तो मौत से डर गए थे डोनल्ड ट्रंप ?
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने दावा किया है कि यदि वे ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई को नहीं मारते तो स्वयं मारे जाते, क्योंकि खामेनेई उनकी हत्या की साजिश रच रहे थे। इसे सिर्फ एक सनसनीखेज बयान नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति, सुरक्षा विमर्श और चुनावी रणनीति के जटिल अंतर्संबंधों का संकेतक समझना चाहिए। इसकी गूँज मध्यपूर्व से लेकर अमेरिकी घरेलू राजनीति तक सुनाई दे रही है।
गौरतलब है कि ट्रंप के पहले कार्यकाल से ही अमेरिका और ईरान के संबंध तीव्र तनावग्रस्त रहे। परमाणु समझौते से अमेरिका की वापसी, कठोर आर्थिक प्रतिबंध और क्षेत्रीय सैन्य टकरावों ने दोनों देशों को आमने-सामने ला खड़ा किया। ईरान की ओर से भी अमेरिकी नीतियों के प्रति तीखी प्रतिक्रिया और प्रतिशोध की चेतावनियाँ दी जाती रही हैं। ऐसे वातावरण में यदि ट्रंप यह कहते हैं कि उनके विरुद्ध हत्या की साजिश रची जा रही थी, तो वह पूरी तरह असंभव कल्पना भी नहीं लगती; किंतु अंतरराष्ट्रीय संबंधों में आशंका और प्रमाण के बीच की दूरी बहुत महत्वपूर्ण होती है!
ट्रंप के दावे की सत्यता और प्रमाण पर संदेह
यही वह बिंदु है जहाँ इस दावे की सत्यता और विश्वसनीयता पर सवाल खड़े होते हैं। अब तक सार्वजनिक रूप से ऐसा कोई ठोस, निर्विवाद प्रमाण सामने नहीं आया है, जो यह सिद्ध करें कि ईरान की सर्वोच्च नेतृत्व-व्यवस्था ने आधिकारिक रूप से ट्रंप की हत्या का आदेश दिया था। समय-समय पर अमेरिकी एजेंसियों ने ईरान से जुड़े कुछ व्यक्तियों पर साजिश रचने के आरोप लगाए हैं, परंतु आरोप और न्यायिक रूप से सिद्ध तथ्य में अंतर होता है। जब तक किसी स्वतंत्र और विश्वसनीय जाँच में यह स्थापित न हो कि राज्य-स्तर पर ऐसा निर्णय लिया गया था, तब तक ट्रंप का कथन राजनीतिक वक्तव्य ही अधिक प्रतीत होता है!
दरअसल, अमेरिकी राजनीति में राष्ट्रीय सुरक्षा एक अत्यंत संवेदनशील मुद्दा है। किसी भी नेता के लिए यह संदेश देना लाभप्रद हो सकता है कि उसने संभावित खतरे को पहले ही निष्प्रभावी कर दिया। पहले मारे सो मीर की तर्क-रेखा नेतृत्व की दृढ़ता और निर्णायकता का आभास कराती है। विशेषकर ध्रुवीकृत राजनीतिक माहौल में, जहाँ समर्थक वर्ग कठोर रुख को शक्ति का प्रतीक मानता है, ऐसी भाषा चुनावी और वैचारिक समर्थन को सुदृढ़ कर सकती है। किंतु यही भाषा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अस्थिरता का कारण भी बन सकती है!
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अंतरराष्ट्रीय कानून और नैतिकता में नेता की लक्षित हत्या पर प्रश्न
कानूनी और नैतिक पक्ष भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं। किसी संप्रभु राष्ट्र के शीर्ष नेता की लक्षित हत्या -प्रत्यक्ष हो या परोक्ष – अंतरराष्ट्रीय कानून, संयुक्त राष्ट्र चार्टर और राजनयिक मानकों के संदर्भ में गंभीर प्रश्न उठाती है। यदि आत्मरक्षा का तर्क दिया जाता है, तो उसके लिए आसन्न और स्पष्ट खतरे का प्रमाण ज़रूरी होता है। अंतरराष्ट्रीय समुदाय सामान्यत इस सिद्धांत को स्वीकार करता है कि आत्मरक्षा अंतिम विकल्प होना चाहिए, न कि राजनीतिक रणनीति का उपकरण!
इस पूरे प्रसंग के भविष्यगत संकेत चिंताजनक भी हो सकते हैं। यदि वैश्विक राजनीति में यह प्रवृत्ति बढ़ती है कि संभावित षड्यंत्र के संदेह मात्र पर शीर्ष नेताओं को निशाना बनाया जाए, तो शक्ति-संतुलन और अधिक अस्थिर हो जाएगा। मध्यपूर्व पहले ही कई परोक्ष युद्धों और प्रतिद्वंद्विताओं का मैदान रहा है; ऐसे दावे और कार्रवाइयाँ प्रतिशोध की नई श्रृंखलाओं को जन्म दे सकती हैं। साथ ही, इससे वैश्विक शक्तियों के बीच अविश्वास की खाई और गहरी हो सकती है।
अंततः, ट्रंप का यह कथन जितना व्यक्तिगत सुरक्षा का प्रश्न प्रस्तुत करता है, उतना ही वह राजनीतिक संप्रेषण की शैली का उदाहरण भी है। जब तक ठोस और पारदर्शी प्रमाण सार्वजनिक न हों, इसे निर्विवाद सत्य के रूप में स्वीकार करना कठिन है। लोकतांत्रिक और अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था की स्थिरता इसी में है कि दावों की जाँच तथ्यों के आधार पर हो, न कि केवल शक्ति-प्रदर्शन की भाषा के आधार पर! और हाँ; इस संभावना को भी तो असंभव नहीं कहा जा सकता न कि भय की किसी निजी ग्रंथि से प्रेरित होकर ट्रंप महोदय इतने आक्रामक हो गए हैं कि हर शत्रु को निपटाने पर आमादा हैं!
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