दंगों के बीच लाहौर से प्राप्त किया प्रेस और काग़ज़
निर्भीकता को पत्रकारिता के सबसे अव्वल गुणों में गिना जाता है। इसी निर्भीकता ने मिलाप की जड़ों को सींचा है। देश के विभाजन के दौरान की एक घटना का उल्लेख किया जाता है। दंगों के दौरान रणवीरजी (बाद में दिल्ली में उर्दू मिलाप के संपादक हुए) पर हमला हुआ, तो मिलाप परिवार लाहौर से दिल्ली चला आया, लेकिन मिलाप प्रेस और बड़ी मात्रा में छपाई का काग़ज़ लाहौर में ही रह गया था।
चूंकि दंगों के दौरान मिलाप अख़बार के बारे में दुष्प्रचार किया गया था, इसलिए संभावना थी कि प्रेस और काग़ज़ को लाने की अनुमति नहीं दी जाएगी और स्थानीय अख़बार भी इसे खरीदेंगे नहीं। युद्धवीरजी ऐसे हालात में भी वासुदेव खद्दर के साथ लाहौर गये। वे मौत के मोल भी अपनी चीज़ें हासिल करने के अपने फैसले पर डटे रहे। मिलाप प्रेस और कागज़ पर जमीनदार अख़बार के मालिक मौलाना अख़्तर अली ने कब्ज़ा कर रखा था और वह सामान लौटाने के लिए तैयार नहीं था।
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युद्धवीरजी इसकी शिकायत लेकर सीधे वेस्ट पंजाब के चीफ मिनिस्टर नवाब ममदाट के पास पहुँचे। नवाब ममदाट युद्धवीरजी और उनके व्यक्तित्व से भली-भांति परिचित थे। नवाब ने अख़्तर अली को खूब फटकारा और फिर दंगों के बीच युद्धवीरजी ने एक मिसाल काम करते हुए प्रेस और काग़ज़ प्राप्त किया। ऐसी कई घटनाएं युद्धवीर के जीवन में आती रहीं। चाहे अंग्रेज़ हों या फिर समाज विरोधी तत्व, वे हमेशा उनके विरुद्ध डटकर खड़े रहे। यही आदर्श मिलाप की नींव को सींचते रहे और यह सिलसिला आज भी जारी है।
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