सुविधाएं और विश्वस्तरीय इंफ्रास्ट्रक्चर की जरुरत
राष्ट्रीय खेल दिवस: आज खेल दिवस है। आज भारत के प्रतिष्ठित नागरिक सम्मान पद्मभूषण से सम्मानित मेजर ध्यानचंद जी का जन्मदिन है। खेल में उनके महत्वपूर्ण योगदान के सम्मान में उनके जन्मदिन को भारत में खेल दिवस के रूप में मनाया जाता है। मेजर ध्यानचंद विश्व हॉकी में शुमार महानतम खिलाड़ियों में से एक अद्भुत खिलाड़ी रहे हैं जिन्होंने अपनी प्रतिभा व लगन से देश का मस्तक गौरान्वित किया। अच्छी बात है कि देश के खिलाड़ी उनसे प्रेरणा लेकर अपने खेल का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन कर रहे हैं। अभी पिछले वर्ष ही संपन्न पेरिस 2024 ओलंपिक में भारत ने छ पदक जीते थे।
इसमें एक रजत और पांच कांस्य पदक शामिल है। गत वर्ष पहले संपन्न कॉमनवेल्थ गेम्स में भारत अपने खिलाड़ियों के श्रेष्ठ प्रदर्शन से गौरान्वित हो चुका है। तब भारत ने कॉमनवेल्थ गेम्स 2022 में पदकों की झड़ी लगाते हुए कुल 61 मेडल हासिल किए थे। इसमें 22 गोल्ड, 16 सिल्वर और 23 ब्रॉन्ज मेडल शामिल हैं। इस शानदार प्रदर्शन से भारत ने चौथा स्थान हासिल किया जिससे देश का मस्तक स्वाभिमान से दमक उठा।
खेल नीति और समाज की सोच में बदलाव जरूरी
कॉमनवेल्थ गेम्स की तरह ही टोक्यो ओलंपिक में भी भारतीय खिलाड़ियों ने अपने खेल का शानदार प्रदर्शन किया। भारत के खाते में एक गोल्ड, दो सिल्वर और चार ब्रॉन्ज समेत कुल सात पदक आए थे। उम्मीद की जानी चाहिए कि अब अगले कॉमनवेल्थ गेम्स और ओलंपिक में भारत एक नया कीर्तिमान रचेगा। यह समझना होगा कि किसी भी राष्ट्र की प्रतिभा खेलों में उसकी उत्कृष्टता और हासिल होने वाले पदकों से जुड़ी होती है।
अच्छा प्रदर्शन केवल पदक जीतने तक ही सीमित नहीं होता बल्कि राष्ट्र के स्वास्थ्य, मानसिक अवस्था एवं लक्ष्य के प्रति सतर्कता व जागरुकता को भी रेखांकित करता है। दो राय नहीं कि कॉमनवेल्थ और पेरिस ओलंपिक में मिली उपलब्धियों ने देश को गौरान्वित किया है। लेकिन एक सच यह भी है कि 140 करोड़ की आबादी वाले देश को इससे बड़ी उपलब्धि की दरकार है। ऐसा तभी संभव होगा जब देश में उत्कृष्ट खिलाड़ियों, अकादमियों और प्रशिक्षकों को बढ़ावा मिलेगा। एक आंकड़े के मुताबिक देश में सिर्फ पंद्रह प्रतिशत लोग ही खेलों में अभिरुचि रखते हैं। यह आंकड़ा निराश करने वाला है।
विचार करें तो इसके लिए भारतीय समाज का नजरिया और सरकार की नीतियां दोनों जिम्मेदार हैं। समाज में यह धारणा है कि खेल-कूद के जरिए नौकरी या रोजी-रोजगार हासिल नहीं किया जा सकता। इसलिए पढ़ाई पर ज्यादा जोर दिया जाना चाहिए। नतीजा सामने है। चिंता की बात यह भी कि सरकारें भी खेल के विकास का इंफ्रास्ट्रक्चर मजबूत करने के बजाए राष्ट्रीय खेल अकादमियों का अध्यक्ष व सदस्य कौन होगा उस पर ज्यादा फोकस करती देखी जाती हैं। भला ऐसे माहौल में खेल का विकास कैसे होगा? खेलों के विकास के लिए आवश्यक है कि सरकार की खेलनीति स्पष्ट व ईमानदार हो।
स्कूल स्तर से खेल और रोजगार का जुड़ाव
