वक्फ ढांचे में कानूनी बदलाव, बदले समय का प्रमाण

वक्फ ने पुराने मामलों के संदर्भ में बदलाव नहीं किया है लेकिन जिन पर विवाद है वे कायम रहेंगे। रिकॉर्ड में और ऑनलाइन आते ही सब पारदर्शी होगा। तो वक्फ के नाम पर हुए अन्याय के निराकरण का रास्ता प्रशस्त होगा और पीड़ितों को न्याय प्राप्त होने की ठोस संभावना बनेगी। ऐसे मामलों का सच देश के सामने होगा और इस्लाम के नाम पर हंगामा खड़ा करने वालों के चेहरे भी बेनकाब होंगे।

वक्फ संशोधन के विरुद्ध उच्चतम न्यायालय में याचिकाओं की प्रतिस्पर्धा शुरू हो चुकी है। दोनों सदनों में पारित होने के अगले दिन से ही उच्चतम न्यायालय में याचिकाएं जाने लगी और होड़ लगी है कि कौन किसको पीछे छोड़ रहा है। संसद में पारित कानून की न्यायिक समीक्षा का अधिकार उच्चतम न्यायालय को हैं। किंतु विधेयक पर राष्ट्रपति महोदया के हस्ताक्षर के पहले ही उच्चतम न्यायालय जाना किस बात का द्योतक था?

ऐसे कानून, कदम या सुधार, जिनके साथ मुस्लिम समुदाय किसी तरह जुड़ा हो उसके विरुद्ध भारत में ऐसी प्रतियोगिता आम हो चुकी है। तीन तलाक, नागरिकता संशोधन कानून और जम्मू कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाए जाने के विरुद्ध भी हमने यही देखा। इन सभी मामलों की न्यायिक परिणति देश के सामने है। दूसरी ओर बिहार में जदयू ,उत्तर प्रदेश में राष्ट्रीय लोकदल आदि के विरुद्ध दबाव डालने की कोशिश हो रही है।

वक्फ संशोधन पर समर्थन-विरोध और बदले भारत की तस्वीर

मुसलमानों का एक समूह सड़कों पर उतर रहा है, पार्टियों में दबाव डालकर कुछ इस्तीफा करवा रहा है और बयान दे रहा है कि चुनाव में सबक सिखा देंगे। संसद में बहस और मतदान के पूर्व नीतीश कुमार, चंद्रबाबू नायडू आदि के इफ्तार के बहिष्कार का भी आान किया गया। बावजूद इन पार्टियों ने दोनों सदनों में वक्फ संशोधन विधेयक का समर्थन किया और विपक्ष के आरोपों का आक्रमक खंडन करते हुए तथ्य और तर्क प्रस्तुत किया।

हमारे सामने दो दृश्य दूसरे भी हैं। लोकसभा में बहस के पूर्व सभी पार्टियों ने व्हीप जारी कर दिया था। राज्यसभा में गृह मंत्री अमित शाह ने स्पष्ट घोषणा की कि सांसद स्वतंत्र हैं, व्हीप नहीं है, वे जैसे चाहें मतदान करें। इसके बावजूद राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की संख्या से ज्यादा मत विधेयक के समर्थन में आए। इसके कोई निहितार्थ हैं या नहीं? दोनों सदनों में बहस और मतदान के दौरान देश में समर्थन और विरोध दोनों में मुसलमान उतरे। उन दो दिनों में समर्थकों की संख्या भी काफी ज्यादा थी।

अलग-अलग धार्मिक संस्थाओं और संगठनों ने खुलकर विधेयक का समर्थन किया। इनमें वे मुस्लिम मजहबी नेता और संस्थाओं के प्रमुख शामिल थे जो पहले वक्फ में किसी प्रकार के संशोधन का घोर विरोध करते थे। तो इसके भी मायने हैं। यही बदले हुए भारत का प्रमाण है। आप न्याय करने की दिशा में संकल्प के साथ बढ़ते हैं तो भ्रम और विरोध कमजोर होते-होते समर्थन बढ़ता है।

वक्फ कानून में संशोधन और संपत्ति अधिकार का सवाल

ऐसे विषयों पर सुधार और परिवर्तन के संवैधानिक कानूनी कदमों के विरुद्ध प्रचार और रोकने की कोशिश पहली बार नहीं है। वक्फ कानून, उससे संबंधित बोर्ड और ट्रिब्यूनल या न्यायाधिकरण को मुस्लिम वोट पाने की नीति के तहत सुपर सरकार, सुपर प्रशासन और सुपर न्यायपालिका की भूमिका दे दी गई थी, उस ढांचे में लाभान्वितों तथा सुख भोगने वालों के अंदर छटपटाहट स्वाभाविक है।

वक्फ कानून में संशोधन क्यों नहीं होना चाहिए था या संशोधन में क्या असंवैधानिक, इस्लाम विरोधी, मुस्लिम विरोधी है इसका एक तथ्यात्मक उत्तर विपक्ष के किसी नेता द्वारा संसद में नहीं मिला। जब एक सदस्य ने कहा कि मुसलमान कानून को नहीं मानेगा तब गृह मंत्री ने कहा कि यह संसद द्वारा बनाया गया कानून है सबको मानना पड़ेगा। संसद द्वारा विहित प्रक्रिया के तहत पारित कानून भारत के सभी क्षेत्रों और व्यक्तियों पर लागू होता है।

वक्फ ने जिस तरह पूरे देश में संपत्तियों का दावा किया, कब्जे में लिया उसकी अनेक कथाएं रिकॉर्ड में सामने हैं। यह कैसी संवैधानिक व्यवस्था थी जिसमें वक्फ किसी संपत्ति पर दावा कर दे तो वक्फ ट्रिब्यूनल के अलावा आप कहीं नहीं जा सकते। ट्रिब्यूनल बरसों लगा देगा और फैसले को सिविल न्यायालय में चुनौती भी नहीं दे सकते। यानी आपकी संपत्ति गई।

