ओस में भीगा प्रेम

सू ‘रज की पहली किरण जैसे ही खिड़की से झांकती हुई कमरे में आयी, तो रचना की नींद झटके के साथ खुली। रोहन ऑफिस जाने के लिए लगभग तैयार हो चुका था। रचना ने उसे अलसाती आँखों से देखा और कहा, ‘आज मैं लेट हो गयी। आपने उठाया क्यों नहीं ? इतनी जल्दी नाश्ता कैसे बनेगा ?’ रोहन की नजरें आईने पर थीं। उसने बिना रचना की तरफ देखे कहा, ‘इट्स ओके, तुम रात देर से सोई थीं, तो उठाना ठीक नहीं लगा मुझे।
वैसे मैंने नाश्ता बना दिया है, दोनों के लिए। नींद टूट गई हो तो टेबल पर लगा दो।’ रचना रात को अपने प्रिय लेखक की नई किताब में इतनी डूब गयी थी कि उसे समय का अंदाजा ही नहीं रहा। रोहन सचिवालय में कार्यरत था। सुबह का निकला हुआ घर आते आते रात हो जाती थी। रचना के मन में अपराधबोध की भावना उमड़ने लगी, लेकिन उसने बिना देर किये उठकर झटपट नाश्ता लगा दिया। अब उसका मन थोड़ा शांत हुआ तो उसे याद आया कि आज तो चौदह फरवरी है, मतलब वैलेंटाइन्स डे।
वैसे रचना के जीवन में इस दिन का कोई महत्व नहीं था, क्यूंकि शादी को पांच साल से ज्यादा वक़्त हो चुका था। ऊपर से रोहन शांत और खुद में रहने वाला इंसान था, न कभी कोई शिकायत, ना कभी प्यार जताना। कभी-कभी रचना को ये शादी बस एक समझौते से ज्यादा और कुछ नहीं लगती। उसे ऐसा लगता था कि जैसे परिवार के बड़ों की मर्जी पूरी करने के लिए ये शादी हुई है। आज वैलेंटाइन्स डे था। उसने एक नजर रोहन पर डाली, जो शांत भाव से नाश्ते को ख़त्म करने में लगा था।
रचना चुपचाप वहाँ से उठी और दरवाजे की तरफ गई। उसकी धड़कन थोड़ी तेज़ होने लगी थी। उसने दरवाजा खोला तो उसका दिल धक् से रह गया। चौखट के कोने पर ओस में भींगा एक ताज़ा लाल गुलाब रखा था। रचना ने कांपते हाथों से उस गुलाब को उठाया और साड़ी के आँचल में छिपाकर ले आई। रोहन के जाने के बाद वह गुलाब को लेकर खिड़की के पास बैठ गई। पिछले छः सालों से आज के दिन कोई उसके दरवाजे पर एक तन्हा लाल गुलाब छोड़ जाता है।
पहली बार जब वो अपने पापा के घर पर थी, तब वहाँ किसी ने ये गुलाब रखा था। उस वक़्त उसे लगा कि शायद किसी ने शरारत की होगी, पर पिछले छः सालों से ये सिलसिला ऐसे ही लगातार चला आ रहा था। रचना कबसे सोच रही थी कि रोहन को ये बात बताये, पर उसकी खामोशी और काम की बातों के बीच वह कुछ और कहने की हिम्मत नहीं जुटा पाती थी। सवाल अब भी वही था कि आखिर ये गुलाब कौन छोड़ जाता है, उसके दरवाजे पर ?
