बहुआयामी समर्पित प्रयासों से ही सार्थक विश्व भाषा बन सकेगी हिन्दी

डिजिटल परिवेश में अंग्रेज़ी के विविध रूपों के विकास और उनकी डिजिटल स्वीकार्यता के अनुरूप ही हिन्दी का संरक्षण उन-उन देशों की हिन्दी के रूप में स्वीकृति और डिजिटल परिवेश में प्रचलन की दिशा में ईमानदार प्रयासों की आवश्यकता है। जिस रूप में यूएस, यूके, भारत की अंग्रेज़ी की सुविधा हम कंप्यूटरों में देखते हैं, वैसे ही विविध रूपों में डिजिटल परिवेश में हिन्दी को विकसित संवर्धित करने की आवश्यकता है।

वैश्विक स्तर पर हिन्दी के हित वर्धन के लिए कई समर्पित प्रयासों की बड़ी आवश्यकता है। केवल भावुकता से भरे कथनों से हिन्दी विश्व भाषा नहीं कहला पाएगी। सही मायनों में उसके बहुआयामी वैश्विक विकास को सुनिश्चित करना अपेक्षित है।
किसी भी भाषा के बोलचाल व साहित्यिक-सांस्कृतिक प्रयोगों के अलावा ज्ञान-विज्ञान के आदान-प्रदान की भाषा के रूप में विकसित होने और प्रचार-प्रसार के लिए ईमानदार प्रयोग भी अपेक्षित है।

आज के संदर्भ में डिजिटल परिवेश में भी समुचित सार्थक विकास अपेक्षित है। व्यापार-वाणिज्य, शासन-राजनयिक, मीडिया आदि क्षेत्रों में भी समुचित प्रयोग-प्रचलन होना अपेक्षित है। हिन्दी राष्ट्रभाषा की आत्मीय संज्ञा से संपर्क भाषा के रूप में प्रचार पाती रही हिन्दीतर भाषी प्रदेशों में आज़ादी से जुड़े आंदोलन के दौर में। आज़ाद भारत संघ की राजभाषा के रूप में संवैधानिक प्रावधानों के परिप्रेक्ष्य में किसी हद तक प्रयोग के अलावा शिक्षा नीतियों में प्रावधानों के तहत हिन्दी प्रदेशों में शिक्षा के माध्यम के रूप में हिन्दी का प्रयोग होता रहा है।

वैश्विक स्तर पर हिन्दी के विविध रूपों के संरक्षण की चुनौती

उच्च शिक्षा के माध्यम के रूप में हिन्दी का पूर्ण प्रयोग अभी क़ाफी दूर की बात ही लग रही है, कारण सभी ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्रों में पाठ्य-पुस्तकों के विकास, उच्च शिक्षा संस्थानों की नीतियों में परिवर्तन जैसी कई रुकावटें रह गई हैं, दूसरी तऱफ वैश्विक धरातल पर ही नहीं देश में भी रोज़गार की गारंटी का बड़ा सवाल शिक्षार्थियों के दिमागों में बैठा हुआ है। वैज्ञानिक-प्रौद्योगिकी सहित कई प्रमुख ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्रों में वैश्विक स्तर पर अनुसंधान की बात दूर, भारत में ही इस दिशा में कमी रह गयी है।

ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्र के अनुसंधान की मानक हिन्दी पत्रिकाओं का विकास भारत में नहीं हो पा रहा है, तो दुनिया के देशों की तऱफ हम किस मुंह से तापें। व्यापार-वाणिज्य-आयात-निर्यात में व्यापारियों की चेतना से हिन्दी जितनी बढ़ रही है, उतनी नियंत्रक व्यवस्थाओं के प्रयासों से नहीं बढ़ने के कारण दुनिया की 10-15 भाषाओं व लिपियों में छपने के बावजूद विदेशी उत्पादों के विवरण/कार्य पुस्तिकाएँ हिन्दी में छपी नहीं मिलती हैं। इसमें आयात के स्तर के जाँच बिंदुओं पर सार्थक कार्रवाई अपेक्षित है।

