नए भाजपा अध्यक्ष नितिन नबीन युवा कंधों पर बड़ा दायित्व!

नितिन नबीन को अगले 12-18 महीनों में रोजगार और व्यापार को चुनावी भाषण से निकालकर संगठन की दिनचर्या बनाना होगा-हर राज्य इकाई, हर मोर्चा, हर सांसद को रोजगार-संबंधी फीडबैक और हल के साथ मैदान में उतारना होगा। कुल जमा उनके लिए चुनौती कठिन है। संक्षेप में: बेरोज़गारी और वैश्विक व्यापार, दोनों मिलकर एक ही सवाल पूछ रहे हैं-भारत के युवा को स्थिर आय और भविष्य की सुरक्षा कैसे मिले? नितिन नबीन की सबसे बड़ी परीक्षा इसी सवाल के विश्वसनीय उत्तर देने में होगी।

भाजपा के नए अध्यक्ष के तौरपर 20 जनवरी 2026 को नितिन नबीन के नाम की औपचारिक घोषणा के बाद, पीएम नरेंद्र मोदी ने उन्हें मिलेनियल बताते हुए कहा कि उनमें युवाओं जैसी ऊर्जा और संगठन का वृहद अनुभव है, जो पार्टी के लिए बेहद उपयोगी सिद्ध होगा। नितिन नबीन का जन्म बीजेपी के जन्म से क़रीब दो महीने बाद यानी 23 मई 1980 को हुआ था। ऐसे में वह 45 वर्ष से कुछ ज्यादा की हो चुकी भाजपा के बारहवें राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं, उनसे पहले के राष्ट्रीय अध्यक्ष क्रमशः इस प्रकार हैं-अटल बिहारी वाजपेयी,लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, कुशाभाऊ ठाकरे, बंगारु लक्ष्मण, जना कृष्णमूर्ति, वेंकैया नायडू, राजनाथ सिंह, नितिन गडकरी, अमित शाह और जेपी नड्डा।

हालांकि 45 साल के नितिन नबीन को बीजेपी की कमान मिलने के बाद उनकी कम उम्र की चर्चा क़ाफी हो रही है लेकिन बीजेपी से पहले जनसंघ में भी कम उम्र के अध्यक्ष हुए हैं। अटल बिहारी वाजपेई जब जनसंघ के अध्यक्ष बने थे तब वह 44 साल कुछ दिनों के थे। लेकिन जनसंघ और भाजपा का अध्यक्ष होना एक जैसे महत्व का नहीं है। नितिन नबीन बीजेपी के अध्यक्ष तब बने हैं, जब बीजेपी ऐतिहासिक रूप से बहुत मज़बूत है। दुनिया में सबसे ज्यादा करीब 5 करोड़ कार्यकर्ताओं वाली भाजपा की आज 240 लोकसभा सीटें हैं और 21 राज्यों में बीजेपी या उसकी अगुआई वाले गठबंधन एनडीए की सरकारें हैं, राज्यसभा में भी बीजेपी के 99 सांसद हैं।

राष्ट्रीय अध्यक्ष के रूप में नितिन नबीन के सामने इस साल पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, असम, पुद्दुचेरी और केरल में विधानसभा चुनाव होंगे। इनमें से असम को छोड दें तो किसी भी राज्य में भाजपा के लिए लड़ाई आसान नहीं है। लेकिन इससे भी ज्यादा भाजपा की चुनौती 2029 के लोकसभा चुनाव होंगे जिसके लिए उन्हें पार्टी को तैयार करना होगा।

युवा मतदाता, वैश्विक अनिश्चितता और सरकार की विश्वसनीयता

ये पिछले कई लोकसभा चुनावों से ज्यादा मुश्किल इसलिए होंगे क्योंकि ये चुनाव ऐसे समय में होंगे, जब देश परिसीमन की प्रक्रिया से गुज़र रहा होगा, लोकसभा और विधानसभा में महिलाओं के लिए 33 फ़ीसदी आरक्षण लागू किया जा रहा होगा। साथ ही बड़ी तादाद में नए वोटर का सामना करना होगा।

ऐसे में नए अध्यक्ष को न केवल बदले हुए राजनीतिक माहौल के अनुरूप पार्टी को तैयार करना होगा बल्कि अर्थव्यवस्था के आगे बढ़ने के बावजूद रोजगार का दिनोंदिन गहराता संकट मोदी सरकार के लिए एंटी इनकंबेंसी का मुश्किल माहौल तैयार करेगा इसमें कोई शक नहीं है। इसी के साथ मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल के दौरान संसद से पारित नारी शक्ति वंदन अधिनियम के अनुसार, लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए एक-तिहाई सीटों का आरक्षण उस परिसीमन के बाद लागू होगा, जो इस अधिनियम के लागू होने के बाद कराई जाने वाली पहली जनगणना के आधार पर किया जाएगा।

