इंदौर में पानी के पाइपों में बहता जहर!
पिछले साल के आखिरी पखवाड़े में जिस तरह इंदौर का भागीरथपुरा इलाका दूषित पानी की चपेट में आया, उससे इंदौर की अब तक की जितनी साख थी, उसमें बट्टा इसलिए भी लग चुका है, क्योंकि ये भीषण त्रासदी कोई प्राकृतिक आपदा नहीं थी बल्कि प्रशासनिक लापरवाही, आत्ममुग्ध ब्रांडिंग और जमीनी सच्चाई से कटे तंत्र की उपज है। सोशल मीडिया में इंदौर की त्रासदी को लेकर तरह-तरह के मीम बन रहे हैं कि जिस शहर को साफ सड़कों, चमचमाते कचरा वाहनों और अनुशासित नागरिक व्यवहार के लिए दिन-रात सराहा जा रहा था, उसी शहर में नल में बहते जहरीले पानी ने एक झटके में इस शहर की सारी साख को नाली में बहा दिया है। यह महज विंडबना नहीं एक भयावह चेतावनी है कि किस तरह लापरवाही किसी भी शहर को देखते ही देखते भयावह त्रासदी से घिरा बना सकती है।
भारत के सबसे स्वच्छ शहर का तमगा पिछले एक दशक से इंदौर के पास है, जो सिर्फ एक पुरस्कार नहीं बल्कि शहरी की गर्वीली पहचान रहा है। लेकिन उसी इंदौर में इन दिनों पानी की लीकेज पाइप लाइनों के जरिये यहां के भागीरथपुरा इलाके में जिस तरह मौत का हाहाकार मचा हुआ है, उससे देश ही नहीं पूरी दुनिया स्तब्ध है। इन पंक्तियों के लिखे जाने तक इंदौर में दूषित पानी से मरने वाले लोगों की संख्या बढ़कर 15 हो गई है और बीमार लोगों की संख्या करीब 1400 से ऊपर है।
साल के पहले दिन तक शहर के भागीरथपुरा इलाके में पाइप लाइन में लीकेज से मिले सीवेज वाटर के कारण मरने वालों की संख्या जहां 14 थी, वहीं 2 जनवरी 2026 को 68 वर्षीय गीता बाई ने भी दम तोड़ दिया, इस तरह मरने वालों की संख्या बढ़कर 15 हो गई। अभी जितने लोग इस दूषित पानी के कारण बीमार हैं, उनमें 16 बच्चों के साथ 201 लोग, जो कि अलग-अलग अस्पतालों में भर्ती हैं, उनकी हालत काफी नाजुक है। 31 दिसंबर 2025 तक दूषित पानी को लेकर तरह-तरह की अटकलों और उनके खंडनों का जो बाजार गर्म था, उसे 1 जनवरी 2026 को महात्मा गांधी मेडिकल कॉलेज की लैब रिपोर्ट ने पुष्टि कर दी कि इस इलाके में पीने के पानी के साथ जानलेवा बैक्टीरिया की मिलावट पाइप लाइन में लीकेज के चलते सीवेज वाटर से हुई है।
मीडिया को हड़काने की कोशिश, बाद में जहरीले पानी की पुष्टि
इसके एक दिन पहले ही जिस तरह से बीजेपी के एक धाकड़ नेता ने एक पत्रकार को इस संबंध में सवाल पूछे जाने पर जिस तरह से हड़काने की कोशिश की थी और यह इम्प्रेशन दिया था कि मीडिया जान-बूझकर शहर को बदनाम कर रही है। ऐसे ही बयानों के कारण न सिर्फ भाजपा की छवि तार-तार हो रही है बल्कि भारत के शहरी प्रशासन की सारी पोल खुलकर रह गई है। अब तक की मेडिकल जांच से यह भी पुष्टि हो गई है कि जिन 15 लोगों की मौत अभी तक हुई है, उन सभी लोगों की जान नलों में आ रहे जहरीले पानी से ही हुई है।
