गलगोटिया रोबो प्रकरण ने समूचे देश को शर्मसार कर दिया !

आज एआई, रोबोटिक्स और क्वांटम कंप्यूटिंग जैसे क्षेत्रों में वैश्विक प्रतिस्पर्धा बहुत तेज है। अमेरिका, चीन और यूरोप-अरबों डॉलर शोध में निवेश करके मौलिक तकनीक विकसित कर रहे हैं। ऐसे में यदि भारत केवल जुगाड़ पर निर्भर रहा, तो वह तकनीकी उपभोक्ता बना रहेगा, निर्माता नहीं। गलगोटिया रोबो प्रकरण केवल एक तकनीकी विवाद नहीं, बल्कि एक आईना है। यह हमें दिखाता है कि-क्या हम वास्तव में नवाचार करना चाहते हैं या केवल उसका दिखावा करना चाहते हैं?

देश की राजधानी नई दिल्ली में जारी एआई समिट में हर तरफ गलगोटिया रोबो प्रकरण की ही धूम है। भले इन पंक्तियों के लिखे जाने के समय समिट स्थल में इस प्राइवेट यूनिवर्सिटी की तकनीकी उपस्थिति खत्म कर दी गयी हो लेकिन समिट में मौजूद देशी-विदेशी डेलीगेट्स की जुबान पर इसी की चर्चा है। यह स्वाभाविक ही है गलगोटिया रोबो प्रकरण केवल एक तकनीकी त्रुटि भर नहीं, इसने हमारी नवाचार क्षमता को ही नहीं अपितु संस्कृति को भी शर्मसार कर दिया है। जिस मंच पर भारत को कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई ) और रोबोटिक्स की वैश्विक शक्ति के रूप में प्रस्तुत होना था, वहीं इस घटना ने हमारी तैयारी, ईमानदारी और मौलीकता तीनों पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए।

यह एक प्राइवेट यूनिवर्सिटी का निजी अपराध भर नहीं है और न इसे समिट स्थल से खदेड़ने के बाद एक राष्ट्र के तौर पर जो हमारी छवि को धक्का लगा है, उसमें किसी किस्म की कमी आयेगी, सच तो यह है कि आने वाले सालों-दशकों तक हम इस फजीहत की कीमत चुकाते रहेंगे और प्रतिभा के विश्व मंच पर मजाक का विषय बनाये जाते रहेंगे। इसलिए समिट खत्म होने के बाद, देश की छवि को धक्का पहुंचाने के लिए एक ईमानदार कमेटी के जरिये गलगोटिया यूनिवर्सिटी के अपराध की कड़ी सजा तय की जानी चाहिए ताकि फिर कोई संस्थान जुगाड़ की धोखाधड़ी से देश को शर्मसार न कर सके।

स्वदेशी नवाचार के नाम पर धोखाधड़ी का आरोप

एआई समिट जैसे अंतरराष्ट्रीय महत्व के कार्यक्रमों में विश्वविद्यालयों और संस्थानों को अपने सर्वश्रेष्ठ शोध और तकनीक दिखाने का अवसर मिलता है। गलगोटिया से जुड़े रोबोट के प्रदर्शन से यह उम्मीद थी कि यह भारत की स्वदेशी क्षमता का उदाहरण होगा। लेकिन जब यह सामने आया कि चोरी की करतूत थी तो यह एक तरह से नवाचार का झूठा अभिनय भर नहीं था, जघन्य अपराध था। सरेआम आँखों में धूल झोंकने की धोखाधड़ी थी।

