कई मामलों में ‘एक राष्ट्र, एक नियम’ की व्यवस्था है, ..तो फिर शिक्षा के क्षेत्र में क्यों नहीं?
हर माता-पिता का सपना होता है कि उनका बच्चा प्राइवेट स्कूल में पढ़े। आखिर ऐसा हो भी क्यों नहीं, क्योंकि अब प्राइवेट स्कूल पढ़ाई के लिए कम, एयरकंडीशनर क्लासरूम, बसें और लग्जरी व्यवस्था के लिए अधिक चर्चित रहते हैं। हां, अगर एक शिक्षा नीति और एक व्यवस्था हो तो शायद प्राइवेट बनाम सरकारी का रोना खत्म हो सकेगा अन्यथा सरकारें हर वर्ष योजनाएं बनाती रहेंगी। वैसे घोषणा करने में जाता ही क्या है, सरकारें तो यही कर रही हैं।
आज भारत में एक देश-एक नीति कई क्षेत्रों में कायम है। मगर शिक्षा के मामले में यह आजादी के अमृत महोत्सव मनाए जाने के बाद भी कहीं नजर नहीं आ रही। पूरे देश में एक राष्ट्र एक कर के तहत अप्रत्यक्ष कर को सरल बनाया गया तथा एक समान करने के लिए जीएसटी है। इसी तरह सस्ते राशन की व्यवस्था के लिए एक राष्ट्र एक राशन कार्ड है। देश में बिजली की निर्बाध आपूर्ति के लिए एक राष्ट्र एक ग्रिड की व्यवस्था है। जबकि पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद के नेतृत्व में इस पर मनन हो चुका है कि एक राष्ट्र एक चुनाव कैसे कराए जाएं?
इसी प्रकार एक जमाने में एक रुपए में पूरे देश में कहीं से फोन करने की सुविधा भी रही है। लेकिन हर राज्य में शिक्षा के लिए तीन-तीन प्रणालियां चल रहीं हैं। सीधी सी भाषा में कहें तो एक देश एक शिक्षा नीति क्यों नहीं है? और यह कब आयेगी, यह भी किसी को पता नहीं है? दिल्ली में आम आदमी की सरकार के दौर में सबसे अधिक चर्चित हुए थे सरकारी विद्यालय। कहा जाता है कि इनमें दाखिले के लिए लोग सिफारिश तक करवाते थे क्योंकि इनकी टीआरपी इतनी थी कि पूरे देश में इनकी मिसाल दी जाती थी। कई मौके तो ऐसे भी आए जब दूसरे राज्यों ने इनके जैसे बनने के लिए काम करना आरंभ किया।
निजी स्कूलों से मुकाबले की तैयारी में राजस्थान सरकार
अब राजस्थान की सरकार भी निजी स्कूलों से मुकाबले के लिए यहां के सरकारी स्कूलों में परिवर्तन करने जा रही है। यह जानते हुए भी कि यहां के सरकारी स्कूलों की स्थिति इतनी खराब है कि कई जगहों पर उन्हें भैंसों के तबेले जैसा कहा जाता है। फिलहाल बदलाव इस बात को लेकर हो रहा है कि यहां के सरकारी स्कूल भी एक अप्रैल से खुल जाएं ताकि वह प्राइवेट से मुकाबला कर सकें। कितनी हास्यास्पद बात है, एक राज्य में तीन-तीन शिक्षा प्रणालियां चल रही हैं और पूरे देश में एक शिक्षा नीति भी नहीं है। लेकिन राजस्थान सरकार ने प्राइवेट स्कूलों से मुकाबले के लिए तलवार निकाल ली है।