स्कूलों, कॉलेजों, विश्वविद्यालयों व खेल अकादमियों में बुनियादी ढांचे के विकास की गति तेज हो। बेहतर होगा कि सरकारें स्कूल स्तर से ही खेल को बढ़ावा देने का मिशन चलाए। स्कूलों में बच्चों की प्रतिभा एवं विभिन्न खेलों में उनकी अभिरुचि को ध्यान में रखकर उन्हें विभिन्न किस्म के खेलों में समायोजित कर उनके उचित प्रशिक्षण की व्यवस्था करे। ऐसा करने से उनकी प्रतिभा का सार्थक इस्तेमाल होगा और खेल को बढ़ावा मिलेगा।
उचित होगा कि केंद्र व राज्य सरकारें खेलों में सुधार के लिए पटियाला में स्थापित खेल संस्थान की तरह देश के अन्य हिस्सों में भी इस तरह के संस्थान खोलें। ऐसा इसलिए कि उचित प्रशिक्षण के जरिए ही देश में खेलों का स्तर ऊंचा उठाया जा सकता है।
यहां यह भी समझना होगा कि जब तक खेलों को रोजगार से नहीं जोड़ा जाएगा तब तक खेल प्रतिभागियों में स्पर्धा का वातावरण निर्मित नहीं होगा।
अगर खेलों में नौजवानों को अपना भविष्य सुनिश्चित नजर नहीं आएगा तो स्वाभाविक है कि वे खेलों में बढ़-चढ़कर हिस्सा नहीं लेंगे। खेलों में भविष्य सुरक्षित न होने के कारण ही नौजवानों में उदासीनता है और खेल के क्षेत्र में भारत फिसड्डी देशों में शामिल है। आज भी देश में एक कहावत खूब प्रचलित है कि पढ़ोगे-लिखोगे बनोगे नवाब, खेलोगे-कूदोगे होगे खराब। अब इस कहावत को बदलने की जरुरत है। अकसर देखा जाता है कि माता-पिता के माथे पर तब चिंता की लकीरें उभर आती हैं जब उनका बच्चा खेल में कुछ ज्यादा ही अभिरुचि दिखाने लगता है।
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क्रिकेट से परे खेलों को मिले सम्मान
स्कूलों में भी गुरुजनों द्वारा अकसर बच्चों से कहते सुना जाता है कि दिन भर खेलोगे तो पढ़ोगे कब। इस तरह की प्रवृत्ति ठीक नहीं है। बच्चों को खेलने के लिए उत्साहित करना चाहिए। अगर सरकार की नीतियों में खेल से रोजगार का जुड़ाव हो तो फिर माता-पिता के मन में भी बच्चे के भविष्य को लेकर किसी तरह की आशंका-चिंता नहीं रहेगी। खेल के प्रति उत्साहजनक वातावरण निर्मित न होने के कारण ही आज देश अंतरराष्ट्रीय खेल पदकों की फेहरिस्त में निचले पायदान पर रहता है। लेकिन सच यह भी है कि आज की तारीख में देश में खेल का मतलब क्रिकेट तक सीमित रह गया है।

बाकी खेल दोयम दर्जे की स्थिति में हैं। फुटबाल, कबड्डी, तीरंदाजी, जिमनास्टिक जैसे खेलों के खिलाड़ियों को उस तरह का सम्मान और पैसा नहीं मिल रहा है जितना कि क्रिकेटरों को मिलता है। यहां तक कि विज्ञापनों में भी क्रिकेटर ही छाए रहते हैं। यह ठीक नहीं है। भारत को अपने पड़ोसी देश चीन से सबक लेना चाहिए । आज चीन हर ओलंपिक खेल में उत्कृष्ट प्रदर्शन कर दुनिया को अचंभित कर रहा है। अच्छी बात है कि अब भारत में भी खेलों को लेकर उत्साह बढ़ा है। महिलाओं की भागीदारी बढ़ रही है। उचित होगा कि भारत भी चीन की तरह खेल को अपनी शीर्ष प्राथमिकता में शामिल कर अपनी नीतियों को उसी अनुरुप ढ़ाले। इससे अपेक्षित परिणाम मिलना तय हैं।
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