कोई दिलफेक आशिक ! कोई अजीब-सा मजाक या फिर अविनाश ! जिसने उसे कॉलेज के आख़री साल प्रोपोज़ किया था, पर इतने सालों तक ? वो अपने ही आंकलन को खुद ही नकारती गई। अविनाश पर जाने क्यों उसका ध्यान रुकता रहा। रचना ने अविनाश का प्रस्ताव इसलिए अस्वीकार कर दिया था, क्यूंकि वो जानती थी कि उसके परिवार वाले प्रेम-विवाह का समर्थन कभी नहीं करेंगे और वो भी ऊपर से अंतरजातीय। रचना ने एक ठंडी सांस ली और उस गुलाब की पंखुरी को प्यार से संवारा, ये सोचते हुए कि इसी बहाने प्रेम साल में एक बार ही सही, लेकिन उसके नीरस जीवन को छूता तो है।
मन जिज्ञासु होता है, कितना भी चाहो जिज्ञासाएं वो सब करने को विवश करती हैं, जो हम सामान्यतया करना नहीं चाहते। अगले वैलेंटाइन को रचना आधी रात से ही जागी थी। वो बिस्तर पर लेटी थी, पर हर आहट को भाँप रही थी, लेकिन सुबह होने से पहले एक बार फिर उसकी आँखें बंद हो गईं। उन दो घंटों बाद बाहर हुई एक हल्की आवाज के साथ वो घबराते हुए उठी। कमरे में अँधेरा था, वो खामोशी से दरवाजे के पास गयी। बाहर अभी भी हल्का अँधेरा था। उसने जैसे ही दरवाजा खोला तो किसी शख्स की पीठ उसे दिखाई दी और वो घबराते हुए चीख उठी।
उसकी चीख सुनकर वो व्यक्ति पलटा, उसके हाथों में लाल गुलाब था। वो कोई और नहीं उसका ही पति रोहन था। रचना ने बड़ी-बड़ी आँखें दिखाते हुए, उसकी तरफ प्रश्नवाचक नजरों से देखा और फिर कहा, ‘आप ! इतने सालों से ?’ रोहन अपनी आँखें नीची करके मुस्कुरा उठा। रचना अभी भी स्तब्ध खड़ी थी। उसके हाथ अनायास ही उस गुलाब की ओर बढ़े, जो रोहन ने थामा हुआ था। उसने फिर कहा, ‘आप… इतने सालों से ?’ उसकी आवाज़ में हैरानी भी थी, शिकायत भी और कहीं बहुत गहराई में छिपी हुई एक राहत भी।
रोहन ने संकुचाते स्वर में कहा, ‘शादी से पहले जब हम मिले थे तो तुमने बातों ही बातों में कहा था कि तुम्हें लाल गुलाब बहुत पसंद हैं। तब सोचा था कि एक बार दूँगा। फिर लगा कि कहकर देने में क्या ख़ास है? इसलिए सोचा हर साल चुपचाप रख दूँ। तुम्हें खुश देखना चाहता था, बिना यह जताए कि वो मैं हूँ।’ रचना की आँखें भीग गईं। ‘पर आपने कभी बताया क्यों नहीं ?’ रोहन ने धीमे स्वर में कहा, ‘शायद मैं शब्दों में अच्छा नहीं हूँ, रचना। मुझे डर था कि कहीं तुम्हें ये सब बनावटी ना लगे। मैं अपना प्रेम दिखा नहीं पाता, पर इसका मतलब ये नहीं कि प्रेम नहीं करता हूँ।’
दोनों अंदर गए, अब कमरे में हल्की सुबह उतरने लगी थी। खिड़की से आती पहली किरण अब दोनों के बीच खड़ी थी, जैसे वर्षों का मौन पिघल रहा हो। रचना ने आगे बढ़कर वह गुलाब रोहन के शर्ट की जेब में सजा दिया और हल्की मुस्कान के साथ कहा, ‘अब से गुलाब चौखट पर नहीं बल्कि मेरे हाथों में दिया कीजिए। मुझे इंतज़ार अच्छा नहीं लगता।’ रोहन ने पहली बार खुलकर उसकी ओर देखा। उसकी आँखों में वही स्थिरता थी, पर आज उनमें एक स्वीकार था और एक अपनापन।
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मनीषा मंजरी
उस सुबह ना तो कोई बड़ा इज़हार हुआ, ना कोई फिल्मी वादा, बस दो लोगों के बीच जमा हुआ वर्षों का संकोच चुपचाप टूट गया। रचना ने मन ही मन सोचा, प्रेम कभी-कभी शोर नहीं करता, वह हर साल ओस में भीगकर, बस हमारी चौखट पर रख दिया जाता है। उस दिन के बाद चौदह फरवरी उनके जीवन का कोई विशेष दिन नहीं रहा, क्योंकि अब हर सुबह एक अनकहा गुलाब उनके बीच खिलने लगा था। उसे उस दिन यह भी समझ आया कि प्रेम को बड़े इज़हार नहीं, बस एक सच्ची निरंतरता चाहिए।
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