मेडिकल कॉलेज के सीएमएचओ डॉ. माधव हसानी ने सैंपल की जांच रिपोर्ट को पत्रकारों के सामने पेश करते हुए कहा है कि साफ तौरपर पुष्टि होती है कि जिस पानी को इलाके के लोगों ने पीया है, उसमें जहरीले बैक्टीरिया की मिलावट है। हालांकि इस मामले में कलेक्टर शिवम वर्मा ने कुछ लीपापोती करने की कोशिश यह करके की कि अभी डिटेल में रिपोर्ट आने का इंतजार है और यह भी कि मेडिकल कॉलेज में कल्चर टेस्ट भी किया जा रहा है। इसकी रिपोर्ट आने के बाद ही कुछ ठीक पता चलेगा।
लेकिन अब यह स्पष्ट हो गया है कि भागीरथपुरा इलाके में पेय जल में सीवेज का पानी प्रशासन की लापरवाही के कारण पीने वाले पानी में मिल गया है और इसकी पुष्टि उन्हीं मान्यवर नेता ने भी कर दी है, जो दो दिन पहले टीवी के पत्रकार द्वारा इस संबंध में सवाल पूछे जाने पर उखड़ गये थे। लेकिन अब नगरीय प्रशासन मंत्री ने भी खुद पत्रकारों के सामने आकर इस बात को स्वीकारा है और आशंका जतायी है कि इलाके में स्थित चौकी के पास लीकेज वाली जगह है।
टेंडर प्रक्रिया और निगरानी फेल, नतीजा जानलेवा संकट
दरअसल, इस मामले में हर तरफ से आनन-फानन में जांच और कार्यवाईयों का दौर इसलिए भी चल पड़ा है, क्योंकि राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने इस मामले में मीडिया रिपोर्टों के आधार पर स्वतः संज्ञान लिया है और मध्य प्रदेश सरकार के मुख्य सचिव को नोटिस जारी करके दो सप्ताह के अंदर विस्तृत रिपोर्ट देने की बात कही है। इन पंक्तियों के लिखे जाने तक हालांकि हाईकोर्ट में इस मामले की सुनवाई शुरु नहीं हुई थी, लेकिन जबलपुर की दो सदस्यीय बेंच ने 2 जनवरी 2026 को इस दूषित पानी के चलते हुई मौतों पर प्रशासन की लापरवाही को लेकर ऑनलाइन सुनवाई किये जाने का फैसला किया है और कोर्ट ने सरकार से स्टेटस रिपोर्ट मांगी है।
हालांकि एक्सपर्ट्स के मुताबिक दूषित पानी में बैक्टीरिया का होना तय हो चुका है, लेकिन कौन से बैक्टीरिया ने प्रभावित किया है, इसके लिए एक स्पेशल जांच होती है, जिसे कल्चर कहते हैं, उसकी रिपोर्ट अभी तक नहीं आयी। माना जाता है कि पानी की पाइप लाइन में जो सीवेज का पानी मिला है, उसमें कई तरह का गंदा पानी था। मसलन टॉयलेट में बहने वाला मल-मूत्र, बाथरूम में नहाने और कपड़े धोने के साबुन और पाउडर वाला पानी, साथ ही बर्तन धोने के साबुन, फर्श साफ करने वाले लीक्विड और केमिकल भी इस सीवेज पानी में बहते हैं यानी ये अलग-अलग तरह के दूषित जल ड्रेनेज में आकर मिलते हैं और यही पीने वाले पानी की पाइप लाइन में शामिल हो गया है।
निगम अफसरों और पार्षद पर लापरवाही के गंभीर आरोप
