, उन्मुक्त वातावरण का एक राष्ट्रीय, धार्मिक व सांस्कृतिक त्यौहार है।

होलिका दहन का वैज्ञानिक दृष्टिकोण

होली के आयोजन में अग्नि प्रज्जवलित करके वायुमंडल से संक्रामक विषाणु दूर करने प्रयास होता है। इस दहन में वातावरण शुद्धि हेतु हवन सामग्री, गूलर की लकड़ी, गोबर के उपले, नारियल, अधपके अन्न आदि ऐसी सामग्री का प्रयोग किया जाता है, जिससे रोगों के कीटाणु मर जाते हैं।

जब लोग 150 डिग्री तापमान वाली होलिका के गिर्द परिक्रमा करते हैं तो उनमें रोगोत्पादक जीवाणुओं को समाप्त करने की प्रतिरोधात्मक क्षमता में वृद्धि होती है और वे कई रोगों से बच जाते है। ऐसी दूरदृष्टि भारत के हर पर्व में विद्यमान है जिसे समझने-समझाने की आवश्यकता है। देशभर में एक साथ एक विशिष्ट रात में होने वाले होलिका दहन सर्दी और गर्मी की ऋतु-संधि में फूटने वाले मलेरिया, वायरल, फ्लू और अनेक संक्रामक रोग जन्य कीटाणुओं के विरुद्ध यह एक धार्मिक सामूहिक अभियान है।

प्राचीन काल में होली

हिरण्यकश्यप जैसे राक्षस के यहां प्रह्लाद जैसे ईश्वर भक्त पुत्र का जन्म हुआ। अपने ही पुत्र को पिता ने जलाने का प्रयास किया। हिरण्यकश्यप की बहन होलिका को वरदान था कि अग्नि उसे जला नहीं सकती। इसलिए प्रह्लाद को उसकी गोद में बिठाया गया। परंतु ईश्वरनिष्ठ बालक अपनी बुआ की गोद से हंसता-खेलता बाहर आ गया और होलिका भस्म हो गई। तभी से प्रतीकात्मक रूप से इस संस्कृति को उदाहरण के तौर पर कायम रखा गया है।

भविष्य पुराण में नारद जी युधिष्ठिर से फाल्गुन पूर्णिमा के दिन सब लोगों को अभयदान देने की बात करते हैं ताकि सारी प्रजा उल्लासपूर्वक यह पर्व मनाए। जैमिनी सूत्र में होलिकाधिकरण प्रकरण, इस पर्व की प्राचीनता दर्शाता है। विन्ध्यप्रदेश में प्राप्त 300 ईस्वी पूर्व के एक शिलालेख में पूर्णिमा की रात्रि में मनाए जाने वाले इस उत्सव का उल्लेख है। वात्स्यायन के कामसूत्र में होलाक नाम से इस उत्सव का वर्णन है।

जब लोग 150 डिग्री तापमान वाली होलिका के गिर्द परिक्रमा करते हैं तो उनमें रोगोत्पादक जीवाणुओं को समाप्त करने की प्रतिरोधात्मक क्षमता में वृद्धि होती है और वे कई रोगों से बच जाते है। ऐसी दूरदृष्टि भारत के हर पर्व में विद्यमान है जिसे समझने-समझाने की आवश्यकता है।

