माता गायत्री देवी – त्याग और शक्ति का अद्भुत संगम  

बाबा गंगाराम की लीला में लाखों भक्तों की पथ-प्रदर्शिका माता गायत्री देवी का स्थान पंचदेव मंदिर के इतिहास में बहुत ऊँचा है। भक्त शिरोमणि देवकीनंदन के पश्चात उन्होंने बाबा के भक्तों का मार्गदर्शन करने का बीड़ा उठाया। उन्होंने अपने ज्ञान, भक्ति एवं समर्पण से बाबा की लीलाओं को नयी उचाइयों तक पहुँचाया। उनको बाबा गंगाराम और उनके श्रद्धालुओं के मध्य सेतु के रूप में महसूस किया जाता था।

घोरातिघोर संकटों से घिरने पर बाबा गंगाराम के श्रद्धालुओं को यह पक्का विश्वास रहता था कि वे पंचदेव मंदिर, झुंझुनू जाकर माथा टेकेंगे और माँ गायत्री के शुभाशीष व उनके कर-कमलों से मंदिर की रज प्राप्त करेंगे तो उनके तमाम दुःखों का शमन हो जाएगा। प्रेम, करुणा, दया, परोपकार, धैर्य की प्रतिमूर्ति माता गायत्री देवी ने लाखों भक्तों को उचित मार्गदर्शन व आशीर्वचन देकर उनका जीवन बदल दिया।

बाबा गंगाराम की लीलाओं की मौन साधिका मां गायत्री देवी

भक्त शिरोमणि देवकीनंदन के साथ कोलकाता महानगर में वैभवपूर्ण जीवन त्यागने के पश्चात् वे श्रीपंचदेव मंदिर झुंझनू के परिसर में सतत साधना में लीन हो गई थीं। मान-सम्मान, प्रचार-प्रतिष्ठा से दूर सादा जीवन जीने वाली माँ अपने अंदर विराट संसार समेटे हुए थी। वे सदा भक्ति के चैतन्य लोक में रहती थीं और प्रत्येक के हृदय की बात जान लेती थीं। भक्त शिरोमणि देवकीनंदन के महाप्रयाण के समय सूर्य के समक्ष उनकी करुण पुकार से भक्त शिरोमणि देवकीनंदन की चिता पर हुए अलौकिक चमत्कार उनकी भक्ति की पराकाष्ठा को सिद्ध करने के लिए पर्याप्त है।

बाबा गंगाराम की परम साधिका एवं भक्त देवकीनंदन की सहधर्मिणी  गायत्री देवी बाबा की लीलाओं की प्रबल वाहक थीं। अपनी संतानों के ब्रह्मचर्य व्रत की प्रतिज्ञा को भी उन्होंने बाबा की लीला मानकर अंगीकार किया था। वह भक्तों के विशेष आग्रह पर भी मंदिर के बाहर नहीं आती थीं। बाबा के महोत्सवों, आयोजनों और सार्वजनिक उत्सवों में जाने के लिए उन पर अत्यधिक दबाव रहता था, पर वे एक ही बात कहती थीं कि मेरे आने से बाबा की पूजा में व्यवधान होगा। सचमुच बाबा के भक्तों को सदैव यह अहसास रहता है कि भक्त देवकीनंदन का आशीर्वाद और मां की कृपा सदा उनके साथ है।

बाबा की ज्योति में विलीन हुईं मां गायत्री देवी

मां गायत्री आध्यात्मिक शक्तियों से परिपूर्ण थीं। उनके उपदेश-निर्देश, उनकी ज्ञानमयी वाणी, पौराणिक संदर्भो की व्याख्या, सब उनकी आध्यात्मिक अनुभूतियों पर आधारित रहता था, जो भक्तों के लिए अति कल्याणकारी होता। वे बड़े सहज भाव से बाबा की  भक्ति के विषय में उपदेश देतीं। उनकी उपस्थिति में एक आध्यात्मिक परिवेश बन जाता था तथा कृपा और शांति के स्पर्श की स्पष्ट अनुभूति होती थी। उनकी सारी साधना आश्रितों के लिए थी, स्वयं के लिए नहीं।  

अंतत माता गायत्री देवी ने बाबा की प्रत्येक माह मनायी जाने वाली दशमी तिथि को अपने महाप्रयाण का समय निश्चित करते हुए, कुछ दिन पूर्व ही सबको इंगित कर दिया और सचमुच मार्गशीर्ष शुक्ल दशमी दिनांक 29 नवंबर, 2017 को बाबा गंगाराम का मंत्र उच्चारित करते हुए वे बाबा की ज्योति में लीन हो गईं। धन्य है, कलियुग में शक्ति स्वरूपा मां गायत्री की साधना, तपश्चर्या और भक्ति को। विष्णु अवतारी बाबा गंगाराम की दिव्य शुद्ध, सत्वमयी लीलाओं की साकार प्रतिमूर्ति मां गायत्री देवी की कठोर साधना भक्तों  को युग-युग तक आध्यात्मिक शक्ति प्रदान करती रहेगी।

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