माना जा रहा है कि मोदी सरकार का मक़सद 2029 के आम चुनावों में महिला आरक्षण को लागू करने का है। इस संबंध में सरकार ने जनगणना शुरू करने की अधिसूचना भी जारी कर दी है, यह जनगणना एक मार्च 2027 की स्थिति के मुताब़िक देश की जनसंख्या का आकलन प्रस्तुत करेगी इसके बाद परिसीमन की प्रक्रिया के लिए मंच तैयार हो जाएगा। राजनीतिक चुनौतियों के अलावा नितिन नबीन के सामने एक सबसे कठिन परीक्षा रोज़गार संकट और वैश्विक व्यापार में उभरती अनिश्चितताओं के बीच पार्टी-सरकार की विश्वसनीयता को मजबूत बनाने या बनाए रखने की भी होगी। उन्हें अध्यक्ष की कुर्सी पर बैठाने का एक मकसद युवा मतदाता पर फोकस करना भी है और युवाओं की सिर्फ अपने देश में ही नहीं पूरी दुनिया में पहली समस्या या मांग इस समय नौकरी की है।

बेरोज़गारी अब नारा नहीं, युवाओं की रोज़मर्रा की हकीकत

इसीलिये आज बेरोज़गारी विपक्ष का नारा भर नहीं है। यह ग्रेजुएट/डिप्लोमा युवाओं की रोज़मर्रा की चिंता भी बन चुका है। नितिन नबीन को सबसे पहले यह समझना होगा कि रोजगार पर बहस अब सरकारी नौकरी बनाम प्राइवेट नौकरी तक सीमित नहीं रही। भारत का बड़ा हिस्सा लो-क्वालिटी जॉब्स, गिग वर्क, ठेकेदारी और अनियमित आय की तरफ खिसक चुका है।

ऐसे में उनके सामने तीन स्तरों पर काम करने की जरुरत होगी। सबसे पहले तो नेरेटिव सेट करने साथ अपेक्षा प्रबंधन की व्यवस्था भी करनी होगी क्योंकि आम लोग अब सिर्फ अर्थव्यवस्था बढ़ रही है सुनने से यकीन नहीं कर लेगा उसे मेरे घर में नौकरी आयी भी दिखना चाहिए। यह अपेक्षा उन तक संगठनात्मक दबाव के रूप में भी आयेगी; उन्हें पार्टी के सांसद-विधायक-जिला नेतृत्व को रोजगार की स्थानीय समस्याओं (बंदी उद्योग, बंद फैक्ट्रियाँ, भर्ती परीक्षाओं की अनिश्चितता) पर जवाबदेह बनाना होगा।

क्योंकि ऐसा न होना राजनीतिक जोखिम साबित होगा और हाल में हमने देखा है कि आस-पड़ोस के देशों में युवाओं की निराशा कितनी तेज़ी से राजनीतिक गुस्से में बदलती है। यही वजह है कि अध्यक्ष होने के नाते उन्हें हर राज्य चुनाव में रोजगार को केन्द्र-बिंदु बनाना पड़ेगा, वरना यह मुद्दा विपक्ष के हाथ में हथियार बन जाएगा। रोजगार के साथ साथ वैश्विक व्यापार भी उनके कार्यकाल की एक बड़ी चुनौती होगी।

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वैश्विक व्यापार का झटका और रोजगार पर सीधा असर

भारत के लिए वैश्विक व्यापार की बदलती हवा जहाँ सप्लाई चेन री-शफल, टैरिफ/प्रोटेक्शनिज़्म और बड़ी शक्तियों के बीच तनाव (अमेरिका-चीन, यूरोप की शर्तें, कार्बन टैक्स जैसी बातें) भारत की निर्यात क्षमता को प्रभावित कर सकती है। वहीं व्यापार में झटका सीधे रोजगार पर चोट करता है-खासकर टेक्सटाइल, लेदर, इंजीनियरिंग गुड्स, आईटी सेवाएँ, ऑटो कंपोनेंट्स जैसे सेक्टरों में। इसलिए उनके सामने दोहरी रणनीति होगी-घरेलू उद्योग तथा निर्यात दोनों को साथ साधना। यदि आयात सस्ता हुआ तो घरेलू कुटीर उद्योग दबेगा; यदि संरक्षण बहुत बढ़ा तो निर्यात बाजारों में नुकसान होगा।

-वीना गौतम
-वीना गौतम

उन्हें स्किलिंग को भी उद्योग से जोड़ने का प्रयास करना होगा स्किल इंडिया जैसे शब्द तभी असर करेंगे जब लोकल उद्योग में सीधी भर्ती और अप्रेंटिसशिप बढ़े। हालांकि किसी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष सीधे नीति नहीं बनाते, लेकिन वे तय करते हैं कि पार्टी किस मुद्दे को प्राथमिकता देगी। नितिन नबीन को अगले 12-18 महीनों में रोजगार और व्यापार को चुनावी भाषण से निकालकर संगठन की दिनचर्या बनाना होगा-हर राज्य इकाई, हर मोर्चा, हर सांसद को रोजगार-संबंधी फीडबैक और हल के साथ मैदान में उतारना होगा। कुल जमा उनके लिए चुनौती कठिन है। संक्षेप में: बेरोज़गारी और वैश्विक व्यापार, दोनों मिलकर एक ही सवाल पूछ रहे हैं-भारत के युवा को स्थिर आय और भविष्य की सुरक्षा कैसे मिले? नितिन नबीन की सबसे बड़ी परीक्षा इसी सवाल के विश्वसनीय उत्तर देने में होगी।

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