मन, वचन, काया योग की निवृत्ति ही देती है जीवन का आनंद : डॉ. सुमंगलप्रभाजी

हैदराबाद, मन वचन काया तीन प्रकार के योग हैं, इनकी निवृत्ति ही जीवन की कला है। इसे यदि जान-पहचान लें, तो हमें सुख ऐश्वर्य आनंद की अनुभूति यहीं भरत क्षेत्र में हो जाएगी। उक्त उद्गार सिकंदराबाद स्थित मारुति विधि जैन स्थानक में श्री वर्धमान स्थानकवासी जैन श्रावक संघ सिकंदराबाद के तत्वावधान में आयोजित चातुर्मासिक धर्म सभा को संबोधित करते हुए साध्वी रत्ना डॉ. सुमंगलप्रभाजी म.सा. ने दिये।

पूज्यश्री ने कहा कि योग के प्रत्याख्यान से जीव को नवीन कर्म का बंधन नहीं करना पड़ता है। पूर्व के कर्मों की निर्जरा हो जाती है। तीन प्रकार के योग – मन योग, वचन योग और काया योग हैं। इन तीनों योगों की प्रवृत्तियों का त्याग कर देने वाला अयोगित्व बन जाता है। म.सा. ने आगे कहा कि यदि मन आपे से बाहर हो जाए तो जीवन में अशुभ प्रवृत्तियां प्रवेश कर जाती हैं। इसलिए मन को नियंत्रित करना आवश्यक है। मन पर अंकुश लगाकर रखें ताकि वह कहीं पर नहीं दौड़े, बल्कि एकाग्र बना रहे।

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धर्म सभा का संचालन करते हुए संघ के महामंत्री सुरेन्द्र कटारिया ने बताया कि गुरुवार 6 नवंबर को सुबह 7.01 बजे विहार करके श्रद्धेय गुरु भगवंत न्यू भोईगुड़ा स्थित संपतराज विजयराज डूंगरवाल के निवास पर मंगल पदार्पण करेंगे। अवसर पर न्यू भोईगुड़ा जैन श्री संघ की ओर से अल्पाहार की व्यवस्था रहेगी। अध्यक्ष गौतमचंद गुगलिया ने बताया कि चातुर्मास के समय जिन जिन श्रावक श्राविकाओं ने अधिक सामायिक का लाभ लिया, उन सभी का बहुमान बुधवार 5 नवंबर को किया जाएगा।

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