दुनिया में हिन्दी कई रूपों में किसी हद तक प्रचलित है। गिरमिटिया मज़दूरों के रूप में पराधीनता के दौर में जो भारतीय गए थे, उनकी संतानें आज भी अपनी मातृभाषाओं/बोलियों को पीढ़ियों से जिस रूप में संरक्षित कर पायी हैं, उनकी वजह से वहाँ हिन्दी व उसकी बोलियाँ कई नामों, रूपों में प्रचलित व संरक्षित हैं।

प्रवासी समुदायों में हिन्दी और बोलियों का जीवित संसार

डिजिटल परिवेश में अंग्रेज़ी के विविध रूपों के विकास और उनकी डिजिटल स्वीकार्यता के अनुरूप ही हिन्दी का संरक्षण उन-उन देशों की हिन्दी के रूप में स्वीकृति और डिजिटल परिवेश में प्रचलन की दिशा में ईमानदार प्रयासों की आवश्यकता है। जिस रूप में यूएस, यूके, भारत की अंग्रेज़ी की सुविधा हम कंप्यूटरों में देखते हैं, वैसे ही विविध रूपों में डिजिटल परिवेश में हिन्दी को विकसित संवर्धित करने की आवश्यकता है।

भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद के शिक्षा-पीठों पर आचार्यों, शिक्षकों की नियुक्ति शताधिक देशों के विश्वविद्यालयों में होने के अलावा, भारतीय भाषाओं के प्रति कुछ राष्ट्रों की निष्ठा की वजह से कई विश्वविद्यालयों में भारतीय सांस्कृतिक अध्ययनों के अलावा, भारतीय भाषाओं के अध्ययन की सुविधा के तहत हिन्दी में शिक्षण व अनुसंधान हो रहा है अवश्य, मगर उनसे प्रेरित होकर दुनिया में हमें भारत की ओर से भी फैलाने के कई सार्थक प्रयासों की अपेक्षा है।

नियमित शिक्षा, दूरस्थ-मुक्त विश्वविद्यालय के रूप/स्तर के शिक्षा के प्रचलन के बाद आज ऑनलाइन शिक्षा का प्रचलन बढ़ रहा है। इस मामले अभी धीमी गति से भारतीय परिवेश में ऑनलाइन उपाधियों के लिए कार्य हो रहे हैं, भले ही विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने 2018 में ही इस संबंधी अधिनियम को जारी कर दिया था। भारत सरकार के शिक्षा मंत्रालय के स्वयं पोर्टल के माध्यम से वफहद मुक्त ऑनलाइन पाठ्यक्रमों(एमओओसी) के विकास में दस अभिकरण सािढय होने के बाद भी मूल रूप से हिन्दी माध्यम के पाठ्यक्रमों के विकास का प्रतिशत कम है।

हिन्दी माध्यम की परीक्षा–प्रमाणन नीति अभी अधूरी

दुनिया में विभिन्न देशों के शिक्षार्थियों के लिए परीक्षा और प्रमाणन की व्यवस्था अभी नीतियों-निर्णयों की राह देख रही है। जिस गति से ऐसे कार्यों में हम आगे बढ़ते हैं और दुनिया के शिक्षार्थियों को हिन्दी माध्यम का विकल्प देते हैं, तभी हर वर्ष विश्व हिन्दी दिवस मनाने की सार्थकता बढ़ती जाएगी। हिन्दी की दुनिया, दुनिया की हिन्दी, तकनीक में हिन्दी बढ़ने के साथ-साथ हिन्दी बढ़ाने की तमाम तकनीक भी हम सीखेंगे तो ही बात बनेगी।

हिन्दी ही नहीं, भारतीय भाषाओं के लेखक दिन दस गुनी रात सौ गुनी बढ़ रहे हैं (आभासी सुविधाओं के कंबल के नीचे छद्म लेखक बड़ी संख्या में धड़ल्ले से छप रहे हैं, भले ही प्रतिलिप्याधिकारों और बौद्धिक संपदा अधिकारों के हनन की चिंता भी बढ़ रही है उत्पादक कृत्रिम बुद्धिमत्ता (जेन एआई) के विकास के आलोक में)। तकनीक बढ़ रही है, तकनीकी ज्ञान का संवर्धन अति तीव्र गति से हो रहा है, मगर हिन्दी की तकनीकी शब्दावली विकास की स्थिति में अत्यंत मंद गति है।