यह वैसा ही था जैसे कोई खिलाड़ी ओलंपिक में किसी दूसरे का पदक चुराकर खुद की जीत का दावा कर दे। यह चोरी आज हमारी नवाचार संस्कृति के खोखलेपन का प्रतीक बन गयी है। भारत आज एआई, सेमीकंडक्टर और रोबोटिक्स में वैश्विक निवेश आकर्षित करने की कोशिश कर रहा है। ऐसे में इस तरह की घटनाएं विदेशी निवेशकों के मन में हमारे प्रति न केवल संदेह पैदा करती हैं बल्कि भारतीय संस्थानों की विश्वसनीयता पर भी प्रश्न चिन्ह लगाती हैं। इससे ऐसी मक्कार यूनिवर्सिटी का कुछ नहीं बिगड़ता लेकिन वास्तविक मेहनत कर रहे वैज्ञानिकों और छात्रों के प्रयासों को नुकसान पहुंचता है। इसे ही कहते हैं एक गंदी मछली पूरे तालाब को गंदा कर देती है।

संसाधन कमी का समाधान बना शॉर्टकट संस्कृति

दरअसल, भारत में जुगाड़ एक शब्द नहीं बल्कि धोखाधड़ी की संस्कृति बनती जा रही है। एक समय था जब जुगाड़ उस किसान की रचनात्मकता से जन्मी थी, जिसने टूटी मशीन को तार और लकड़ी से जोड़कर फिर से चलाया, उस मैकेनिक की सूझ-बूझ में दिखी जिसने सीमित संसाधनों में असंभव को संभव बनाया। लेकिन आज यही जुगाड़, जो कभी संसाधन-कमी की विवशता से पैदा हुआ था, नैतिकता और मौलिकता की सीमा लांघकर शॉर्टकट संस्कृति में बदल गया है।

गलगोटिया रोबो प्रकरण इस संकट का एक प्रतीकात्मक उदाहरण बन गया है -जहाँ जुगाड़ और नवाचार के बीच की रेखा धुंधली हो गयी है। यह घटना केवल एक संस्थान या एक प्रोजेक्ट की नहीं, बल्कि उस व्यापक मानसिकता की ओर संकेत करती है जिसमें हम दूसरे की मेहनत अपना बताने में झिझकने के बजाय स्मार्ट होना समझते हैं। भारत में जुगाड़ का इतिहास औपनिवेशिक और आर्थिक अभाव के दौर से जुड़ा है। जब संसाधन सीमित थे, तब लोगों ने कम लागत में समाधान खोजे। लेकिन आज यह घटना एक व्यापक समस्या की ओर संकेत करती है। भारत में कई संस्थानों में शोध की गुणवत्ता से अधिक ब्रांडिंग पर जोर है।

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गलगोटिया यूनिवर्सिटी रोबो विवाद से नवाचार पर सवाल

एआई और रोबोटिक्स को मार्केटिंग टूल की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है। ऐसे समय में इस तरह की हरकत का मतलब है वास्तविक प्रयोगशाला अनुसंधान और फंडिंग से कन्नी काटना लेकिन श्रेय लूटने में आगे रहना। गलगोटिया रोबो को एक अत्याधुनिक भारतीय एआई रोबोट के रूप में प्रदर्शित किया गया। लेकिन बाद में सामने आया कि उसके कई सॉफ्टवेयर और क्षमताएँ मूल रूप से पहले से उपलब्ध विदेशी ओपन-सोर्स प्लेटफॉर्म या अन्य डेवलपर्स के कोड पर आधारित थीं, जिन्हें पर्याप्त श्रेय दिए बिना स्वदेशी नवाचार के रूप में प्रस्तुत किया गया।

यहाँ दो महत्वपूर्ण प्रश्न उठते हैं – पहला यह कि क्या यह वास्तविक नवाचार था या केवल मौजूदा तकनीक का पुनर्पैकेजिंग करके हम चालाकी से ऐसा साबित करना चाह रहे थे? दूसरा यह कि क्या हम दूसरों की मेधा को अपने जुगाड़ पैकेजिंग दुनिया के सामने छाती ठोंककर प्रस्तुत करने की जहालत कर रहे थे ? कम से कम इतनी बेशर्मी हमें नहीं ही दिखाना चाहिए। यह घटना इसलिए गंभीर है क्योंकि यह केवल तकनीकी गलती नहीं, बल्कि नवाचार की नैतिकता से जुड़ा प्रश्न है और जुगाड़ तथा नवाचार में महत्वपूर्ण अंतर है जुगाड़ तत्काल समस्या का अस्थायी समाधान है जबकि नवाचार किसी समस्या का मौलिक, स्थायी और वैज्ञानिक समाधान है।

