बांग्लादेश में अल्पसंख्यक नरसंहार
बांग्लादेश की राजनैतिक अस्थिरता ने हाल ही में अल्पसंख्यक समुदायों, विशेषकर हिंदू समुदाय को निशाना बनाया है। हाल ही में चट्टोग्राम के रावजान क्षेत्र में सात हिंदू परिवारों के घरों को जलाने और दो युवकों – दीपू चंद्र दास एवं अमृत मंडल – की मॉब हिंसा में हत्या की घटनाएँ न केवल मानवीय त्रासदी हैं, बल्कि उस देश की संस्थागत विफलता का प्रमाण भी। ये घटनाएँ अंतरिम सरकार की कमजोरियाँ उजागर करती हैं और नए बांग्लादेश के वादों को खोखला साबित कर रही हैं। भारत के लिए यह मात्र पड़ोसी देश का आंतरिक मामला नहीं, बल्कि क्षेत्रीय स्थिरता और द्विपक्षीय संबंधों के लिए गंभीर खतरा भी है।
कहना न होगा कि इन घटनाओं के मूल कारणों में राजनैतिक शून्य प्रमुख है। शेख हसीना की सरकार के पतन के दौर में छात्र आंदोलन ने लोकतांत्रिक बदलाव की उम्मीद जगाई तो थी, लेकिन साथ ही भड़की अराजकता ने कट्टरपंथी तत्वों को पनपने का मौका दिया। इधर शरीफ उस्मान हादी की हत्या के बाद भड़की हिंसा में अल्पसंख्यकों को लक्षित करने के लिए ईशनिंदा या वसूली जैसे बहाने इस्तेमाल किए गए। सयानों की मानें तो, 2025 में मॉब हिंसा के 184 मामले दर्ज हुए, जिनमें अल्पसंख्यक सबसे अधिक प्रभावित पाए गए।
अल्पसंख्यक हिंसा से भारत-बांग्लादेश संबंध टूटने के कगार पर
मुहम्मद यूनुस की अंतरिम सरकार कानून-व्यवस्था को मजबूत करने का केवल दिखावा करती रही। लेकिन उसकी निष्क्रियता और उदासीनता ने हिंदू विरोधी हिंसा को बढ़ावा दिया। यह न केवल आंतरिक विफलता है, बल्कि वैश्विक मानवाधिकार संगठनों की चिंता का विषय भी। यह बात अलग है कि यूनुस सरकार से निष्पक्ष मानवाधिकार जाँच की उम्मीद करना दिन में तारे देखने की ज़िद जैसा है।
दुनिया देख रही है कि इस नरसंहार के परिणाम किस कदर विनाशकारी हैं। घरों को बाहर से बंद कर आग लगाने से परिवारों ने अपनी सारी संपत्ति खो दी, जबकि पलायन की धारा तेज हो गई। अल्पसंख्यक जीवित तो हैं, लेकिन भय के साये में। इससे समुदाय में अविश्वास गहरा गया है और आर्थिक नुकसान से गरीबी को और बढ़ावा मिल रहा है। वैश्विक स्तर पर, यह घटना इस्लामी कट्टरता के उदय को उजागर करती है और अल्पसंख्यकों के नरसंहार पर तुरंत प्रतिक्रियाकी ज़रूरत जताती है।
दरअसल, इस समस्त घटनाक्रम में सबसे ज़्यादा नुकसान भारत-बांग्लादेश रिश्तों का हो रहा है।
एक समय के स्वर्णिम रिश्ते अब पूरी तरह टूटने के कगार पर हैं! भारत ने उच्चायुक्त को दो बार तलब किया, जबकि बांग्लादेश ने भारतीय राजनयिक को समन भेजा। वीजा सस्पेंशन और सीमा पर तनाव बढ़ा है, जिससे पश्चिम बंगाल में प्रदर्शन हुए। शेख हसीना ने यूनुस सरकार पर अल्पसंख्यक सुरक्षा में लापरवाही का आरोप लगाया, जो द्विपक्षीय तनाव को और भड़काता है। भू-राजनैतिक दृष्टि से, यह पाकिस्तान और चीन के लिए अवसर बन रहा है।
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चीन-पाक भूमिका से भारत की सीमा और सुरक्षा पर बढ़ता खतरा
चीन ने बांग्लादेश में निवेश बढ़ाया है, जबकि पाकिस्तान एंटी-इंडिया सेंटिमेंट को भुनाने की कोशिश कर रहा है। बॉर्डर इंसिक्योरिटी बढ़ने से भारत में शरणार्थी प्रवाह और आतंकी घुसपैठ का खतरा मंडरा रहा है। व्यापार प्रभावित हुआ है। मेड इन बांग्लादेश उत्पादों का बहिष्कार शुरू हो गया है। इससे निर्यात को चोट पहुँचनी तय है। क्षेत्रीय संगठनों में सहयोग ठप्प होने से दक्षिण एशिया की स्थिरता के लिए खतरा पैदा होता दिख रहा है।
यह हिंसा अगर तुरंत न रुकी, तो अल्पसंख्यक पलायन बांग्लादेश की जनसांख्यिकी को असंतुलित करेगा। इससे भारत पर दबाव बढ़ेगा। इस वक़्त भारत को कठोर कूटनीति अपनानी चाहिए -शरणार्थी सहायता, आर्थिक दबाव, और संयुक्त राष्ट्र में प्रस्ताव। दोनों देशों को संवाद बहाल करना होगा, ताकि भू-राजनैतिक संतुलन बना रहे। लेकिन इसे क्या कहिए कि कट्टरवादी ताकतों का खिलौना बना बांग्लादेश आत्महत्या पर उतारू है! क्या यूनुस सरकार के पास अपने कवि अबुल हसन के इस सवाल का कोई जवाब है कि-
क्यों न निकाल दिया/ हमारी आत्माहुति का मुहूर्त?
क्यों न देखा/ हमारी छीजती आँखों के कोनों में/
सब कुछ खोने का दर्द?
नहीं सुनी प्यार की, कमजोर सही, पर/ कोशिश/ बोलने की?
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