नोबेल की पुकार और इंसानियत की चीख
कुछ समय पहले तक दुनिया के सबसे त़ाकतवर नेताओं में से एक ट्रंप महाशय बड़े गर्व से कह रहे थे कि उन्हें नोबल पीस प्राइज मिलना ही चाहिए। जैसे शांति कोई पदक हो जिसे ताकत और शोर से हासिल किया जा सकता है। उस समय शायद उन्हें लगा होगा कि बड़े-बड़े बयान देने से इतिहास उनके नाम के आगे शांति दूत लिख देगा। पर समय के चक्र ने इस खून के सौदागर के मस्तक पर युद्ध दूत लिख दिया है।
इतिहास इतना भोला नहीं होता और इंसानियत की अदालत में फैसले भाषणों से नहीं बल्कि इंसानों की जिंदगियों से लिखे जाते हैं। जब दुनिया के किसी कोने में बम गिरता है, किसी स्कूल की दीवारें गोलियों से छलनी हो जाती हैं, मासूम बच्चों की चीखें हवा में तैरती हैं, किसी मां की गोद उजड़ती है और किसी पिता का भविष्य मलबे में दब जाता है। ऐसे समय में जब बच्चे डर के साए में जी रहे हों, जब स्कूलों की घंटियां गोलियों की आवाज़ में दब रही हों, जब धरती पर खून के धब्बे पपड़ी बन रहे हों तब नोबेल शब्द भी शायद थोड़ा कांप जाता होगा।
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दुनिया को पुरस्कार मांगने वालों नहीं, जीवन बचाने वालों की ज़रूरत
ऐसी घड़ी में शांति पुरस्कार का हर दावा छोटा और शर्मिंदा हो जाता है। नोबेल उन हाथों को मिलता है जो हथियार नहीं उठाते और जो घाव भरते हैं। नोबेल उन आवाज़ों को मिलता है जो युद्ध का ऐलान नहीं करतीं बल्कि युद्ध रोकने की गुहार लगाती हैं। आज दुनिया को ऐसे नेताओं की ज़रूरत नहीं जो मंच से खड़े होकर अपने लिए पुरस्कार मांगें। दुनिया को उन लोगों की ज़रूरत है जो चुपचाप किसी अनजान बच्चे की जान बचा लें। किसी मां-बहन-बेटी का सिंदूर बचा लें।
जिस दुनिया में बच्चों का खून बह रहा हो, उस दुनिया में कोई भी नेता नोबेल का नाम लेने से पहले आईने में अपनी इंसानियत जरूर देखे। और शायद उस आईने में एक सवाल हमेशा खड़ा रहेगा- क्या शांति का पुरस्कार मांगने से पहले सचमुच शांति बचाने की कोशाशि की थी? कोई भी नेता शान्ति पुरस्कार का नाम लेने से पहले याद रखे कि नोबेल की चमक से ज्यादा मासूम बच्चों के आंसुओं की चमक होती है।
आज इतिहास बड़े शांत स्वर में एक ही बात कह रहा है कि जो लोग सत्ता के शोर में इंसानियत की आवाज़ नहीं सुन पाते उन्हें पुरस्कार नहीं बल्कि लोगों के कठोर प्रश्नों का सामना करना पड़ता है। एक बर की बात है अक सुरजे मास्टर नैं बूज्झी अक यो अंगूठा क्यां खात्तर बणाया है? नत्थू बोल्या- इब्बे ताहिं तो मैं सोच्या करता अक गुट्ठा चुस्सण खात्तर अर चिडान खात्तर बणाया है पर ईब बेरा पाट्या अक यो तो व्हाटसऐप चलाण खात्तर बणाया है।
शमीम शर्मा
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