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हिन्दी के लिए राष्ट्रीय समन्वय मंत्रालय की ज़रूरत

भारत पधारकर साल भर में हिन्दी में निष्णात बनकर जाने वाले विद्यार्थियों से अक्सर मेरी मुल़ाकात होती रहती है, वे दुनिया के हिन्दी प्रेमी सवाल करते हैं कि अंग्रेज़ी के बिना हिन्दी बोलना भारतवासियों को आती नहीं है क्या? यह अत्यंत महत्वपूर्ण सवाल है। इन्हीं सवालों के बीच कतिपय हिन्दी मीडिया घरों में अंग्रेज़ी मिलावट विभागों का संवर्धन एक मज़ेदार तथ्य है । 1857 की क्रांति और आज़ादी की साधना को मनाते हुए अपनी भाषाओं में ज्ञान की आज़ादी फैलाने में हम क्यों पिछड़ रहे हैं? सवाल असंख्य हैं, जवाब भी असीमित हैं, मगर स्थिति जितनी सुधरनी चाहिए उतनी अभी सुधरी नहीं है।

प्रवासी लेखन के नाम से हम जितना प्रवासियों के लेखन को हिन्दी में महत्व दे रहे हैं उतना महत्व हमें सभी लेखकों को देने की उदारता/ प्रवासी लेखकों से हिन्दी के तकनीकी लेखन हिन्दी के विकास के तकनीकी व्यवहार की दुनिया के हर कोने में बढ़ाने और दूरस्थ पाठ्यक्रमों का हिन्दी माध्यम से दुनिया में पढ़ने का ही नहीं, परीक्षा देकर प्रमाणन करने का प्रावधान भी होना चाहिए। आज भारत में एक बड़े समन्वय मंत्रालय की आवश्यकता भी है जिससे सभी के प्रयासों से राजभाषा, राष्ट्रभाषा और विश्व भाषा के रूप में हिन्दी संवर्धित हो पाएगी।

केवल सांस्कृतिक पहचान तक सीमित हिन्दी का वैश्विक संकट

केवल भारत की सांस्कृतिक पहचान की भाषा के रूप में ही हिन्दी को वैश्विक मंच पर बढ़ावा देने पर केंद्रित प्रयास हज़ारों वर्षों के बाद भी हिन्दी के विश्व भाषा बनने में कई चुनौतियाँ हैं। चिंता के असंख्य आयाम हैं, जिनकी ओर हमें ध्यान देकर ईमानदार प्रयासों से कार्य करना होगा तभी सही मायने में हिन्दी विश्व भाषा की अधिकारिणी बन सकती है।

डॉ. सी. जय शंकर बाबू 
अध्यक्ष, हिंदी विभाग, पांडिच्चेरी विश्वविद्यालय, पुडुच्चेरी
डॉ. सी. जय शंकर बाबू

अध्यक्ष, हिंदी विभाग,
पांडिच्चेरी विश्वविद्यालय,
पुडुच्चेरी

ज्ञान-विज्ञान प्रौद्योगिकी की जिस किसी नए विषय पर आपको पुस्तकें चाहिए, खोज इंजनों में खोजने से क्षण भर में मिल जाने के पीछे जो श्रम अंग्रेज़ी में हो रहा है, वैसे श्रमिकों को हिन्दी में पैदा करने की आवश्यकता है, यह हिन्दी को विश्व भाषा बनाने की दिशा में एक और महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकता है। जिम्मी वेल्स के दो दशक पूर्व जिस आशा के साथ कई भारतीय भाषाओं में विकीपीडिया शुरू करने के बाद भी हिन्दी जानने वालों की संख्या बल का कोई फ़ायदा नहीं मिला, दुनिया की पचास भाषाओं को ही हिन्दी में ज्ञान पाने की स्थिति है विकीपीडिया में। कई हिन्दी लेख स्पष्ट करते हैं, केवल वहाँ तक पहुँच के लिए दो पंक्तियों में या मशीन अनुवाद की प्रविष्टियों के रूप भरे गए हैं, कहीं भी अनुसंधान मानकों का पालन नहीं है। यह एक कडवा सच है।

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