आखिर कैसे आए ये चुनाव परिणाम

पांच राज्यों के चुनाव परिणामों पर कोई एक सुसंबद्ध टिप्पणी संपूर्ण स्थितियों का विश्लेषण नहीं कर सकता। किंतु सबको मिलाकर एक तस्वीर बनाएं तो इसमें दो ऐतिहासिक युगांतरकारी परिणतियां हैं- एक, पश्चिम बंगाल में भाजपा की ऐसी विजय, जो एक समय अकल्पनीय थी तथा दूसरी, तमिलनाडु में थलापति विजय की पार्टी टीवीके का चमत्कारिक प्रदर्शन। वैसे तो असम में भी भाजपा की तीसरी बार लगातार विजय महत्वपूर्ण है, पर ये दोनों घटनाएं ऐतिहासिक और युगांतरकारी हैं।
बंगाल में एक तिहाई मुस्लिम मतदाताओं के बहुमत का हर हाल में भाजपा को सत्ता में आने से रोकने और तृणमूल के समर्थन में आक्रामकता से काम करने के बावजूद भाजपा की इतनी बढ़त सामान्य घटना नहीं है। आम सोच यही थी कि ममता की शुरुआत ही 30 प्रतिशत मत और लगभग 65-70 सीटों से होती है, जबकि भाजपा को शून्य से शुरुआत करनी होगी। वैसे असम में इससे ज्यादा मुस्लिम आबादी के बावजूद भाजपा ने जीत हासिल कर कई मिथकों को तोड़ा।
असम-बंगाल की राजनीति में बुनियादी अंतर
पर असम और बंगाल की राजनीति और सत्ता के चरित्र में मौलिक अंतर है। ममता बनर्जी और तृणमूल कांग्रेस ने लोकतांत्रिक व्यवस्था में पूरी राजनीति और सत्ता का चरित्र ऐसा बना दिया था जिसमें किसी भी पार्टी के लिए उसको भेदना असंभव-सी चुनौती थी। पिछले एक दशक से ज्यादा समय के चुनावों का एक पहलू हर जगह लागू होता है और वह यह कि हिंदुत्व व अपनी संस्कृति, धर्म के प्रति हिंदुओं के पुनर्जागरण के कारण एक निश्चित वोट का आधार हर राज्य में निर्मित हो गया है और यह मत भाजपा से संतुष्ट असंतुष्ट या कुछ मायनो में नाराज होने के बावजूद वह हारे या जीते उसे या साथी दलों या उसकी अनुपस्थिति में दूसरे दलों को जाता है।
यह प्रवृत्ति पांचों राज्यों में रही है। भाजपा स्थानीय-क्षेत्रिय मुद्दों को प्रमुखता से उठाते हुए भी चुनावों को मतदाताओं को सीधे अपील करने वाले राष्ट्रीय विषयों के साथ संबद्ध करती है। भाजपा ने राष्ट्रीय सुरक्षा और जनसांख्यिकी को बंगाल एवं असम दोनों जगह प्रमुख मुद्दे के रूप स्थापित किया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सरकार द्वारा महिलाओं के उत्थान संबंधी कार्यों तथा नारी शक्ति वंदन अधिनियम (महिला आरक्षण) को लागू करने की संसदीय पहल ने भी चुनावी माहौल बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
जमीनी बदलाव को न समझ पाने से बढ़ा आश्चर्य
बंगाल के परिणाम ने केवल उन्हें चौंकाया है, जो जमीनी वास्तविकता और 2018 से मतदाताओं मुख्यत हिन्दुओं के बड़े वर्ग के अंदर बदलाव की छटपटाहट को महसूस नहीं कर रहे थे। तृणमूल कांग्रेस और ममता बनर्जी के नेतृत्व में सत्ता और पूरी राजनीति को निहित स्वार्थी तत्वों की गिरफ्त में दिए जाने से बंगाल की संस्कृति चुनावों को हर हाल में अपने पक्ष में करने की हो चुकी है।
कट्टरपंथी तत्वों को प्रत्यक्ष-परोक्ष संरक्षण और प्रोत्साहन के कारण पूरा प्रदेश हमेशा सांप्रदायिक भय और तनाव की स्थिति में रहा। मतदाताओं की इच्छा नहीं तृणमूल नेताओं की चाहत से आप मतदान करिए या चुपचाप घर बैठिये अन्यथा हिंसा, आगजनी, दमन, उत्पीड़न और संबंधित स्थान या प्रदेश से पलायन का दंश झेलिये। साइलेंट रीगिंग बंगाल की मुख्य चुनावी प्रवृत्ति रही है। पहले इसी रास्ते वाम मोर्चा ने लगातार जीत सुनिश्चित की और उसके विरुद्ध लंबा संघर्ष करते हुए ममता बनर्जी ने भी अपनी पूरी पार्टी को उससे ज्यादा हिंसक और दमनकारी तत्वों में परिणत कर दिया।
पलायन या हिंसा की सर्वाधिक शिकार महिलाएं होती हैं। पुरुषों के मुकाबले 1.5 महिलाओं ने ज्यादा मतदान किया। महिला होने के बावजूद ममता बनर्जी के विरुद्ध इनका बहुत बड़ा मत भाजपा को गया। भाजपा पर ध्रुवीकरण का आरोप लगाकर सतही विश्लेषण करने वाले विचार करें कि भद्र लोक माने जाने वाले बंगाल के हिंदुओं ने ममता बनर्जी की सत्ता संस्कृति के विरुद्ध विद्रोह कर भाजपा को मत दिया तो क्या इसे केवल ध्रुवीकरण कहेंगे और ऐसा हुआ भी तो क्यों?
