कुंभ संक्रांति व्रत सूर्य का होगा अपने पुत्र के घर में प्रवेश
सूर्य (आत्मा) का प्रवेश शनि (न्याय) की राशि में होना, अनुशासन और आत्म ज्ञान का प्रतीक है। इस बार प्रयागराज की त्रिवेणी पर संगम स्नान और विजया एकादशी का उपवास इस दिन के पुण्य को अनंत गुना बढ़ा देगा।
हिंदू धर्म में संक्रांति का विशेष महत्व होता है। सूर्यदेव एक राशि से निकलकर दूसरी राशि में प्रवेश करते हैं, तो उस स्थिति को संक्रांति कहते हैं। इस माह सूर्यदेव मकर राशि से निकलकर कुंभ राशि में प्रवेश करने जा रहे हैं, जिसे कुंभ संक्रांति कहा जाता है। इस वर्ष कुंभ संक्रांति बेहद खास और दुर्लभ संयोग लेकर आ रही है। जब सूर्यदेव अपने पुत्र शनि की राशि कुंभ में कदम रखेंगे, तो उस दिन विजया एकादशी तिथि का पावन साथ मिलेगा। यह मेल साधना, दान और मोक्ष के द्वार खोलने वाला है।
ज्योतिष की दुनिया में कुंभ संक्रांति एक पॉवरफुल घटना है। सूर्य (आत्मा) का प्रवेश शनि (न्याय) की राशि में होना, अनुशासन और आत्म ज्ञान का प्रतीक है। इस बार प्रयागराज की त्रिवेणी पर संगम स्नान और विजया एकादशी का उपवास इस दिन के पुण्य को अनंत गुना बढ़ा देगा। माना जाता है कि एकादशी और संक्रांति को पवित्र नदियों में डुबकी लगाने से जन्म-जन्मांतर के पाप धुल जाते हैं। सूर्य की उपासना से स्वास्थ्य बेहतर होता है और मानसिक स्पष्टता भी आती है। शनिदेव सूर्य के पुत्र हैं। इस दिन तिल का दान और पूजा करने से शनि दोषों में भी राहत मिलती है।
पूजा विधि
सुबह गंगाजल मिले पानी से स्नान करें। तांबे के लोटे में जल, लाल फूल, कुमकुम और थोड़े अक्षत डालकर सूर्यदेव को उनके के मंत्रों के उच्चारण के साथ अर्घ्य दें। अनाज, गर्म कपड़े या तिल का दान करें। इस दिन आदित्य हृदय स्तोत्र का पाठ करें।
महत्व
मान्यता है कि संक्रांति को सूर्यदेव की पूजा करने से जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। कई स्थानों पर कुंभ संक्रांति के अवसर पर स्नान पर्व, दान-पुण्य और धार्मिक अनुष्ठान किए जाते हैं। विशेष रूप से गंगा, यमुना, गोदावरी और नर्मदा जैसी पवित्र नदियों में स्नान का महत्व बताया गया है।
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