जानकारों का कहना है कि अगर इस पानी में कमर्शियल केमिकल संबंधी वेस्ट हैं, तो यह पानी इतना ज्यादा घातक हो गया है। इससे हैजा आदि के होने की गंभीर संभावनाएं होती हैं। लेकिन सवाल ये नहीं है कि पीने के पानी में गंदे पानी के मिलावट के कारण मौते हुईं, अब जो बातें सामने आ रही हैं, उनसे पता चल रहा है कि स्थानीय बस्ती भागीरथपुरा के लोग पिछले एक साल से गंदे पानी की शिकायत कर रहे थे। फिर भी उनकी शिकायत प्रशासन के वरिष्ठ अधिकारियों ने नहीं सुनी।
सबसे बड़ा आरोप निगमायुक्त दिलीप यादव पर लग रहा है, जिन्होंने गंदे पानी की शिकायतों को अनदेखा किया और पाइप लाइन की टेंडर प्रक्रिया पर नजर नहीं रखी। वहीं अपर आयुक्त रोहित सिसोनिया पर भी उंगलियां उठ रही हैं, क्योंकि अगस्त में टेंडर जारी हुए थे, जिन्हें उन्होंने रोक रखा था, लेकिन शिकायतें नहीं सुनी। भागीरथपुरा इलाके जहां बहुत बड़ी संख्या में लोग बीमार हैं और 15 लोगों की जान गई है, उस इलाके के निगम पार्षद कमल वाघेला से चार महीनों से स्थानीय लोग शिकायत कर रहे थे। लेकिन वह इस संबंध में कोई त्वरित कार्यवाई कराने में असफल रहे।
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पांच माह के शिशु की मौत ने झकझोरा शहर का ज़मीर
यही आरोप इंदौर के महापौर पुष्यमित्र भार्गव पर भी लग रहा है, क्योंकि पार्षद कमल वाघेला का कहना है कि उन्होंने महापौर से कई बार शिकायतें की, लेकिन उन्होंने ध्यान नहीं दिया, न ही कोई कदम उठाया और अंतिम रूप से या व्यवहारिक रूप से जो प्रभावशाली व्यक्ति इस लापरवाही का प्राथमिक रूप से जिम्मेदार हो सकता है, वो हैं बबलू शर्मा, जो स्थानीय इलाके के जल कार्य प्रभारी हैं और लगातार दूषित पानी की सप्लायी पर उनका ध्यान आकर्षित कराये जाने पर भी इस संबंध में उन्होंने कोई कार्यवाई करने की नहीं सोची।
सबसे बड़ी बात यह है कि इस त्रासदी में एक पांच माह के बच्चे अव्यान की मौत महज इसलिए हो गई, क्योंकि उसने जो दूध पीया था, उसमें सिर्फ पांच मिलीग्राम यही दूषित पानी मिलाया गया था। पिछले साल के आखिरी पखवाड़े में जिस तरह इंदौर का भागीरथपुरा इलाका दूषित पानी की चपेट में आया, उससे इंदौर की अब तक की जितनी साख थी, उसमें बट्टा इसलिए भी लग चुका है, क्योंकि ये भीषण त्रासदी कोई प्राकृतिक आपदा नहीं थी बल्कि प्रशासनिक लापरवाही, आत्ममुग्ध ब्रांडिंग और जमीनी सच्चाई से कटे तंत्र की उपज है।

सोशल मीडिया में इंदौर की त्रासदी को लेकर तरह-तरह के मीम बन रहे हैं कि जिस शहर को साफ सड़कों, चमचमाते कचरा वाहनों और अनुशासित नागरिक व्यवहार के लिए दिन-रात सराहा जा रहा था, उसी शहर में नल में बहते जहरीले पानी ने एक झटके में इस शहर की सारी साख को नाली में बहा दिया है। यह महज विंडबना नहीं एक भयावह चेतावनी है कि किस तरह लापरवाही किसी भी शहर को देखते ही देखते भयावह त्रासदी से घिरा बना सकती है।
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