बंगाल में लोकतंत्र बहाली का संघर्ष तेज
बंगाल में राजनीतिक संघर्ष वास्तविक लोकतंत्र की पुनर्स्थापना तथा सत्ता संस्कृति को सर्वसमावेशी बनाने का था। यह जिम्मेवारी मुख्यत: प्रदेश के गैर-मुस्लिमों यानी हिंदुओं को ही लेना था। हिंदुओं के अंदर अगर यह भाव पैदा हुआ कि इस सरकार के रहते हमारा अस्तित्व संकट में है तो इसके कारण अत्यंत गहरे हैं। बांग्लादेश की घटनाओं ने इस मनोविज्ञान को सशक्त किया कि हमें कुछ हद तक जान की बाज़ी लगानी होगी।
हिंदू आबादी में लगभग 67 प्रतिशत से ज्यादा ने भाजपा के पक्ष में वोट दिया। यह बहुत बड़ी बात है। एसआईआर में 90 लाख से ज्यादा मृत, संदिग्ध और स्थानांतरित मतदाताओं के नाम हटाने के कारण फर्जी मतदाताओं का खेल खत्म हो गया। सवा 2 लाख केंद्रीय बलों की उपस्थिति, चुनाव के बाद भी सुरक्षा बलों के बने रहने की घोषणा, दूसरे राज्यों के अधिकारियों की चुनाव पर्यवेक्षक के रूप में नियुक्ति, प्रदेश के अधिकारियों का व्यापक पैमाने पर स्थानांतरण या चुनाव प्रक्रिया तक कार्य मुक्ति तथा चुनावी हिंसा वाले चिह्नित व्यक्तित्वों के विरुद्ध कार्रवाई व सतर्क दृष्टि आदि ने भय व संशयग्रस्त मतदाताओं में सुरक्षा को लेकर आश्वस्त किया, जिससे चुनावी वातावरण में आमूल परिवर्तन आया।
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भाजपा की रणनीति ने मजबूत किया जीत का भरोसा
भाजपा ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एवं गृहमंत्री अमित शाह के नेतृत्व में पहले दिन से यह विश्वास दिलाने की रणनीति अपनाई कि हम सत्ता में आ रहे हैं तथा किसी के साथ अन्याय हुआ तो पूरी पार्टी खड़ी रहेगी। इन सबका सम्मिलित परिणाम है, असंभव् -सा लगने वाला सत्ता-परिवर्तन। असम में पहले दिन से स्पष्ट था कि वह भाजपा को बड़ी चुनौती नहीं है। किंतु गौरव गोगोई भी जोरहाट से हार जाएंगे, इसकी कल्पना कांग्रेस को नहीं रही होगी।
राहुल गांधी एवं प्रियंका वाड्रा व उनके रणनीतिकारों के कारण टिकट बंटवारे तक नेता पार्टी छोड़कर जाते रहे। भाजपा ने पिछले लंबे समय से असम अस्मिता व आसामी संस्कृति को भारत के व्यापक हिंदुत्व संस्कृति और राष्ट्रभाव से जोड़ने में सफलता पाई है। मुगलों से युद्ध करने वाले लचित बऱफुकन से लेकर महाराज शंकर देव को जिस तरह भाजपा ने प्रस्तुत किया एवं जनजाति गौरव को निचले स्तर तक ले गए उन सबसे सामाजिक सांस्वफढतिक पुनर्जागरण हुआ। सरकार की आर्थिक, सामाजिक और सुरक्षा नीति ने उसे बल दिया।
हिमंता विस्वासरमा की छवि देश में भले घुसपैठी और मुस्लिम विरोधी बनाई गई, किंतु इसके साथ असम में उन्होंने बच्चों व युवाओं के मामा और महिलाओं के भाई के रूप में भी छवि बनाई। असम में घुसपैठ लंबे समय से मुद्दा रहा है। इसके आधार पर वहां 80 के दशक में छात्र नेताओं की सरकार बनी। बाकी पार्टियों ने इसका उपहास उड़ाया और भाजपा आज भी इस पर कायम है। इन सबका असर हुआ और भाजपा तीसरी बार सत्ता बनाए रखने में कामयाब रही।
तमिलनाडु में विजय की पार्टी का चौंकाने वाला उभार
