हाथ नहीं आती समय की तितली
वो भी क्या दिन थे, जब तितलियों के पीछे दौड़ा करते थे, उन्हें पकड़ने का प्रयास करते थे, तितलियाँ अपने आकर्षक परों से रिझाती थी। एक गीत दिमाग में चलता रहता था – तितली उड़ी, उड़के चली, फूल ने कहा आ जा मेरे पास … । तितली हाथ नहीं आती थी। यही आकर्षण जीवन भर इधर -उधर की दौड़ भाग कराता रहता है। समय की तितली हाथ नहीं आती । अच्छे समय की आस में एक अदद आदमी भ्रमित रहता है।
समय का पहिया अपनी गति से चलता ही रहता है। चाहे लाख कोशिश करो, बीता समय लौटकर नहीं आता। अबोध बचपन जिस प्रकार से चिंता मुक्त रहता है, उसे देखकर लगता है कि बचपन ही अच्छा है, सच्चा है। कुछ आगे बढ़ने के बाद कल्पनाएँ उड़ान भरने लगती हैं, कभी चंदा मामा पर बूढ़ी दादी चरखा चलाती हुई दिखाई देती हैं, कभी उत्तर दिशा में किसी भी तारे को ध्रुव तारा कहकर टकटकी लगाकर देखा जाता है कि वह अटल तो है न, कहीं अपनी जगह छोड़कर दूसरी जगह तो नहीं जा रहा।
परिवर्तन और ख्वाहिशें: बदलते समय की कहानी
यूँ तो परिवर्तन संसार का नियम है, बीती ताहि बिसारि के आगे की सुधि ली जा रही है। सूचना ाढांति के दौर में बच्चे तीसरी दुनियाँ की बात करने लगे हैं। उन्हें चांद तारों की बात अब नहां सुहाती। फ्लैट कल्चर में खुले आसमान की कोई अवधारणा ही नहां है। वहाँ केवल छत है। आने-जाने के लिए लिफ्ट है। घरेलू सामान मंगाने के लिए बहुत सी एजेंसियां हैं।
मोबाइल पर अंगुली घुमाओ और मनचाही वस्तुएँ पाओ। बहरहाल बात बीते दिनों को लौटाने की ख्वाहिश तक ही सीमित रहे, तो अच्छा है। बाल्यावस्था से निकलकर किशोरावस्था और किशोरावस्था से लेकर यौवनावस्था तक न जाने कितने स्वप्न बुने जाते रहे। किशोरावस्था में पापा की जेब में रखे मोटे पर्स को देखकर यही सोचा करता था कि पापा अमीर हैं, मेरी ख्वाहिश पूरी करने के लिए पर्स का मुँह खोल देते हैं।
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कल्पनाएँ और इच्छाएँ: बचपन से बुढ़ापे तक का सफर
मेरे अच्छे दिन भी तभी आएँगे, जब मैं पापा बनूंगा और मेरा पर्स नोटों से भरा रहेगा। सिनेमाघरों के रजत पट पर ऐसी फिल्में दिखाई जाती थी कि किशोर और किशोरियां स्वयं की तुलना नायक और नायिका से करने लगते थे। समय से पहले ही बड़ा होने की तमन्ना रहती थी। एक फिल्म में अल्हड़ अभिनेत्री जवानी को आमंत्रण देने के लिए गुहार लगा रही थी, कि मेरे बचपन तू जा, जा जवानी को ले आ, जा रे जा, तेनु रब दा वास्ता।
उस गीत के साथ-साथ दर्शकों में बैठे किशोर भी यही सोच कर खुश हो जाया करते थे, कि जब अभिनेत्री को बचपन जवानी को लाएगा, तो हम भी किशोरावस्था से युवावस्था में पहुँच ही जाएँगे। किसी ने सच ही कहा है कि कल्पनाओं की उड़ान असीम होती है। कब कौन स्वयं को क्या मान बैठे। कल्पनाएँ बुनना बुरी बात नही है। कल्पनाएँ भविष्य का ब्लू प्रिंट होती है।

कल्पनाएँ यथार्थ में बदलती हैं, तो सार्थक होती हैं। फिर भी किसी ने कहा है कि साँसों की सीमा निश्चित है, इच्छाओं का अंत नहां है, जिसकी कोई चाह नहीं हो, ऐसा कोई संत नहां है। इस दृष्टि से जब तक साँस है, तब तक इच्छाएँ पूरी होने की आस है। इन सबके बावजूद भी मन है कि बच्चा बना रहना चाहता है। चाहे बचपन की सीमा लांघते हुए बुढ़ापे तक का स़फर तय कर लें, फिर भी बीते हुए दिनों को कोई मरते दम तक नहीं भूलता।
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