भारत की युवा-केंद्रित छवि
वीर बाल दिवस पर भारत मंडपम में हुए राष्ट्रीय कार्यक्रम में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संबोधन को न केवल इतिहास की गूँज, बल्कि आधुनिक भारत के लिए गहन दार्शनिक और रणनीतिक घोषणा कहना अधिक उचित होगा। यह भाषण गुरु गोविंद सिंह के चार साहिबजादों – अजीत सिंह, जुझार सिंह, जोरावर सिंह और फतेह सिंह – की शहादत की याद में नहीं रुका, बल्कि उसे वर्तमान संघर्षों से जोड़ते हुए एक संकल्पपूर्ण संदेश दे गया। कठोर मुगल साम्राज्य को किशोरावस्था में चुनौती देने वाली, साहिबजादों की वीरता को प्रधानमंत्री ने ठीक ही उम्र और अवस्था की सीमाओं को तोड़ने वाला प्रतीक बताया।
भाषण का मूल स्वर साहिबजादों की शहादत को धार्मिक कट्टरवाद के विरुद्ध भारत के मूल्यों की विजय के रूप में चित्रित करने वाला था। प्रधानमंत्री ने कहा, साहिबजादे क्रूर मुगल साम्राज्य के सामने पत्थर की तरह अडिग बनकर खड़े हो गए, धार्मिक कट्टरवाद और आतंकवाद की नींव हिला दी। यह मात्र ऐतिहासिक पुनरावलोकन नहीं, बल्कि एक संदेश है। भारत का संघर्ष सदैव सत्य, धर्म और न्याय के पक्ष में रहा है! यह वीरता हर भारतीय को शक्ति प्रदान करती है। संदेश स्पष्ट है – युवा पीढ़ी को इतिहास से प्रेरणा लेनी चाहिए, सांस्कृतिक विरासत को जीवंत रखना चाहिए, ताकि साहिबजादों जैसी वीरता आधुनिक चुनौतियों – जैसे धार्मिक असहिष्णुता या वैश्विक आतंकवाद – का सामना कर सके।
मैकॉले नीति पर प्रहार और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का संदेश
भाषण का गहन अर्थ तब उभरता है जब प्रधानमंत्री औपनिवेशिक मानसिकता की आलोचना करते हैं। 1835 में थॉमस मैकॉले द्वारा बोए गए बीज को वे आजादी के बाद भी भारतीय नायकों को भूले रहने का कारण बताते हैं। भारत ने औपनिवेशिक मानसिकता से हमेशा के लिए मुक्ति का संकल्प लिया है, उन्होंने घोषणा की। 2035 को मैकॉले के प्रभाव के 200 वर्ष पूरे होने का वर्ष बताते हुए, उन्होंने संकेत दिया कि तब तक भारत पूर्णतः स्वतंत्र (!) हो जाएगा। न केवल राजनैतिक, बल्कि सांस्कृतिक और शैक्षिक रूप से भी। इस संकल्प को विकसित भारत की दिशा में एक स्पष्ट रोडमैप कहा जा सकता है, जहाँ भारतीयों के बलिदानों को दबाया नहीं जाएगा।
संकेत गहरा है: यह चुनावी वर्ष 2029 से पहले की तैयारी है। भाजपा की आत्मनिर्भर भारत एजेंडा को मजबूत करने के लिए सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को हथियार बनाया जा रहा है। संसद के शीतकालीन सत्र में अंग्रेज़ी और हिंदी से इतर भारतीय भाषाओं में 160 से ज़्यादा भाषण दिए जाने को प्रधानमंत्री ने मैकॉले की अंग्रेजी-केंद्रित नीति के विरुद्ध विजय का प्रतीक बताया।भाषाई विविधता अब हमारी ताकत बन रही है, यह कहना असल में संघीय ढाँचे को मजबूत करने का प्रयास करना है। यानी, केंद्र को लगता है कि बहुभाषिकता का सम्मान क्षेत्रीय असंतोषों को शांत करने में बड़ी भूमिका निभा सकता है।
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उम्र नहीं, कर्म तय करते हैं महानता का पैमाना
उचित भी है! गौरतलब है कि प्रधानमंत्री के भाषण का केंद्रबिंदु था – युवा सशक्तिकरण। प्रधानमंत्री ने जेन जी और जेन अल्फा (युवाओं और किशोरों) को संबोधित करते हुए कहा, बच्चा हो या बड़ा, महानता कर्मों से आँकी जाती है। 20 बाल पुरस्कार विजेताओं को बधाई देते हुए, उन्होंने उनकी बहादुरी, सामाजिक सेवा और नवाचारों को साहिबजादों से जोड़ा। संदेश है: उम्र कोई बाधा नहीं, सही मार्ग पर चलो।
साहिबजादों ने कठिनाई नहीं, सहीपन देखा, यह कथन युवाओं को प्रेरित करता है कि सपने बड़े हों, लेकिन देशहित के लिए हों। नई शिक्षा नीति (एनईपी-2020) के माध्यम से व्यावहारिक शिक्षा, मातृभाषा, अटल टिंकरिंग लैब्स (रोबोटिक्स, एआई) और बहु-विषयी अध्ययन के उल्लेख में इस सदी की भावी चुनौतियों के लिए तैयार रहने का आह्वान निहित है। सरकारी पहलों – डिजिटल इंडिया, स्टार्टअप इंडिया, खेलो इंडिया, मेरा युवा भारत -को युवा नेतृत्व के लिए प्लेटफॉर्म बताते हुए, प्रधानमंत्री ने संकेत दिया कि अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था, फिनटेक और विनिर्माण में युवाओं की भूमिका बढ़ेगी।
यह आर्थिक सुधारों का पूर्वावलोकन है, जिसमें इंटर्नशिप और कौशल विकास से बेरोजगारी का सामना करना भी शामिल है।अंत में, भाषण का गहन अर्थ भारत की भविष्य-निर्माण क्षमता में निहित है। प्रधानमंत्री ने कहा भी कि भारत का भविष्य उसके बच्चों और युवाओं के साहस, प्रतिभा और समर्पण से चमकेगा। कुल मिलाकर, यह संबोधन भारत की युवा-केंद्रित छवि को मजबूत करनेवाला रहा।
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