युद्धविराम पर शांतिदूत का वीटो!

अमेरिका ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में 4 जून, 2025 को एक बार फिर अपने वीटो अधिकार का इस्तेमाल कर डाला। ग़ाज़ा में तुरंत, बिना शर्त और स्थायी युद्धविराम की माँग वाले प्रस्ताव को रोक ही तो दिया। याद रहे कि प्रस्ताव में बंधकों की रिहाई और मानवीय सहायता की बेरोकटोक पहुँच की बात भी थी। सुरक्षा परिषद के 15 में से 14 सदस्यों ने इसके पक्ष में वोट दिया। लेकिन विश्व शांति के मसीहा बने घूमते ट्रंप महाशय का अमेरिका अकेला विरोध में खड़ा रहा। तर्क यह कि प्रस्ताव में हमास की निंदा नहीं थी और न ही बंधकों की रिहाई को युद्धविराम से सीधे जोड़ा गया था।

अक्टूबर 2023 से ग़ाज़ा में जारी संघर्ष के बाद यह पाँचवाँ मौका है जब अमेरिका ने युद्धविराम प्रस्ताव को वीटो किया है। वैश्विक मंच पर अपनी आवाज मजबूत कर रहे और मानवीय सिद्धांतों को मानने वाले देश भारत के लिए यह अंतर्द्वंद्व और सोच-विचार का समय है। सयाने बता रहे हैं कि अमेरिका का कहना है कि बिना शर्त युद्धविराम हमास को और मजबूत करेगा। इससे इजराइल की सुरक्षा को खतरा होगा।

वीटो राजनीति में फंसा भारत का संतुलन प्रयास

अमेरिका, मिस्र व कतर की कूटनीतिक कोशिशें भी कमजोर पड़ जाएँगी। प्रस्ताव में मानवीय सहायता और बंधकों की रिहाई की माँग थी। फिर भी, अमेरिका ने वीटो लगाया। यह इजराइल के प्रति उसके नरम रवैये को उजागर करता है। वह हर बार ग़ाज़ा में इजराइली सैन्य कार्रवाइयों को आलोचना से बचाता आया है। उसे इस बात से शायद कुछ फर्क नहीं पड़ता कि इन कार्रवाइयों में अब तक 54,000 से ज्यादा फिलिस्तीनी मारे गए हैं क्योंकि उसके लिए हमास और आम फिलिस्तीनी नागरिक में शायद कोई भेद नहीं है!

भारत के लिए यह वीटो एक जटिल स्थिति पैदा करता है। भारत इजराइल-फिलिस्तीन मुद्दे पर संतुलित रुख अपनाता है और दो-राष्ट्र समाधान का समर्थन करता है। वह इजराइल और अरब देशों दोनों से संबंध मजबूत कर रहा है। लेकिन अमेरिका का यह कदम भारत की स्थिति को मुश्किल में डालता है क्योंकि यह प्रस्ताव ग्लोबल साउथ के देशों द्वारा समर्थित था, जिनमें से कई के साथ भारत के रिश्ते अच्छे रहे हैं।

दुविधा यह कि इजराइल के साथ बढ़ते रक्षा और तकनीकी रिश्ते भारत को अरब देशों और खुद अपनी मुस्लिम आबादी की नजरों में सवालों के घेरे में ला सकते हैं। वैसे यह कहना भी शायद गलत न हो कि यह वीटो-कांड सुरक्षा परिषद की कमजोरी को भी उजागर करता है। वहाँ स्थायी सदस्यों का वीटो अधिकार सहमति को रोकता है। रूस, चीन, फ्रांस और यूके समेत 14 देशों का समर्थन वैश्विक शांति की माँग को दिखाता है, जिसका रास्ता अमेरिका ने अकेले रोक दिया।

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मानवता बनाम भू-राजनीति: भारत की नैतिक चुनौती

चीन के राजदूत ने इसे अमेरिका की रुकावट वाली नीति बताया, जो परिषद की विश्वसनीयता को कमजोर करती है। स्थायी सदस्यता की उम्मीद लगाए बैठा भारत इसे संयुक्त राष्ट्र सुधार की जरूरत का संकेत मान सकता है, ताकि ग्लोबल साउथ की आवाज सुनी जाए। ग़ाज़ा में मानवीय संकट सहायता पर रोक और अमेरिका-इजराइल समर्थित गाजा ह्यूमैनिटेरियन फाउंडेशन (जीएचएफ) की विवादित नीतियों से और गहरा गया है।

जीएचएफ की निजी सहायता प्रणाली पर संयुक्त राष्ट्र ने सैन्यीकरण का आरोप लगाया है। 3 जून को एक सहायता वितरण केंद्र पर 27 फिलिस्तीनियों की मौत इसका सबूत है। निर्गुटता और मानवीय सहायता की विरासत के साथ भारत से उम्मीद की जानी स्वाभाविक है कि वह अपनी जी20 नेतृत्व की ताकत से संयुक्त राष्ट्र के नेतृत्व में निष्पक्ष सहायता व्यवस्था की वकालत करे।

कहना न होगा कि अमेरिका का वीटो प्रयोग यह कठोर संदेश देता है कि भू-राजनीतिक हित मानव जीवन से ऊपर हैं! भारत के लिए यह अवसर है कि बहुपक्षीयता को बढ़ावा दे और ऐसी वैश्विक व्यवस्था की वकालत करे, जो शक्ति के बजाय शांति को प्राथमिकता दे। ऐसा करके भारत एक नैतिक और रणनीतिक ग्लोबल लीडर के रूप में उभर सकता है।

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