बाल यौन शोषण की वैश्विक महामारी और हम!

फ्रांस से हड्डियों को कँपाने वाली वीभत्स खबर आ रही है कि 79 वर्षीय एक पूर्व शिक्षक जैक्स लेव्यूगल को 1967 से 2022 तक के 55 वर्षों में 89 नाबालिग लड़कों (आयु 13 से 17 वर्ष) के साथ जघन्य बलात्कार और यौन उत्पीड़न का आरोपी ठहराया गया है। इतना ही नहीं, उसने अपनी माँ और चाची की दया-हत्याएँ (?) भी कबूल की हैं। ये अपराध नौ देशों – जर्मनी, स्विट्जरलैंड, मोरक्को, नाइजीरिया, अल्जीरिया, फिलीपींस, भारत, कोलंबिया और न्यू कैलेडोनिया – में फैले हुए हैं। अभियोजक एटियेन मांटो ने अंतरराष्ट्रीय अपील जारी कर और भी पीड़ितों या गवाहों से आगे आने की गुहार लगाई है। बेशक, यह मामला न केवल एक व्यक्ति की विकृति का उदाहरण है, बल्कि वैश्विक समाज की संस्थागत कमजोरियों और मनोवैज्ञानिक अँधेरे को उजागर करता है।

आइए, तनिक अपराधी जैक्स लेव्यूगल का मनोविज्ञान समझने की कोशिश की जाए। वह खुद को जेंटलमैन बॉय-लवर कहता था, जो एक क्लासिक पेडोफाइलिक डिसऑर्डर का संकेत है। ऐसे व्यक्ति बचपन की दमित इच्छाओं या ट्रॉमा से ग्रस्त होते हैं, जो वयस्कता में विकृत रूप ले लेती हैं। लेव्यूगल ने 15 खंडों में अपने संस्मरण लिखे, जिनमें पीड़ितों का विस्तृत विवरण है। यह केवल डायरी लेखन नहीं, बल्कि एक मनोवैज्ञानिक रक्षा तंत्र है, जहाँ अपराधी अपनी क्रियाओं को सामान्यीकृत करता है।

सम्मानित भूमिकाओं की आड़ में शिकार तक आसान पहुँच

सीरियल यौन अपराधी अक्सर सामाजिक रूप से सम्मानित भूमिकाएँ चुनते हैं, जैसे शिक्षक या इंस्ट्रक्टर, ताकि वे अपने शिकारों तक आसानी से पहुँच सकें। लेव्यूगल का मामला दिखाता है कि ऐसे अपराधी दशकों तक बचे रह सकते हैं, क्योंकि वे सभ्य मुखौटे के पीछे छिपे होते हैं। मनोवैज्ञानिक रूप से, यह नार्सिसिस्टिक पर्सनैलिटी डिसऑर्डर का भी उदाहरण है, जहाँ अपराधी खुद को पीड़ितों का संरक्षक मानता है, जबकि वास्तव में वह शक्ति का दुरुपयोग करता है। यही वजह है कि बाबाओं और गुरुओं से लेकर कोच, नेता और अभिनेताओं तक में ऐसे रंगे सियार पाए जाते हैं!

गौरतलब है कि लेव्यूगल के अपराध अंतरराष्ट्रीय हैं, जो विकासशील और विकसित दोनों देशों को प्रभावित करते हैं। वह भारत में भी यह घिनौना खेल खेलता रहा – औपनिवेशिक इतिहास और पर्यटन की आड़ में! भारतीय समाज में बाल यौन शोषण की दर पहले से ही चिंताजनक है। एनसीआरबी के अनुसार, 2022 में 63,000 से अधिक पॉक्सो से संबंधित मामले दर्ज हुए! ऐसे में, एक विदेशी यौन अपराधी का भारत में सक्रिय होना हमारी सीमाओं की कमजोरी को इंगित करता है।

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अंतरराष्ट्रीय अपराध में सीमाओं का दुरुपयोग उजागर

याद रहे कि ऐसे अपराध सामाजिक नियंत्रण की कमी से उपजते हैं। संस्थागत विफलताएँ – जैसे छुट्टी कैंपों में पृष्ठभूमि जाँच की कमी, अंतरराष्ट्रीय सहयोग की अनुपस्थिति – अपराधियों को बढ़ावा देती हैं। वैश्विक स्तर पर, यह ट्रांसनेशनल ाढाइम का उदाहरण है, जहाँ अपराधी सीमाओं का फायदा उठाते हैं। अफसोस है कि संदेह से परे समझे जाने वाले शिक्षक और डॉक्टर जैसे विश्वसनीय पेशों को ऐसे मामले कलंकित करते हैं! लेकिन इतना नैतिकता बोध हो तब न?

भारतीय संदर्भ में, यह रिपोर्ट हमें आत्मचिंतन के लिए मजबूर करती है। भारत में बाल यौन शोषण की जड़ें पितृसत्तात्मक संरचना, गरीबी और शिक्षा की कमी में हैं। लेव्यूगल जैसे विदेशी अपराधी तो खैर पर्यटन या शिक्षा की आड़ में प्रवेश करते हैं, लेकिन घरेलू मामले भी कुछ कम नहीं! दुर्भाग्यवश, पीड़ित अक्सर चुप रह जाते हैं, क्योंकि शर्म और डर उन्हें बाँधते हैं – ट्रॉमा बॉन्डिंग! सयानों की मानें तो, हमें जेंडर शिक्षा को मजबूत करना चाहिए, ताकि बच्चे निकटता या अंतरंगता की सीमाओं को समझें। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर, भारत को इंटरपोल जैसे संगठनों से सहयोग बढ़ाना चाहिए। फ्रांस की अपील सिखाती है कि पीड़ितों को आगे आने के लिए सुरक्षित माहौल प्रदान करना जरूरी है।

अंततः, लेव्यूगल का मामला एक चेतावनी भी है कि समाज की उदासीनता से अपराधियों को प्रश्रय मिलता है। असल में, बाल यौन शोषण एक वैश्विक महामारी है, जिसकी जड़ें व्यक्तिगत विकृति से आगे समाज की संरचनाओं में हैं। यदि आप चुप रहे, तो और पीड़ित होंगे। समय है, जागरूकता फैलाएँ, कानून लागू करें और एक सुरक्षित दुनिया बनाएँ!

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