चीन का रक्षा बजट : भारत पर दबाव

भारत के पड़ोसी चीन ने अपने रक्षा बजट में 7.2 प्रतिशत की वृद्धि की घोषणा की है। इससे उसका कुल रक्षा खर्च लगभग 245 अरब डॉलर तक पहुँच गया है। इस बढ़ोतरी से न केवल क्षेत्रीय सुरक्षा संतुलन प्रभावित होगा, बल्कि भारत के लिए भी अहम रणनीतिक चिंताएँ पैदा होंगी।ग़ौरतलब है कि पिछले एक दशक में चीन का रक्षा बजट लगातार बढ़ रहा है, जो उसकी सेना के आधुनिकीकरण और वैश्विक प्रभाव बढ़ाने की महत्वाकांक्षाओं को दर्शाता है।

इसके विपरीत, भारत का रक्षा बजट वित्त वर्ष 2025-26 के लिए केवल 78.8 अरब डॉलर है, जो चीन के रक्षा खर्च के मुकाबले कहीं नहीं ठहरता। यह बढ़ता अंतर भारत के लिए सैन्य संतुलन बनाए रखने की चुनौती को और गंभीर बनाता है। कहना न होगा कि चीन और भारत के रक्षा बजट के बीच का अंतर उनकी आर्थिक स्थिति को भी दर्शाता है।

चीन की बड़ी अर्थव्यवस्था उसे अपने रक्षा खर्च को बढ़ाने का अवसर देती है, जबकि भारत को अपनी रक्षा ज़रूरतों के साथ-साथ स्वास्थ्य, शिक्षा और आधारभूत ढाँचे जैसे क्षेत्रों पर भी खर्च करना होता है। इसलिए, भारत को अपने सीमित संसाधनों का प्रभावी ढंग से उपयोग करते हुए अपने रक्षा बजट को संतुलित करना होगा ताकि वह सैन्य संतुलन बनाए रखते हुए आर्थिक विकास को भी सुनिश्चित कर सके।

चीन का बढ़ा हुआ रक्षा बजट उसकी सेना के आधुनिकीकरण, नई तकनीकों के विकास और उन्नत हथियार प्रणालियों पर खर्च किया जा रहा है। इससे क्षेत्रीय शक्ति संतुलन प्रभावित हो सकता है। बदले में, भारत पर अपनी सेना के आधुनिकीकरण को गति देने का दबाव बढ़ना स्वाभाविक है। भारत-चीन सीमा पर, विशेष रूप से वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर, जारी तनाव के चलते भारत को अपनी सीमा सुरक्षा मजबूत करने की ज़रूरत है।

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सैन्य तैयारियाँ, समुद्री सुरक्षा और तकनीकी सशक्तिकरण

चीन के बढ़ते रक्षा खर्च से इस क्षेत्र में सैन्य जमावड़ा बढ़ सकता है, जिसके जवाब में भारत को अपनी सीमावर्ती बुनियादी ढाँचे और सैन्य तैयारियों को मजबूत करना होगा। यही नहीं, चीन की बढ़ती नौसैनिक शक्ति भारत के हिंद महासागर क्षेत्र में सुरक्षा और व्यापारिक हितों के लिए खतरा पैदा कर सकती है। ऐसे में, भारत को अपने समुद्री सुरक्षा उपायों को सशक्त करने और क्षेत्रीय सहयोगियों के साथ रणनीतिक साझेदारी बढ़ाने पर ज़्यादा ध्यान देने की ज़रूरत होगी।

जगज़ाहिर है कि चीन अपनी सेना में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, साइबर युद्ध और अंतरिक्ष प्रौद्योगिकियों का अधिकाधिक उपयोग कर रहा है। इसलिए, भारत को भी अपनी साइबर सुरक्षा और तकनीकी क्षमताओं में निवेश बढ़ाना होगा ताकि इन उभरते ख़तरों का प्रभावी मुकाबला किया जा सके। चीन के बढ़ते रक्षा बजट के जवाब में भारत को अपनी रणनीतियों का निर्धारण बहुत सावधानी से करना होगा।

जैसे, अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया जैसे समान सुरक्षा हित रखने वाले देशों के साथ साझेदारी को और मजबूत करना भारत के लिए लाभकारी होगा। हाँ, ट्रंप 2.0 के असर से बदलती विश्व व्यवस्था की करवटों को भी यह भी ध्यान में रखना होगा। रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता भारत के लिए अति-अति-आवश्यक है।

रक्षा आत्मनिर्भरता और कूटनीतिक संतुलन की आवश्यकता

मेक इन इंडिया जैसी योजनाओं को बढ़ावा देकर भारत को उन्नत सैन्य उपकरणों के स्वदेशी उत्पादन पर जोर देना चाहिए। साइबर सुरक्षा और अंतरिक्ष आधारित रक्षा तकनीकों में निवेश से भारत को भविष्य के खतरों से निपटने में मदद मिलेगी। साथ ही, चीन के साथ कूटनीतिक संवाद के माध्यम से विश्वास निर्माण उपायों को अपनाना भी ज़रूरी है।

ताकि दोनों देशों के बीच तनाव को कम किया जा सके और किसी भी अनावश्यक संघर्ष को रोका जा सके। निष्कर्षत चीन का बढ़ता रक्षा बजट भारत के लिए सतर्क रहने का स्पष्ट संकेत है। इसके मद्देनज़र भारत को अपनी रक्षा क्षमताओं को मजबूत करने, रणनीतिक साझेदारी बढ़ाने और रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता पर ज़ोर देना होगा।

भारत को संतुलित दृष्टिकोण अपनाते हुए अपनी सुरक्षा ज़रूरतों को पूरा करने के साथ-साथ दीर्घकालिक आर्थिक और तकनीकी विकास पर भी ध्यान देना होगा। यही भारत की सुरक्षा और संप्रभुता के लिए सबसे उपयुक्त रणनीति होगी। यह आदर्श अपनी जगह सही हो सकता है कि यह समय युद्ध का नहीं बुद्ध का है, लेकिन इस यथार्थ को भी झुठलाया नहीं जा सकता कि- `यह परंपरा चल रही यहाँ, ठहरा जिसमें जितना बल है! (प्रसाद : कामायनी)’

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