होली के रंगों का विराट रूप है भारतीय कला
होली के मौके पर रंग केवल रंग नहीं होते, वे भावनाओं की अभिव्यक्ति बन जाते हैं। होली हमें सिखाती है कि जीवन बहुरंगी है और कला इसी बहुरंग बोध का फलक रचती है। होली में कला अपनी संपूर्ण ऊंचाइयों पर पहुंचती है, जब रंगोत्सव के आनंद में अमीर, गरीब, छोटे और बड़े का भेद मिट जाता है। आज भी होली के मौके पर सबसे ज्यादा राधा-कृष्ण द्वारा होली खेलते हुए चित्र सबसे ज्यादा बिकते हैं। नृत्य और लोकगीत में भी प्रेम और समानता का ऐसा जज्बा कहीं देखने को नहीं मिलता, जैसा होली के सरस रंगों में दिखता है। होली का सबसे सुंदर पक्ष यह है कि इसमें औपचारिकता नहीं होती।
कला के विभिन्न पहलू होली के रंगों को विशिष्ट कैनवास बना लेने के कारण हमारे जीवन के बीहड़ में अपने रंग दिव्यता का पर्व बन जाते हैं। इसलिए होली में रंगों की अपनी मुखर स्मृति हम सबको रंगने में अहम भूमिका निभाती है। होली में भारतीय आत्मा के भावनात्मक पक्ष की अभिभूति होती है। चित्रकला, संगीत, नृत्य, साहित्य सबमें होली की चटख मौजूद होती है। 15वीं, 16वीं शताब्दी में भी लोक चित्रकार साल के ज्यादातर समय पर राधा-कृष्ण के होली खेलते चित्र बनाते थे और होली पर वे सारे के सारे बिक जाते थे।
राधा-कृष्ण परंपरा में रंग, प्रेम और आध्यात्मिकता का उत्सव
इससे सोचा जा सकता है कि भारतीय कला पर होली पर्व का कितना मजबूत रिश्ता है। राजस्थानी और पहाड़ी शैली की लघु चित्रकला वास्तव में राधा-कृष्ण की होली खेलने की परंपरा पर आधारित कला शैली है, जिसमें रंगों और दृश्यों से ज्यादा प्रेम और आध्यात्मिकता चित्रित होती है।
लाल रंग प्रेम और ऊर्जा का प्रतीक माना जाता है, जबकि पीला रंग आस्था और पवित्रता का परम कृत्य समझा जाता है। ज्यादातर राधा-कृष्ण के होली चित्र पीले और लाल रंगों के अद्भुत संयोजन से मूर्त होते हैं। ब्रज क्षेत्र की होरी, ठुमरी और धमार में होली केवल एक घटना नहीं बल्कि रंग और संगीत की अनुगूंज होती है।




भारतीय कला और नृत्य में रंग, भाव और सृजनात्मकता का पर्व
इसलिए आजतक लाखों चित्रकारों ने आज ब्रज में होली रे रसिया जैसी पंक्ति के अनंत आयामों को चित्रित करते हुए, अभी भी इसकी सारी रंग संभावनाओं को समेट नहीं सके और 15वीं, 16वीं शताब्दी से लेकर आजतक होली गीतों से होली चित्र सजते रहे हैं। नृत्यकला में भी होली का विशेष स्थान है, विशेषकर कथक और ओडिसी जैसे शास्त्राय नृत्यों में होली आधारित विभिन्न नृत्य प्रस्तुतियां वास्तव में रंग और कला की उच्चतम कल्पनाएं होती हैं।
होली के जितने भी मन में भाव उठते हैं, कलाकारों ने उन सभी भावों को चित्रमयता प्रदान की है। इसलिए होली महज एक पर्व नहीं बल्कि भारतीय जीवनशैली के सारे उच्चतम मानकों को निर्धारित करने वाली गतिविधि है। होली का भारतीय कला जगत में उतना ही महत्व है, जितना नृत्य और संगीत का अभिनय जगत में है। इसलिए हर साल आने वाली होली भारतीय कला को बार-बार नये आयाम तक पहुंचाती रही है। इसका सबसे भावनात्मक पहलू यह है कि यह इंसान को कला के किसी भी रूप में पूरी मासूमियत के साथ ला जोड़ती है। रंग कला के साथ भी यही हुआ है।
-नरेंद्र शर्मा
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