जुगाड़ अक्सर काम चलाने के लिए होता है, जबकि नवाचार नई राह बनाने के लिए होता है। यह एक गलगोटिया का कुकृत्य भर नहीं है बल्कि भारत में कई स्टार्टअप्स विदेशी ऐप्स की हूबहू नकल करके उन्हें मौलिक भारतीय समाधान के रूप में पेश किया है। साल 2010-2020 के बीच भारत में लॉन्च हुए दर्जनों ई-कॉमर्स और सोशल मीडिया ऐप्स वास्तव में अमेरिकी या चीनी मॉडल की प्रतिलिपि थे। इनमें से अधिकांश इसीलिये टिक नहीं पाए क्योंकि उनमें मौलिकता का अभाव था।

जुगाड़ संस्कृति से बढ़ा आत्मभ्रम और मौलिकता का संकट

जुगाड़ संस्कृति का सबसे बड़ा नुकसान आत्मभ्रम है। इसकी सफलता से हम यह मानने लगते हैं कि मौजूदा चीजों को जोड़कर प्रस्तुत करना भी नवाचार है। इसी धारणा के चलते हम दूसरे के विचार को अपना बताकर उसे अपनी उपलब्धि के रूप में पेश करने लगते हैं। यह मानसिकता व्यक्ति और समाज दोनों को नुकसान पहुँचाती है। 1990 के दशक में चीन पर भी कॉपी करने वाले देश का ठप्पा लग गया था। लेकिन उसने भारी निवेश करके अपने शोध संस्थान बनाए, वैज्ञानिकों को प्रोत्साहित किया और धीरे-धीरे अपनी मौलिक तकनीक विकसित की। आज पूरी दुनिया चीन का लोहा मानती है।

दूसरी तरफ भारत को दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा स्टार्टअप इकोसिस्टम वाला देश माना जाता है, साल 2025 तक भारत में 1 लाख से अधिक स्टार्टअप पंजीकृत हो चुके थे । लेकिन इनमें से बहुत कम स्टार्टअप डीप टेक या मौलिक तकनीक पर काम करते हैं। इस समस्या की जड़ हमारी शिक्षा प्रणाली में भी है। भारत में प्रोजेक्ट्स में मौलिकता की बजाय कॉपी-पेस्ट आम चलन है । शोधपत्रों में प्लेगियारिज्म के मामले आम बात है। जब छात्र स्तर पर ही मौलिकता को महत्व नहीं मिलता, तो पेशेवर जीवन में भी यही मानसिकता जारी रहती है।

-वीना गौतम
-वीना गौतम

बहुत हो चुका ये सब आज एआई, रोबोटिक्स और क्वांटम कंप्यूटिंग जैसे क्षेत्रों में वैश्विक प्रतिस्पर्धा बहुत तेज है। अमेरिका, चीन और यूरोप-अरबों डॉलर शोध में निवेश करके मौलिक तकनीक विकसित कर रहे हैं। ऐसे में यदि भारत केवल जुगाड़ पर निर्भर रहा, तो वह तकनीकी उपभोक्ता बना रहेगा, निर्माता नहीं। गलगोटिया रोबो प्रकरण केवल एक तकनीकी विवाद नहीं, बल्कि एक आईना है। यह हमें दिखाता है कि-क्या हम वास्तव में नवाचार करना चाहते हैं या केवल उसका दिखावा करना चाहते हैं?

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