नेपाल माँगे फिर वही राजशाही
इधर नेपाल में राजशाही की वापसी की माँग ने ज़ोर पकड़ लिया है। हजारों लोगों ने नेपाल में हिंदू राजशाही और हिंदू राष्ट्र की पुन स्थापना के समर्थन में प्रदर्शन किया है। इस आंदोलन को नेपाल की मौजूदा राजनीतिक व्यवस्था से जनता के मोहभंग और व्यापक असंतोष की भावना ने हवा दी है। लगता है, आम लोग शासन की अस्थिरता, भ्रष्टाचार और आर्थिक बदहाली से तंग आ चुके हैं।
दरअसल कभी दुनिया का एकमात्र हिंदू राष्ट्र रहा नेपाल, 2008 में एक धर्मनिरपेक्ष गणराज्य बन गया था। यह परिवर्तन 10 साल लंबे गृहयुद्ध और तत्कालीन राजा ज्ञानेंद्र के शासन के खिलाफ जनविद्रोह का परिणाम था। उस समय राजशाही के पतन को नेपाल में लोकतंत्र और आधुनिकीकरण की दिशा में एक बड़ा कदम माना गया।
नेपाल में बढ़ते असंतोष के बीच राजशाही की वापसी की माँग
यह बात अलग है कि बाद के वर्षों में राजनीतिक अस्थिरता, बार-बार सरकारों के बदलने और प्रशासनिक विफलताओं ने नेपाल को लगातार संकट में रखा! यही वजह है कि पिछले कुछ समय से वहाँ हिंदू राजशाही की पुन स्थापना की माँग उठने लगी है। हाल ही में, 9 मार्च 2025 को काठमांडू में 10,000 से अधिक समर्थकों द्वारा नेपाल के पूर्व राजा ज्ञानेंद्र शाह के ज़ोरदार स्वागत को बदलाव की इसी इच्छा की अभिव्यक्ति कहा जा सकता है।
प्रदर्शनकारियों ने मौजूदा राजनीतिक नेतृत्व के प्रति गहरा असंतोष व्यक्त किया, जो अधूरे वादों और बिगड़ती सामाजिक-आर्थिक स्थिति को लेकर ख़ासे नाराज़ दिखाई दिए। याद रहे कि इस प्रदर्शन के पहले, नवंबर 2023 में भी हजारों लोगों ने राष्ट्र, राष्ट्रीयता, धर्म संस्कृति और नागरिकों को बचाने की माँग को लेकर सड़कों पर विरोध प्रदर्शन किया था।
यह नेपाल में राजशाही की वापसी के लिए बढ़ते समर्थन की स्पष्ट घोषणा थी। राजशाही की इस माँग के पीछे सयाने कई वजहें बताते हैं। सबसे पहली तो यही कि, राजशाही समाप्त होने के बाद नेपाल में जिस तरह बार-बार सरकारें बदलीं, उससे नीति निर्धारण में असंगति और विकास कार्यों में रुकावटें आईं। दूसरी बड़ी वजह है भ्रष्टाचार।
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नेपाल की राजशाही बहस और भारत के लिए कूटनीतिक चुनौतियाँ
राजनीतिक नेताओं पर भ्रष्टाचार के आरोपों ने जनता के मन में लोकतांत्रिक संस्थाओं के प्रति अविश्वास पैदा कर दिया है। तीसरी वजह यह कि इस दौरान लगातार बढ़ती बेरोजगारी और सिकुड़ते आर्थिक अवसरों ने जनता के असंतोष को बढ़ाया है। और चौथी वजह सांस्कृतिक पहचान का संकट। दरअसल, बहुत सारे नेपाली नागरिकों के लिए राजशाही उनकी सांस्कृतिक विरासत और राष्ट्रीय पहचान का प्रतीक है।
वे इसे समाप्त किए जाने को परंपरा और स्थिरता के नुकसान के रूप में देखते हैं। पड़ोस में चल रहे इस घटपाम से भारत पूरी तरह अछूता रहे, शायद यह संभव नहीं। नेपाल में राजनीतिक अशांति का असर भारत की सीमाओं पर भी पड़ सकता है, जिससे सुरक्षा संबंधी चुनौतियाँ और अवैध गतिविधियाँ बढ़ सकती हैं। ऐसे में, नेपाल के आंतरिक मामलों पर भारत के रुख को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता।
भारत को लोकतांत्रिक मूल्यों का समर्थन करना चाहिए, लेकिन साथ ही नेपाल की संप्रभुता का सम्मान बनाए रखना भी ज़रूरी होगा। ध्यान रहे कि अगर नेपाल में राजशाही की वापसी होती है, तो इससे नेपाल की विदेश नीति में बदलाव आ सकता है तथा भारत के रणनीतिक हित प्रभावित हो सकते हैं। यह बेहद अहम है, क्योंकि हाल के वर्षों में नेपाल में चीन का असर तेजी से बढ़ा है।
यह तो समय ही बताएगा कि राजशाही लौटाने की इस माँग का हश्र क्या होगा! लेकिन भारत यही चाहेगा कि नेपाल में राजनीतिक स्थिरता कायम हो, ताकि भारत-नेपाल के बीच व्यापार, इन्फ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं और ऊर्जा साझेदारी का विस्तार हो सके। अत भारत के लिए यह ज़रूरी है कि वह नेपाल के साथ रचनात्मक संवाद बनाए रखे।
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