भारत और कनाडा : बहाल होते रिश्ते
इसे सुखद ही कहा जाएगा कि कनाडा में सत्ता परिवर्तन के बाद, कनानास्किस में हुए जी-7 शिखर सम्मेलन के दौरान, भारत और कनाडा के शीर्ष नेताओं की मुलाकात से दोनों देशों के रिश्तों के पटरी पर लौटने के शुभ संकेत मिले हैं। गौरतलब है कि भारत और कनाडा दो जीवंत लोकतंत्र हैं। दोनों के आपसी रिश्ते ऐतिहासिक रूप से लोकतांत्रिक मूल्यों, बहुलवाद और लोगों के बीच गहरे संपर्क पर आधारित रहे हैं।
लेकिन हाल के वर्षों में इन्हें उतार-चढ़ाव का शिकार होना पड़ा। 2023 में खालिस्तानी अलगाववादी नेता हरदीप सिंह निज्जर की हत्या को लेकर कनाडा ने भारत पर आरोप लगाए। इससे दोनों देशों के बीच कूटनीतिक तनाव चरम पर पहुँच गया था। परिणामस्वरूप, राजनयिकों का निष्कासन और उच्चायुक्तों की वापसी जैसे कदम उठाए गए। इन कार्रवाइयों ने द्विपक्षीय रिश्तों को निम्नतम स्तर पर ला खड़ा किया।
खालिस्तानी तनाव से बदलाव की ओर बढ़ते कदम
कहना न होगा कि पिछले कुछ वर्षों में, खालिस्तानी मुद्दा दोनों देशों के बीच तनाव का प्रमुख कारण बना। भारत ने कनाडा में खालिस्तानी समर्थकों के प्रति वहाँ की सरकार की नरमी को अपनी क्षेत्रीय अखंडता के लिए खतरा माना, जबकि कनाडा ने निज्जर हत्याकांड में भारत की कथित संलिप्तता को गंभीरता से लिया। इस विवाद ने न केवल कूटनीति को प्रभावित किया, बल्कि व्यापार, शिक्षा और अप्रवासन जैसे क्षेत्रों में भी अनिश्चितता पैदा की।
कनाडा में पढ़ने वाले भारतीय छात्र, जो वहाँ की अर्थव्यवस्था में अहम योगदान देते हैं और वहाँ बसे भारतीय समुदाय इस तनाव से चिंतित रहे। इसे क्या कहा जाए कि एक ओर तो 2023 में भारत और कनाडा का द्विपक्षीय व्यापार 9.36 अरब अमेरिकी डॉलर तक पहुँच चुका था और कनाडा भारत में 18वाँ सबसे बड़ा निवेशक बन गया था; तथा दूसरी ओर व्यापक आर्थिक भागीदारी समझौते (सीईपीए) पर वार्ता रुक गई थी। इससे आपसी विश्वास की क्षति का अंदाज़ा सहज ही लगाया जा सकता है।
इसके लिए कनाडा के तत्कालीन प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो की खालिस्तान समर्थकों को प्रश्रय देने की नीति को ज़िम्मेदार माना जा सकता है। यही वजह है कि 2025 की शुरूआत में, उनके इस्तीफे और नए प्रधानमंत्री मार्क कार्नी के नेतृत्व में सरकार के गठन से रिश्तों के सुधरने की उम्मीद जगी। उन्होंने शुरूआती हिचक से पार पाकर 15 से 17 जून, 2025 तक कनानास्किस में आयोजित जी-7 शिखर सम्मेलन में भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को आमंत्रित किया।
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संवेदनशीलताओं के साथ साझेदारी की नई राह
इस मौके पर दोनों नेताओं की मुलाकात ने रिश्तों में जमी बर्फ को तोड़ने का काम किया। दोनों ने उच्चायुक्तों की बहाली, राजनयिक सेवाओं को सामान्य करने और रुकी हुई व्यापार वार्ता को पुनः शुरू करने पर सहमति जताई। इसके अलावा, स्वच्छ ऊर्जा, कृत्रिम मेधा और आतंकवाद के खिलाफ सहयोग जैसे क्षेत्रों में चर्चा ने भविष्य के लिए सकारात्मक आधार तैयार किया।
इसके बावजूद, यकीन के साथ यह नहीं कहा जा सकता कि आगे की राह बहुत आसान है। भारत कनाडा से खालिस्तानी उग्रवाद पर ठोस कार्रवाई की अपेक्षा रखता है, जबकि कनाडा अपनी आंतरिक राजनीति के दबाव के आगे मजबूर हो सकता है। इन हालात में दोनों देशों को एक-दूसरे की संवेदनशीलताओं का सम्मान करते हुए कूटनीतिक संवाद को मजबूत करना होगा। वियना कन्वेंशन के तहत राजनयिक मानदंडों का पालन और आपसी विश्वास की बहाली सबसे ज़रूरी है।
व्यापार, प्रौद्योगिकी और शिक्षा जैसे क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने से दोनों को ही न केवल आर्थिक लाभ होगा, बल्कि लोगों के बीच संपर्क भी गहरा होगा। कुल मिलाकर, भारत-कनाडा रिश्तों का भविष्य आपसी सम्मान और साझा हितों पर निर्भर है। अत दोनों देशों को अतीत के विवादों से ऊपर उठकर सकारात्मक और रचनात्मक साझेदारी की ओर बढ़ना चाहिए। टूटे तारों को जोड़ना आसान नहीं, लेकिन बकौल इरशाद ख़ान सिकंदर-
रिश्ता बहाल काश फिर उसकी गली से हो;
जी चाहता है इश्क़ दोबारा उसी से हो!
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