तमिलनाडु में थलापति विजय की टीवीके या तमिलगा वेत्री कझगम दोनों मुख्य गठबंधन द्रमुक नेतृत्व आईएनडीआईए तथा अन्नाद्रमुक भाजपा गठबंधन को पछाड़कर नंबर एक की पार्टी बन जाएगी, इसकी कल्पना किसी को नहीं थी। दरअसल, द्रमुक के विरुद्ध सत्ता विरोधी रुझान ज़मीन पर दिख रहा था। इसी कारण एमके स्टालिन ने एक तिहाई विधायकों का टिकट काटा। उन्होंने तमिलवाद और तमिल भाषा को लेकर आाढामक राजनीति की।
पूरी पार्टी और कांग्रेस को छोड़कर गठबंधन सनातन और हिंदुत्व के विरुद्ध जहर उगलने लगी। विधानसभा में अलग से तमिल राष्ट्रगान तक की परंपरा शुरू की। आम लोगों को इस तरह का अतिवाद स्वीकार नहीं था और द्रमुक को इसका आभास हुआ। चुनाव आते-आते सनातन विरोधी वक्तव्य बंद हो गए और उदयनिधि स्टालिन जो एक समय सनातन के समूल नाश की बत करते थे, मंदिर-मंदिर घूमने लगे।
अन्नाद्रमुक और भाजपा गठबंधन सत्ता विरोधी जन असंतोष और लोगों की आकांक्षाओं को अभिव्यक्त करने में सफल नहीं रहे और इसका लाभ विजय को मिला। वैसे भाजपा वहां केवल 27 सीटों पर लड़ रही थी। विजय फिल्मी कैरियर छोड़कर तमिलनाडु की राजनीति बदलने की घोषणा के साथ आए और 2024 में पार्टी बनाने के बाद लगातार सक्रिय रहे। यद्यपि उन्होंने दोनों पक्षों का मत काटा, किंतु द्रमुक को ज्यादा क्षति पहुंचाई। ईसाइयों के मत का भी बड़ा हिस्सा उनके खाते में आया और मुस्लिम मतों का भी। यहां से तमिलनाडु की राजनीति में एक नए दौर की शुरुआत हो रही है।
एमजीआर के बाद राजनीति में विजय का उभार
एमजी रामचंद्रन के बाद विजय दूसरे बड़े फिल्म स्टार होंगे, जिनके राजनीति में लंबे समय तक रहने की संभावना है। इसे नास्तिकतावाद और आाढामक तमिलवाद की आंशिक पराजय के रूप में देखा जाना चाहिए। केरल में भाजपा ने खूब काम किया, जमीनी मुद्दे उठाए, धार्मिक प्रवृत्ति को देखते हुए लोगों की इच्छा को वाणी भी दी। परिणामस्वरूप उसके जनाधार में उछाल आया, 2024 में त्रिशूर लोकसभा सीट पर जीत तथा तिरुवनंतपुरम के नगर निगम पर आधिपत्य इसका प्रमाण है।
कुछ वर्ष पहले तक इसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती थी। किंतु अभी प्रदेश में व्यापक जनाधार और चुनावी सफलता की दृष्टि से यह कम है। लगातार 10 वर्ष सत्ता में होने के कारण वाम मोर्चा के विरुद्ध व्यापक असंतोष था और उनके सामने विकल्प के रूप में कांग्रेस नेतृत्व वाला यूडीएफ था। कुल मिलाकर इन परिणामों का भी निष्कर्ष यही है कि राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य 2024 के लोकसभा चुनाव के समय से काफी बदल चुका है।

भारत के लोगों के लिए भाजपा अभी भी व्यक्तिगत, आंतरिक व राष्ट्रीय सुरक्षा, हिंदुत्व अभिप्रेरित व्यापक राष्ट्रवाद तथा क्षेत्रीय अस्मिता को सकारात्मक महत्व, आर्थिक विकास के प्रति प्रतिबद्ध, विरासत के संरक्षण तथा सामाजिक न्याय व लैंगिक समानता को सही परिपेक्ष में ज़मीन पर उतारने वाली पार्टी के रूप में मुख्य विकल्प बनी हुई है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में 2014 लोकसभा चुनाव परिणाम से यह मिथक टूटा था कि बगैर मुस्लिम मत के पेंद्र में किसी पार्टी को अकेले बहुमत नहीं मिल सकता। बंगाल के चुनाव परिणाम ने इस मिथक को अंतिम बार ध्वस्त कर दिया।
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