राजस्थान में बदलाव पर बात बाद में पहले यह जान लीजिए कि देश की शिक्षा नीति के हाल क्या हैं? प्राइवेट स्कूलों की बराबरी कैसे होगी, इस बात पर सोचने की फुर्सत उन नीति-नियंताओं को नहीं है जो दाखिले, मुफ्त की किताबें, बैग, भोजन, जूते-चप्पल तथा दूसरी फ्री सुविधाओं के दम पर नामांकन बढ़ाने को लालायित हैं। बोली-भाषा के इतने झगड़े हैं कि एक राज्य से दूसरे राज्य में जाने में भी आम जनता डरती है। इससे बड़ी शर्मसार करने वाली बात क्या होगी कि एक समय इस पर बहस चली थी कि सरकारी नौकरियों में राज्य के लोगों को ही प्राथमिकता दी जाए।
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देश में तीन अलग-अलग शिक्षा बोर्डों की व्यवस्था
ऐसी स्थिति में एक शिक्षा नीति कैसे आएगी? देश में अभी तीन तरह के शिक्षा बोर्ड हैं। एक केंद्रीय बोर्ड अर्थात सीबीएसई। दूसरा आईसीएसई और तीसरा राज्य शिक्षा बोर्ड। राज्य शिक्षा बोर्ड में राजस्थान, उत्तर प्रदेश, बिहार,मध्य प्रदेश जैसे बोर्ड भी हैं, जो हमेशा चर्चा में रहते हैं। पूरे देश में यह मुहावरा भी चलता है कि यूपी-बिहार से पास होगा! खैर, एक शिक्षा नीति सरकार कब लाएगी? इस पर संसद-राज्यसभा तथा स्थानीय स्टेट सौंध भी कभी बहस नहीं करती।
भाषा विवाद का हाल यह है कि जैसे ही महाराष्ट्र या केरल में हिंदी की बात की जाती है तो उत्तर के लोगों के साथ मार-पीट तथा वहां से भगाने जैसी घटनाएं होने लगती हैं। शिक्षा विशेषज्ञ बताते हैं कि केन्द्र सरकार की ट्रांसफर नीति भी इसमें अपना रोल निभाती है। केंद्रीय विद्यालयों में उन बच्चों को तो दाखिला मिलता है, जिनके माता-पिता केन्द्र की नौकरी करते हैं पर उन्हें प्राथमिकता नहीं मिलती, जो दूसरे बोर्ड से, दूसरे शहर से पास होकर आते हैं।
आखिर एक राष्ट्र एक शिक्षा प्रणाली की नीति सरकार क्यों नहीं ला पा रही या क्यों नहीं आ रही? इस पर दो नजरियों से देखना होगा। एक यह कि देश के कई राज्यों की भाषाएं अलग-अलग है। यहां का कल्चर भी अलग है और यहां पर रहने वाले लोगों की जरूरत तथा कार्यप्रणाली सभी अलग-अलग हैं। ऐसी स्थिति में एक ही भाषा या एक ही कल्चर से कैसे काम चलेगा? तमिलनाडु,पश्चिम बंगाल जैसे राज्य नई शिक्षा नीति-2020 के तहत राज्य मातृभाषा तथा तीन भाषा सूत्र जैसे प्रावधानों का विरोध करते हैं।
अलग-अलग राज्यों की जरूरतें शिक्षा नीति में बाधा
सामाजिकता विविधता में केरल-उड़ीसा-बिहार की जरूरतें पूरी होना संभव नहीं हैं और सबसे बड़ी समस्या यह है कि दोनों केंद्रीय और स्टेट बोर्डों के पाठ्यक्रम तथा मूल्यांकन प्रणालियां इतनी अलग हैं कि उनमें समानता के लिए लंबी एकता करनी होगी। राजस्थान बोर्ड के जानकार बताते हैं हर बोर्ड अपने सिलेबस पर काम करता है। सीबीएसई तो जब-तब बदलाव करता है, पर स्टेट बोर्डों में बदलाव कम ही होता है। जो महत्वपूर्ण बात है, वह यह कि सीबीएसई पूरे भारत में एक तरह का ही पाठ्यक्रम रखता है जबकि हर स्टेट का पाठ्यक्रम क्षेत्रीय भाषाओं और संस्कृति को महत्व देते हैं। संभवत भारत में विभिन्नता का जीवन ही एक शिक्षा प्रणाली लाने में बाधक है।
