लिव-इन रिलेशनशिप : जिम्मेदारी का प्रश्न
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के सरसंघचालक मोहन भागवत का लिव-इन रिलेशनशिप पर बयान भारतीय समाज के पारिवारिक मूल्यों और उत्तरआधुनिक जीवनशैली के बीच के टकराव को उजागर करता है। इन रिश्तों को जिम्मेदारी से भागने का माध्यम बताते हुए उन्होंने पूछा है- आप जिम्मेदारी नहीं लेंगे तो कैसे चलेगा? यह कथन न केवल विवाह संस्था की पवित्रता पर बल देता है, बल्कि जनसंख्या नीति, परिवार की सामाजिक भूमिका और व्यक्तिगत उत्तरदायित्व जैसे मुद्दों को भी छूता है। कहना न होगा कि यह बयान मात्र एक सामाजिक-सांस्कृतिक संगठन के प्रमुख का मत नहीं, बल्कि एक व्यापक सामाजिक बहस का सूत्रपात हो सकता है।
गौरतलब है कि संघ प्रमुख का बयान संघ की पारंपरिक विचारधारा का प्रतिबिंब है, जिसमें परिवार को समाज की आधारशिला माना जाता है। उनके अनुसार, लिव-इन रिलेशनशिप शारीरिक संतुष्टि तक सीमित रह जाती है, जबकि विवाह एक सामाजिक अनुबंध है जो व्यक्ति को समाज में जीने की कला सिखाता है। परिवार समाज की इकाई है, जहाँ व्यक्ति समाज में जीना सीखता है। यह कथन हिंदू दर्शन की गृहस्थ आश्रम की अवधारणा से प्रेरित लगता है।
आर्थिक दबाव, युवा पीढ़ी और प्रतिबद्धता का संकट
भारत जैसे बहुलवादी समाज में, जहाँ संयुक्त परिवार की जड़ें गहरी हैं, यह दृष्टिकोण अप्रासंगिक भी नहीं। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएफएचएस-5) के अनुसार, भारत में 80 प्रतिशत से अधिक विवाह परंपरागत हैं और लिव-इन रिलेशनशिप अभी भी शहरी अभिजात वर्ग तक सीमित हैं। भागवत महोदय का जिम्मेदारी पर जोर सही मायनों में प्रासंगिक है। खासकर जब युवा पीढ़ी आर्थिक दबावों – जैसे बेरोजगारी, महँगाई और आवास संकट – के कारण स्थायी प्रतिबद्धताओं से हिचक रही है। जनसंख्या के संदर्भ में भी उनका सुझाव विचारणीय लग सकता है; लेकिन व्यावहारिक नहीं।
बेशक, इस बयान की आलोचना अपरिहार्य है। क्या यह अस्मिता विमर्शों के दौर में व्यक्तिगत स्वतंत्रता को नकारना नहीं? लिव-इन रिलेशनशिप को गलत ठहराना महिलाओं के अधिकारों को सीमित करने जैसा प्रतीत होता है न! याद रहे कि सुप्रीम कोर्ट तक ने लिव-इन को कानूनी मान्यता दी है, ताकि महिलाओं को संरक्षण मिले। संघ प्रमुख का कथन, भले ही जिम्मेदारी पर केंद्रित हो, लेकिन युवाओं को संन्यासी बनने का विकल्प देकर एक द्वंद्व पैदा करता है।
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युवा भारत, बढ़ते तलाक और लिव-इन का सामाजिक संदर्भ
या तो विवाह, या त्याग! बीच का कोई रास्ता नहीं! यह पुरुष-प्रधान दृष्टि को मजबूत करता है, जहाँ महिलाओं को गृहिणी की भूमिका में बाँधा जाता है। अचरज नहीं कि कुछ पार्टियों को इसमें हिंदू राष्ट्र की राजनीति दिखाई दे, जहाँ पारिवारिक मूल्य हथियार बन जाते हैं। सामाजिक परिप्रेक्ष्य में देखें तो, भारत -जहाँ 65 प्रतिशत आबादी 35 वर्ष से कम उम्र की है -पारिवारिक विघटन का सामना कर रहा है।
तलाक की दर शहरी क्षेत्रों में 1-2 प्रतिशत तक पहुँच गई है और लिव-इन रिश्ते विवादास्पद होते हुए भी सहजीवन का विकल्प दे रहे हैं। ऐसे में परिवार, समाज और नीति का संयोजन वक़्त की ज़रूरत है। आज नीति-निर्माताओं को ऐसी भविष्योन्मुखी योजना बनानी चाहिए, जिसमें महिलाओं के सशक्तिकरण, पुरुषों की पितृत्व जिम्मेदारी और समावेशी परिवार संरचनाओं को एक साथ स्थान मिल सके।
अंतत, मोहन भागवत का बयान एक आईना तो ज़रूर है, जो समाज को अपनी जड़ों और आकांक्षाओं के बीच संतुलन खोजने को बाध्य करता है! जिम्मेदारी का प्रश्न सार्वभौमिक है – चाहे विवाह हो या लिव-इन। यदि हम इसे व्यक्तिगत चुनाव के रूप में स्वीकार करें, तो परिवार भी बचा रह सकेगा। इक्कीसवीं सदी का भारत न तो पुरानी रूढ़ियों में कैद रह सकता है; और न ही उसे पश्चिमी व्यक्तिवाद में बह जाना चाहिए। बीच का रास्ता – जिम्मेदार सहजीवन – शायद काफी हद तक श्रेयस्कर हो!
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