इसमें हिंदू और मुसलमान दोनों के साथ सार्वजनिक सरकारी संपत्तियां भी शामिल हैं। गृह मंत्री ने सदन में रिकॉर्ड पर कहा कि कोई गांव या शहर से बाहर नौकरी करने चला गया और उसकी संपत्ति वक्फ कर दी गई। इस्लाम किसी को दीन और बेसहारा के लिए अपनी संपत्ति के वक्फ करने की इजाजत देता है। इस पर न रोक है न हो सकती है। वक्फ में कोई बदलाव नहीं है। किंतु हम अपनी संपत्ति वक्फ में रजिस्ट्री करा सकते हैं दूसरे की संपत्ति पर कैसे दावा कर सकते हैं?

वक्फ संपत्ति पर कानूनी पारदर्शिता और समानता का सवाल

सरकार कैसे संपत्ति वक्फ कर सकती है? यूपीए सरकार के सत्ता में आने के बाद सच्चर आयोग की नियुक्ति और उसकी रिपोर्ट के बाद पूरे देश में अलग से इस्लामी ढांचा स्थापित करने की प्रक्रिया में केंद्र और राज्य सरकारों ने अनेक संपत्ति वक्फ बोर्डों को दे दी। हमारी आपकी या किसी मंदिर की जमीनों के कागजात, राजस्व आदि का विषय जिला कलेक्टर के अधीन होगा किंतु वक्फ का नहीं हो यह कैसे कानून का पालन माना जाएगा?

वक्फ इस्लाम का अंग है लेकिन भारत के संविधान और कानून के तहत सरकारों द्वारा गठित वक्फ बोर्ड और वक्फ ट्रिब्यूनल इस्लाम का विषय नहीं हो सकता। उसे संविधान और कानून के अंतर्गत ही काम करना होगा। बोर्ड में महिला सदस्य होने की अनिवार्यता के विरोध के पीछे वही सोच है जिसके तहत तीन तलाक मामले पर पर्सनल लॉ बोर्ड में उच्चतम न्यायालय में प्रस्तुत शपथ पत्र में महिलाओं को कमअक्ल वाला लिखा था।

यह भी पढ़ें… वक्फ बिल पास, अब सरकार दिखाए निर्मूल थे सब विपक्षी आरोप

कोई संपत्ति जिस उद्देश्य के लिए वक्फ हुआ उसका उपयोग उसके अनुरूप हो रहा है या नहीं तथा वक्फकर्ता ने स्वेच्छा से ऐसा किया या दबाव डालकर कराया गया इसे सुनिश्चित करने की जिम्मेवारी प्रशासन की है। वास्तव में वक्फ कानून में संशोधन एक लोकतांत्रिक और समानता के सिद्धांत के विरुद्ध, मजहब का अंग न होते हुए भी इस्लाम के नाम पर कुछ शक्तिशाली प्रभुत्वशाली मुस्लिम पुरुषों के एकाधिकार और निरंकुश ढांचे को ध्वस्त कर वक्फ की मूल सोच के अनुरूप संविधान की परिधि में लोकतांत्रिक चरित्र में परिणत करने का प्रगतिशील कदम है।

वक्फ संपत्ति में पारदर्शिता और न्याय का नया दौर

ऐसे ढांचे को संसदीय व्यवस्था के तहत ध्वस्त करना, जिसको सरकारें बदलाव की आवश्यकता महसूस करते हुए भी स्पर्श करने तक से डरती रही हो, निस्संदेह साहसिक, ऐतिहासिक और युगांतरकारी कदम है। वक्फ की संपत्ति पर इस्लाम की मान्यता के अनुसार गरीब विधवाओं, तलाकशुदा महिलाओं तथा अनाथों का अधिकार है। वक्फ बोर्ड में आपको सामान्य मुस्लिम परिवार के सदस्य शायद ही मिलेंगे।

अब इस दौर का अंत होगा तथा गरीब, वंचित, पसमांदा, महिलाएं सब इस्लाम की धारणा के अनुसार वक्फ के उचित उपयोग में भूमिका निभा सकेंगे। वक्फ ने पुराने मामलों के संदर्भ में बदलाव नहीं किया है लेकिन जिन पर विवाद है वे कायम रहेंगे। रिकॉर्ड में और ऑनलाइन आते ही सब पारदर्शी होगा। तो वक्फ के नाम पर हुए अन्याय के निराकरण का रास्ता प्रशस्त होगा और पीड़ितों को न्याय प्राप्त होने की ठोस संभावना बनेगी।

ऐसे मामलों का सच देश के सामने होगा और इस्लाम के नाम पर हंगामा खड़ा करने वालों के चेहरे भी बेनकाब होंगे। भूमि या ऐसे मामले राज्यों के विषय हैं। तो अलग-अलग राज्यों का तंत्र सरकारों की राजनीतिक नीति के अनुसार काम करेगा और इनमें समस्याएं आएंगी। किंतु वक्फ के दावों के विरुद्ध पीड़ित को न्यायालय जाने से कोई नहीं रोक सकता। और सिविल न्यायालय में व्यक्ति की पहचान और कानून के अनुसार ही फैसला होगा।

-अवधेश कुमार

अब आपके लिए डेली हिंदी मिलाप द्वारा हर दिन ताज़ा समाचार और सूचनाओं की जानकारी के लिए हमारे सोशल मीडिया हैंडल की सेवाएं प्रस्तुत हैं। हमें फॉलो करने के लिए लिए Facebook , Instagram और Twitter पर क्लिक करें।

Related Articles

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *

Back to top button