अब इस पर भी नजर डाल ली जाए कि सीबीएसई और स्टेट बोर्ड के स्कूलों में जो अंतर है वह कैसे बाधक है? पूरे देश में जब कहीं से भी सीबीएसई की मान्यता की बात आती है, तो केंद्रीय बोर्ड द्वारा तय मानक के बिना मान्यता नहीं मिलती। परंतु जब स्टेट बोर्ड से मान्यता मांगी जाती है, तो वह आसानी से मिल जाती है। राजस्थान में ही नहीं दूसरे राज्यों के सरकारी स्कूलों को ही देख लीजिए, वहां पर अव्यवस्थाएं इतनी ज्यादा हैं कि वह प्राइवेट के दस प्रतिशत के बराबर भी परफोमर नहीं बन पाते।
अकेले राजस्थान के 65 हजार सरकारी स्कूलों में से 46 हजार में तो टॉयलेट की इतनी खराब स्थिति में हैं कि सरकार उन्हें जर्जर मानती है। राजधानी जयपुर में ही 2500 स्कूलों में बच्चे किसी दीवार के किनारे या पेड़ की ओट में टॉयलेट जाते हैं। सोचिए, ऐसे में अप्रैल में भले ही स्कूल खुल जाएं, किताबें समय से पहले पहुंच जाएं लेकिन क्या जहां बच्चों के लिए टॉयलेट तक नहीं हैं, वहां पर माता-पिता अपने बच्चों को भेजेंगे?
सरकारी स्कूलों की गुणवत्ता पर उठे गंभीर सवाल
जिन स्कूलों की छतें बिना बरसात के भी गिर जाती हैं, वहां पर कौन माता-पिता होंगे जो अपने बच्चों को दाखिलायुद्ध में भेजेंगे?इस बात पर भी सरकार को सोचना होगा कि रिजर्वेशन से आए शिक्षक जो 19 का पहाड़ा या अंडे की अंग्रेजी नहीं जानते वह कैसे प्राइवेट स्कूलों के बच्चों को आकर्षित करेंगे? अगर बच्चे डमी क्लास के लिए प्राइवेट स्कूलों में जा रहे हैं, तो क्या सरकारी में भी वह इसीलिए जाएंगे? वैसे सरकारी तो डमी स्कूल जैसे ही लगते हैं। हां, दिल्ली या दूसरे राज्यों के कुछ स्कूल जरूर प्राइवेट की बराबरी कर सकते हैं पर ये हैं कितने?
और इनमें मिलने वाली सुविधाएं क्या सुविधा माफिया हड़प नहीं रहा है? अब प्राइवेट के बाद सरकारी विद्यालयों में एडमिशन महोत्सव भी शुरु हो रहा है, तो क्या सरकारी विद्यालयों में भी दाखिलों का रिर्काड बनेगा, यह प्रश्र सभी के सामने है? इस बात को भी नहीं भूलना होगा कि देश के आधे सरकारी स्कूलों में इंटरनेट तक नहीं है, जबकि आज कंप्यूटर सबसे पहली शिक्षा सीढ़ी बन चुका है।

देश के सरकारी विद्यालयों में कम से कम एक लाख में बिजली नहीं है, पचास हजार से अधिक में पीने का पानी नहीं है, करीब 58 प्रतिशत में कंप्यूटर नहीं हैं, 40 प्रतिशत में खेल मैदान नहीं हैं, लेकिन स्टेट सरकारें हैं कि देश के 4.50 लाख से अधिक प्राइवेट स्कूलों से बराबरी का सपना देख रही हैं। यह कम मजेदार बात नहीं है कि देश में दस लाख से अधिक सरकारी स्कूल हैं लेकिन हर माता-पिता का सपना होता है कि उनका बच्चा प्राइवेट स्कूल में पढ़े।
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