पहलगाम त्रासदी, ऑपरेशन सिंदूर और संघर्ष विराम

जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में 22 अप्रैल 2025 को हुए आतंकी हमले ने भारत-पाक रिश्तों को चरम तनाव के दोराहे पर ला खड़ा किया था। इस हमले में 26 निर्दोषों की जान गई। जवाब में भारत ने 7 मई को ऑपरेशन सिंदूर के तहत पाकिस्तान और पीओके में नौ आतंकी ठिकानों पर सटीक मिसाइल हमले किए। इस जवाबी कार्रवाई ने दोनों देशों के बीच युद्ध जैसे हालात पैदा कर दिए।

लेकिन 10 मई को औचक संघर्ष-विराम की घोषणा ने सबको चौंका दिया। यही नहीं, अमेरिकी राष्ट्रपति ने इसे अपनी मध्यस्थता का नतीजा बताकर शांतिदूत का मुकुट खुद अपने सिर सजा लिया! गौरतलब है कि संघर्ष-विराम की घोषणा ऐसे समय में हुई जब दोनों देशों की सैन्य कार्रवाइयाँ चरम पर थीं। पाकिस्तान ने ऑपरेशन सिंदूर के बाद पुंछ और अन्य क्षेत्रों में नागरिकों को निशाना बनाकर नियंत्रण रेखा (एलओसी) पर गोलीबारी की, जिससे तनाव और बढ़ गया।

अंतरराष्ट्रीय दबाव, विशेष रूप से संयुक्त राष्ट्र और अमेरिका की अपील, ने दोनों पक्षों को पीछे हटने के लिए मजबूर किया। इसके अलावा, पाकिस्तान की आर्थिक कमजोरी और बलूच विद्रोह जैसे आंतरिक संकटों ने उसे सैन्य टकराव को लंबा खींचने से रोका। भारत के लिए भी, क्षेत्रीय स्थिरता और वैश्विक मंच पर अपनी जिम्मेदार छवि बनाए रखना महत्वपूर्ण था। भले युद्धक भावनाओं का ज्वार उमड़ रहा था!

मौके का फायदा उठाते हुए अमेरिकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने चतुराई दिखाते हुए, संघर्ष-विराम को अपनी कूटनीतिक जीत के रूप में पेश कर डाला। उन्होंने भारत और पाकिस्तान को एक ही तराजू में तौलकर दोनों के बीच मध्यस्थता की पेशकश की, जिसे भारत ने पहले भी ठुकराया था। ट्रंप की यह रणनीति उनकी घरेलू राजनीति को मजबूत करने और वैश्विक नेता की छवि बनाने की कोशिश थी।

यह भी पढ़ें… भारत-पाक युद्ध और ड्रैगन की छाया

संघर्ष-विराम के बाद भी भारत की सख्त चेतावनी

उनकी इस टिप्पणी ने भारत की उस कूटनीतिक उपलब्धि को कमजोर करने की कोशिश की, जिसमें भारत ने दुनिया को यह समझाया कि पाकिस्तान आतंकवाद का पोषक है। अमेरिकी विदेश विभाग ने भारत के आतंकवाद विरोधी प्रयासों का समर्थन किया, लेकिन ट्रंप का बयान दोनों देशों को समान मानने की भूल करता है। इसे भारत की जनता कभी स्वीकार नहीं कर सकती।

जैसा कि अंदेशा था, कुत्ते की पूँछ टेढ़ी की टेढ़ी ही रही। संघर्ष-विराम के बावजूद, पाकिस्तान ने एलओसी पर गोलीबारी और ड्रोन हमलों की कोशिशें जारी रखीं। उसने श्रीनगर, अमृतसर और जम्मू सहित 15 भारतीय शहरों पर हमले की नाकाम कोशिश की, जिसे भारतीय सेना ने एस-400 और अन्य रक्षा प्रणालियों से विफल कर दिया।

भारत ने इन उल्लंघनों का जवाब सैन्य तैयारियों और कूटनीतिक दबाव से दिया। राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल ने अमेरिका और चीन के समकक्षों से बात कर भारत की स्थिति स्पष्ट की, जबकि विदेश मंत्रालय ने संयुक्त राष्ट्र में पाकिस्तान की आतंकी गतिविधियों को उजागर किया। कहना न होगा कि ऑपरेशन सिंदूर ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की निर्णायक और सख्त नेता की छवि को और मजबूत किया।

आतंकवाद के खिलाफ भारत की रणनीतिक दृढ़ता

पहलगाम हमले के बाद जनता में उपजे गुस्से को देखते हुए यह कार्रवाई जरूरी थी। ऑपरेशन का नाम सिंदूर महिलाओं के सम्मान और बलिदान से जोड़ा गया, जिसने इसे भावनात्मक समर्थन भी दिलाया। हाँ, अचानक संघर्ष-विराम ने कुछ सवाल खड़े किए कि क्या भारत ने अंतरराष्ट्रीय दबाव में जल्दबाजी दिखाई। फिर भी, वैश्विक मंचों पर भारत की आतंकवाद विरोधी कार्रवाइयों को ज्यादातर देशों का समर्थन मिला, जिसने मोदी सरकार की कूटनीतिक ताकत को रेखांकित किया।

सयाने बता रहे हैं कि भारत-पाक रिश्तों का भविष्य अनिश्चित बना हुआ है। पाकिस्तान के डीप स्टेट और चीन के समर्थन से आतंकवाद को बढ़ावा मिलता रहेगा, जिसे ऑपरेशन सिंदूर जैसे अभियान पूरी तरह रोक नहीं सकते। इसीलिए भारत ने कहा है कि आतंकवाद के खिलाफ यह अभियान अभी ख़त्म नहीं हुआ है।

भारत को अपनी सैन्य और कूटनीतिक ताकत बढ़ानी होगी। साथ ही वैश्विक मंचों पर पाकिस्तान को अलग-थलग करने की रणनीति पर काम करना होगा। बातचीत का रास्ता तभी संभव है, जब पाकिस्तान आतंकवाद को छोड़ दे, जो फिलहाल असंभव दिखता है। क्षेत्रीय स्थिरता के लिए भारत को अपनी रक्षा तैयारियों को मजबूत करते हुए कूटनीति पर ध्यान देना होगा।

अब आपके लिए डेली हिंदी मिलाप द्वारा हर दिन ताज़ा समाचार और सूचनाओं की जानकारी के लिए हमारे सोशल मीडिया हैंडल की सेवाएं प्रस्तुत हैं। हमें फॉलो करने के लिए लिए Facebook , Instagram और Twitter पर क्लिक करें।

Related Articles

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *

Back to top button