उपाय

  • होली व दीवाली ऐसे विशेष अवसर हैं, जब हर प्रकार की साधनाएं, तांत्रिक क्रियाएं तथा कुछ उपाय करना भी सार्थक माना जाता है।
  • दुकान या कार्यालय में सायं काल एक सफेद कपड़े पर गेहूं और सरसों की 7-7 ढेरियां रखें। इन पर एक-एक काली मिर्च रखें। 7 नींबू के 2-2 टुकड़े करके इन ढेरियों पर रखें। निम्न मंत्र का 7 बार पाठ करें- ओम् कपालिनी स्वाहा ! मंत्र पाठ समाप्ति पर इस सामग्री की पोटली बनाकर लाल मौली से गांठ लगा लें और दुकान या घर में एक सिरे से आरंभकरके चारों कोनों में घुमा कर बाहर लाकर होलिका में डाल दें।
  • दुकान, ऑफिस, फैक्ट्री या मकान में अक्सर होने वाली या अचानक चोरी या नुक्सान के बचाव हेतु सूखा नारियल और तांबे का पैसा घर या दुकान के चारों कोनों में सात बार घुमाकर होलिका में डालें।
  • होलिका में ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं महालक्ष्मये नमः मंत्र का 108 बार उच्चारण करते हुए शक्कर की आहुति दें।
  • एक सूखा नारियल, एक लौंग, काले तिल तथा कुछ पीली सरसों के दाने पीड़ित व्यक्ति पर 7 बार उल्टा घुमा के होलिका में डालें।
  • सूखे नारियल के दो आधे-आधे कटोरे की शक्ल में टुकड़े कर लें। इसमें कपूर, काले तिल, बर्फी, सिंदूर, हरी इलायची, लौंग रखके ॐ ह्रीं क्लीं फट् स्वाहा मंत्र का उच्चारण करते हुए एक माला फेरें। इसके पश्चात इस सामग्री को काले कपड़े में बांधकर होलिका की 7 परिक्रमा करके इसे उसमें अर्पित कर दें।
  • रुई की 108 बत्तियां देसी घी में भिगोकर होलिका में संबंध सुधार की अनुनय सहित डालें।
  • यदि आपको लगता है कि किसी ने आपके ऊपर तांत्रिक अभिचार किया हुआ है जिसके कारण आपकी प्रगति ठप्प हो गई है तो देसी घी में भीगे दो लौंग, एक बताशा, एक पान का पत्ता होलिका दहन में अर्पित करें। दूसरे दिन वहां की राख़ शरीर पर मलकर नहा लें। तांत्रिक अभिचार दूर हो जाएगा।
  • देसी घी में भीगे पांच लौंग, एक बताशा, एक पान का पत्ता होलिका दहन में अर्पित करें। दूसरे दिन वही राख को ताबीज में भरकर बच्चे को पहनाएं।
  • होलिका में उल्टे चक्कर लगाते हुए आक की जड़ के 7 टुकड़े, विरोधी का नाम लेते हुए डालें। यदि व्यापार में लगातार घाटा या आर्थिक हानि हो रही है तो होलिका दहन की सायं दुकान या मकान के मुख्य द्वार की चौखट पर गुलाल छिड़कें, उस पर आटे का बना चार मुखी दीपक जलाएं और होलिका में डाल आएं।
  • देसी घी में भीगे दो लौंग, एक बताशा, मिश्री, एक पान का पत्ता होलिका दहन में अर्पित करें।
  • दायें हाथ में 4 गोमती चक्र लेकर रोग मुक्ति की प्रार्थना करें। चक्र रोगी की पलंग के चारों पायों में चांदी के तार से बांध दें।

ये अनुभूत उपाय हैं जिन्हें सदियों से हमारे देश में प्रयोग करके लाभ उठाया जा रहा है। सातवीं शती के रत्नावली नाटिका में महाराजा हर्ष ने होली का जिक्र किया है। ग्यारहवीं शताब्दी में मुस्लिम पर्यटक अल्बरुनी ने अपने इतिहास में भारत की होली का विशेष उल्लेख किया है।

होली के रंग

होली आपसी मतभेद मिटाकर गले मिलने का सुअवसर है। कई बार खुशी का मौका गम में बदल जाता है। मानव शरीर पर रंगों का वैज्ञानिक और ज्योतिषीय प्रभाव दोनों पड़ता है। यह इंसान की मनोवृति प्रभावित करता है। अनुकूल रंग मूड को बढ़िया बना सकता है तो वहीं गलत रंग आपको आपस में भिड़ा सकता है। अतः गलत रंगों का उपयोग करने से बचें।

भगवान कृष्ण होली पर टेसू के फूलों का प्रयोग करते थे। इसके अतिरिक्त गुलाब की पंखुड़ियों, मेहंदी, हल्दी, पालक, पुदीना, चुकंदर, टेसू, पलाश, गुलमोहर, गेंदा, अमलतास, अनार आदि के फूल, कचनार आदि के फूलों से रंग बनाकर खेलना चाहिए। यह प्राकृतिक रंग त्वचा के लिए गुणकारी होते हैं

मदन गुप्ता ‘सपाटू’

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