ईरान का अलगाव
मध्य पूर्व की राजनीति एक बार फिर उबाल पर है। अमेरिका और इजराइल ने 28 फरवरी, 2026 को ईरान पर बड़े पैमाने के हमले शुरू किए, जिसमें परमाणु कार्यक्रम, बैलिस्टिक मिसाइल उत्पादन और सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया गया। सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह अली खामेनेई की मौत ने स्थिति को और गंभीर बना दिया। ईरान ने जवाब में इजराइल, जॉर्डन, सऊदी अरब और यूएई पर मिसाइलें और ड्रोन दागे, जिससे क्षेत्र युद्ध की चपेट में आ गया। इस बीच दुनियाभर से जिस प्रकार की प्रतिक्रियाएँ सामने आई हैं, उनसे यह साफ हो गया है कि इस जंग में ईरान बड़ी हद तक अलग-थलग सा पड़ गया है!
सयाने बता रहे हैं कि ईरान के इस अलगाव की सबसे बड़ी वजह उसका परमाणु कार्यक्रम है। 2015 के ईरान न्यूक्लियर समझौते से, 2018 में अमेरिका के बाहर निकलने के बाद ईरान ने यूरेनियम संवर्धन को तेज कर दिया। अमेरिका और इजराइल का दावा है कि ईरान परमाणु बम की दहलीज पर पहुँच चुका था, हालाँकि ईरान इसका लक्ष्य नागरिक उपयोग बताता रहा। इंटरनेशनल एटॉमिक एनर्जी एजेंसी (आईएईए) ने भी निरीक्षण न करने देने के आरोप लगाए।
यूएन प्रतिबंध और आर्थिक संकट से ईरान अकेला पड़ा
इस वजह से यूएन प्रतिबंध फिर से लग गए और ईरान की अर्थव्यवस्था चरमरा गई। तेल निर्यात आधा हो गया और महँगाई आसमान छूने लगी। यूरोपीय देश अमेरिका के दबाव में पीछे हट गए। रूस पोन युद्ध में उलझा हुआ है, जबकि चीन व्यापार युद्ध लड़ रहा है। इसका नतीजा यह हुआ कि ईरान कूटनीतिक रूप से अकेला पड़ गया। दूसरी वजह प्रतिरोध की धुरी नेटवर्क का कमजोर पड़ना है।
ईरान ने हमास, हिजबुल्लाह, हूती और इराकी मिलिशिया को समर्थन देकर अमेरिका-इजराइल विरोधी मोर्चा बनाया था। लेकिन 2023 के हमास हमले के बाद इजराइल ने इन समूहों को बुरी तरह कुचल दिया। हिजबुल्लाह के कमांडर मारे गए, हमास का संगठन बिखर गया और हूती अलग-थलग पड़ गए। ईरान की कुद्स फोर्स अब प्रभावहीन हो चुकी है। इस वजह से क्षेत्रीय देश ईरान से डरते हैं। सऊदी अरब, यूएई और बहरीन इजराइल के साथ अब्राहम समझौते के तहत करीब आ गए हैं। यहाँ तक कि तुर्की और कतर जैसे देश भी खुलकर ईरान के पक्ष में नहीं बोल रहे।
तीसरी वजह भू-राजनीतिक बदलाव हैं। मध्य पूर्व अब आर्थिक विकास और शांति की ओर बढ़ रहा है, जबकि ईरान की इस्लामी क्रांति की विचारधारा पुरानी पड़ चुकी है। यमन में हूती हमलों से वैश्विक व्यापार प्रभावित हुआ है, जिससे चीन और भारत जैसे देश नाराज हैं। रूस और चीन ईरान को हथियार दे सकते हैं, लेकिन वे पूर्ण युद्ध में नहीं कूदेंगे। अमेरिका की मैक्सिमम प्रेशर नीति और इजराइल की उन्नत तकनीक ईरान से कहीं आगे हैं।
ईरान में आंतरिक संकट और बढ़ते विरोध प्रदर्शन
चौथी वजह ईरान की आंतरिक कमजोरियाँ हैं। वहाँ विरोध प्रदर्शन बढ़े, क्योंकि आर्थिक संकट, भ्रष्टाचार और धार्मिक सख्ती से जनता तंग आ चुकी है। सर्वे तो यहाँ तक कह रहे हैं कि 73 प्रतिशत ईरानी अब धर्मनिरपेक्ष शासन चाहते हैं। खामेनेई की मौत से नेतृत्व संकट गहरा गया है। इस वजह से ईरान की सेना पूरी ताकत से नहीं लड़ पा रही। अब कुछ बात भारत की प्रतिािढया की बात करते हैं।
भारत ने संतुलित रुख अपनाया है, जिसमें किसी पक्ष का खुला समर्थन नहीं किया गया और न ही कड़ी निंदा। विदेश मंत्रालय का बयान है कि भारत गहरी चिंता में है तथा सभी पक्षों से संयम बरतने, नागरिक सुरक्षा को प्राथमिकता देने की अपील करता है। इसका कारण इजराइल के साथ स्पेशल स्ट्रैटेजिक पार्टनरशिप है, जिसमें रक्षा और तकनीक सहयोग शामिल है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का हालिया इजराइल दौरा इसी का हिस्सा था। लेकिन ईरान से तेल आयात और चाबहार प्रोजेक्ट भारत के लिए महत्वपूर्ण हैं। अगर युद्ध लंबा खिंचा, तो तेल कीमतें बढ़ सकती हैं।
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इसीलिए विदेश मंत्री जयशंकर ने दोनों पक्षों से बात की है। घरेलू स्तर पर शिया समुदाय ने दिल्ली समेत कई जगहों पर प्रदर्शन किए, लेकिन ये सीमित रहे। विपक्षी पार्टियों ने सरकार पर नैतिक कायरता का आरोप लगाया है! लेकिन, समझने की बात यह है कि भू-राजनीति के लिहाज से भारत रणनीतिक स्वायत्तता की नीति पर चल रहा है। अचरज नहीं होना चाहिए अगर भारत तनाव कम करने के लिए मध्यस्थता भी कर रहा हो! अगर सभी पक्ष संवाद का सहारा लें, तो स्थिरता आ सकती है, जो सबके हित में होगी। अन्यथा, यह जंग वैश्विक अर्थव्यवस्था को बड़ा झटका देगी।
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