दिल्ली-ढाका के रिश्तों में बढ़ेगी खटास, कौन संभालेगा बांग्लादेश की बागडोर?

बांग्लादेश में भारत विरोधी भावना को पाकिस्तान और चीन शह दे रहे हैं और उनकी गुप्तचर एजेंसियां वहां सािढय हैं। ढाका-इस्लामाबाद-बीजिंग नयी धुरी के तौर पर उभर रहे हैं और भारतीय सीमा के मात्र 12-15 किमी दूर लालमोनिरहाट एयरबेस को फिर से शुरू करने की चीन को अनुमति मिल गई है। अचरज की बात है कि इजराइल बांग्ला फौज को प्रशिक्षण व उपकरण दे रहा है। हालात संकेत करते हैं कि आगामी समय में दिल्ली और ढाका के रिश्तों में खटास बढ़ेगी।

बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री और बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी की चेयरपर्सन बेगम खालिदा जिया नहीं रहीं। 30 दिसंबर को फज्र की नमाज के बाद उन्होंने ढाका के एवर केयर हास्पिटल में अंतिम सांस ली। वह 23 नवंबर से अस्पताल में भर्ती थीं और दिल, ज़िगर और गुर्दे के अनेक विकारों के अलावा मधुमेह और उच्च रक्तचाप से पीड़ित थीं। रात दो बजे के करीब अस्पताल के डॉक्टर प्रो.एजेडएम हुसैन ने पत्रकारों को यह कहकर ब्रीफ किया कि बेगम ज़िया गंभीर संकट से गुज़र रही हैं, लेकिन करीब चार घंटों के बाद उन्होंने ऐलान किया कि 80 वर्षीया बेगम नहीं रहीं।

गौरतलब है कि बेगम शेख हसीना वाजेद के भारत में शरण लेने के बाद बेगम जिया बांग्लादेश में सबसे शक्तिशाली नेता के तौर पर चिन्हित थीं और आगामी 12 फरवरी को आसन्न चुनाव में उनकी पार्टी बीएनपी की सत्ता में वापसी का कयास लगाया जा रहा था। बेगम जिया ने जब आंखें मूंदी, तब उनका भरा-पुरा कुनबा वहां मौजूद था। उनके बेटे तारिक रहमान, बहू जुबैदा रहमान, बेटी ज़ैमा के अलावा दिवंगत पुत्र अराफत रहमान कोके की बेवा सैयदा शमीला रहमान और बेटियां जाहिया एवं जाफिया, छोटा भाई शमीर इस्कंदर उसकी पत्नी कनीज फातिमा, दिवंगत भाई सईद की पत्नी नसरीन और बहन सेलिना इस्लाम उनके आखिरी लम्हों में उनकी नज़रों के सामने थे।

सन् 1978 में बीएनपी की स्थापना और 1984 में चेयरपर्सन बनीं

बेगम जिया का जन्म 12 फरवरी, सन् 1945 को भारत में जलपाईगुड़ी में हुआ था। उनका लाड़-प्यार का नाम पुतुल था। विभाजन पर उनका परिवार पूर्वी पाकिस्तान चला गया। उनकी प्रारंभिक शिक्षा-दीक्षा दिनाजपुर में मिशनरी एवं गर्ल्स स्कूल में हुई। सन् 1965 में कैप्टेन जिया उर रहमान से शादी के बाद वह पाकिस्तान चली गयीं। बाद में कैप्टेन जिया बांग्लादेश के राष्ट्रपति रहे और खालिदा सन् 1977-81 में देश की प्रथम महिला।

कैप्टेन जिया ने सन् 1978 में बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) की स्थापना की। 30 मई, 1981 को कैप्टेन जिया की हत्या के बाद जनवरी, सन् 82 में बेगम ने बीएनपी ज्वाइन की और 10 मई सन् 84 को वह पार्टी की चेयरपर्सन चुनी गयीं। जीवन के आखिरी पल तक वह इस पद पर बनी रहीं। सन् 1991 से 1996 और फिर सन् 2001 से 2006 तक प्रधानमंत्री रहकर उन्होंने इतिहास रच दिया। सन् 2008 से 2014 के दरम्यान वह शेख हसीना वाजेद के प्रधानमंत्रित्व काल में नेता प्रतिपक्ष रहीं।

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बेगम खालिदा जिया के निधन से बांग्लादेश की सियासत में हलचल

दरअसल, बांग्लादेश की राजनीति में खालिदा जिया और शेख हसीना को प्रतिद्वंद्वी और विरोधी विचारधारा के प्रतिनिधि के तौर पर देखा जाता रहा है। शेख हसीना को जहां भारत के साथ अच्छे संबंधों और अल्पसंख्यकों के प्रति सदाशयता की हिमायती के तौर पर देखा जाता है, वहीं खालिदा जिया भारत-विरोधी बांग्ला राष्ट्रवाद का प्रतिनिधित्व करती रहीं। वह मजहबी ताकतों को पोसने के लिये जानी जाती हैं। तीस्ता तीरे जनमी खालिदा की चर्चा आमोखास में रही है। उन्हें कमर मुरादाबादी का शेर अब मैं समझा तिरे रूख्सार पे तिल का मतलब। दौलते-हुस्न पे दरबान बिठा रखा है निहायत पसंद था।

माना जा रहा था कि वह बीएनपी के पुनर्सत्तारोहण की वाहिका बनेंगी, लेकिन उनके निधन से सियासत की मुंडेर पर अटकलों का सब्जे उग आये हैं। यह सौ फीसदी तय है कि अब उनके बेटे तारिक उनका उत्तराधिकार संभालेंगे और अवामी लीग पर पाबंदी के साये में चुनाव के बाद वही बतौर पीएम देश की बागडोर संभालेंगे। यूं तो बांग्लादेश की सियासत बंगबंधु मुजीबुर्रहमान की हत्या के बाद ही बेपटरी हो गयी थी, किंतु शेख हसीना के पलायन के बाद कट्टरपंथी इस्लामी तत्वों की बन आई है। हिंदुओं की नृशंस हत्याएं और दमन इसका प्रमाण है।

डॉ. सुधीर सक्सेना
डॉ. सुधीर सक्सेना

बांग्लादेश में भारत विरोधी भावना को पाकिस्तान और चीन शह दे रहे हैं और उनकी गुप्तचर एजेंसियां वहां सािढय हैं। ढाका-इस्लामाबाद-बीजिंग नयी धुरी के तौर पर उभर रहे हैं और भारतीय सीमा के मात्र 12-15 किमी दूर लालमोनिरहाट एयरबेस को फिर से शुरू करने की चीन को अनुमति मिल गई है। अचरज की बात है कि इजराइल बांग्ला फौज को प्रशिक्षण व उपकरण दे रहा है। हालात संकेत करते हैं कि आगामी समय में दिल्ली और ढाका के रिश्तों में खटास बढ़ेगी।

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