नियमबद्ध जीवन का पर्याय है सनातन संस्कृति
सनातन धर्म का अर्थ है- शाश्वत मार्ग या सनातन नियम, जिसका न आदि है, न अंत। यह जीवन जीने की एक शाश्वत एवं सार्वभौमिक पद्धति है, जो सत्य, अहिंसा, दया, धैर्य जैसे शाश्वत मूल्यों पर आधारित है, जिसे वेदों, उपनिषदों और गीता आदि ग्रंथों में बताया गया है। भगवान श्रीकृष्ण सनातन पद्धति के संबंध में कहते हैं कि जो छेदा, जलाया, सुखाया, गीला नहीं किया जा सकता, वही सनातन है। सनातन धर्म की मूल अवधारणा यहाँ प्रस्तुत की जा रही है। यह किसी एक धर्म या संप्रदाय से बंधा नहीं है, बल्कि एक जीवनशैली है, जिसके कुछ मुख्य श्लोक हैं-
नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावक।
न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुत।।
गीता (अध्याय 2, श्लोक 24)
अर्थात- इसे (आत्मा को) शस्त्र काट नहीं सकते, अग्नि जला नहीं सकती, जल गीला नहीं कर सकता और वायु सुखा नहीं सकती। यह आत्मा की अमरता और सनातनता को दर्शाता है।
ब्राह्मणो हि प्रतिष्ठा हममृतस्याव्ययस्य च। शाश्वतस्य च धर्मस्य सुखस्यैकान्तिकस्य च।।
गीता (अध्याय 14, श्लोक 27)
अर्थात श्रीकृष्ण कहते हैं कि मैं ही ब्रह्म की प्रतिष्ठा हूँ, अमरता, शाश्वत धर्म और परम सुख का आधार हूँ। सत्यं वद धर्मं चर स्वाध्यायान्मा प्रमद। अर्थात- सत्य बोलो, धर्म का पालन करो और स्वाध्याय से विमुख मत हो। (तैत्तिरीयोपनिषद्)
सनातन धर्म के शाश्वत सिद्धांत हैं- सत्य, अहिंसा, दया, क्षमा, पवित्रता, संयम। हर सनातनी को अपने जीवन में इन सिद्धांतों को धारण करना चाहिए। ये सिद्धांत सृष्टि के संचालन के महत्वपूर्ण बिंदु हैं। इनका पालन करने वाला कई प्रकार के अधर्म से बचा रहता है। यह सिद्धांत मनुष्य को परम सत्ता के निकट ले जाने में सक्षम हैं। इनका पालन करके मनुष्य परमात्मा से जुड़कर अपने जीवन को सफल बना सकता है।
सत्य, कल्याण और सौंदर्य से जीवन का संरक्षण
मानव जीवन के उद्देश्य की पूर्ति कर सकता है और सृष्टि के साथ सामंजस्य स्थापित करके उसे सुंदर व शाश्वत बनाए रख सकता है। वर्तमान में बाढ़, भूस्खलन, प्रदूषित वातावरण आदि का सामना इन सिद्धांतों की अवहेलना के कारण ही करना पड़ रहा है। इसलिए अभी भी समय है, ऐसे विनाश से बचने का, संभलने का। वेद, उपनिषद, गीता, रामायण, महाभारत, पुराण आदि ग्रंथों में सनातन संस्कृति की महिमा का गुण गान किया गया है।
सत्यम् शिवम् सुंदरम् अर्थात सहज, सरल व सुंदर पद्धति है। यह वाक्यांश बताता है कि सत्य, शुभता और सौंदर्य अलग-अलग नहीं हैं, बल्कि एक ही दिव्य वास्तविकता (ईश्वर/शिव) के पहलू हैं। यह जीवन के लिए एक कसौटी है। कोई भी चीज़ तभी स्वीकार्य है, जब वह सत्य हो, कल्याणकारी हो और सुंदर हो। यह विचार उपनिषदों और वेदों से लिया गया है, जो मानवीय मूल्यों के महत्व को बताता है।
सत्यम् शिवम् सुंदरम् का सिद्धांत हमें सिखाता है कि ईश्वर की प्राप्ति सत्य के मार्ग से होती है, जो स्वयं कल्याणकारी और परम सौंदर्य का स्रोत है तथा इसी में जीवन का सार है। सनातन धर्म मनुष्य को उसके वास्तविक आध्यात्मिक स्वरूप का बोध कराता है। उसे सदाचारी व ज्ञानवान बनाता है। हिन्दू धर्म मन को मारने की, नष्ट करने की, मनोलय करने की शिक्षा देता है।
अनुशासन ही सच्ची स्वतंत्रता और मानवता का आधार
सनातनी परंपरा में व्यक्तिगत स्वतंत्रता या मनमाना कार्य करने की आज़ादी नहीं है। व्यक्तिगत स्वतंत्रता को उच्छश्रृंखलता माना गया है। वही मानव कहलाने के योग्य है, जो नैतिक और सदाचार का नियम रूपी आवरण धारण किए रहता है। स्वतंत्र जीवन की धारणा मानव को बिगड़ैल सांड तुल्य बनाती है। नियमों का उल्लंघन बाढ़ की तरह होता है, जो जीवन को तबाह कर देता है।
नियमबद्ध जीवन का अर्थ है- जीवन को व्यवस्थित, अनुशासित और उद्देश्यपूर्ण बनाना, जिसमें सही समय पर सही काम करना, स्वास्थ्य का ध्यान रखना (खान-पान, व्यायाम, नींद), नकारात्मक विचारों और आदतों (ाढाध, आलस्य, लालच) से बचना और जीवन में लक्ष्य निर्धारित करना शामिल है, जिससे मानसिक शांति और सफलता मिलती है। यह जीवन को प्रकृति और ब्रह्मांड के नियमों के अनुरूप ढालने का तरीका है, जिससे एक स्वस्थ और संतुष्ट जीवन जिया जा सकता है। इस लेख का अंत मैं संत रहीम दास के एक दोहे से करना चाहूंगा-
रहिमन रीति सराहिए, जो घट गुन सम होय।
भीति आप पै डारि के, सबै पियावै तोय।।

भावार्थ- रहीम कहते हैं कि हमें उस व्यवहार की प्रशंसा करनी चाहिए, जो घड़े और रस्सी के व्यवहार के समान हो। घड़ा और रस्सी दोनों जोखिम उठाकर दूसरों को जल पिलाते हैं, जब घड़ा कुएँ में जाता है तो रस्सी और घड़े के टूटने का खतरा रहता है। सच्चा सनातनी वह है, जो अपने जीवन को जोखिम में डालकर अन्यों की सहायता करता है और मानवीय गुणों से भरा रहता है।
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