ग्लोबल ऑर्डर भारत के पक्ष में है !
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हालिया कथन – महामारी के बाद का ग्लोबल ऑर्डर भारत के पक्ष में है- को केवल एक राजनीतिक जुमला कहकर टाल देना उचित नहीं होगा। यह कथन उस व्यापक भू-राजनीतिक, आर्थिक और नैतिक पुनर्संरचना की ओर संकेत करता है, जिसकी शुरुआत विश्वमारी कोरोना के बाद हुई। दरअसल, कोरोना ने वैश्वीकरण की पारंपरिक धारणाओं को झकझोर दिया। सप्लाई चेनें टूट गईं। स्वास्थ्य ढाँचे की सीमाएँ उजागर हुईं।
महाशक्तियों के बीच अविश्वास गहराया। इस संकट ने देशों को आत्मनिर्भरता, विश्वसनीय साझेदारियों और बहुपक्षीय सहयोग के नए समीकरण तलाशने को मजबूर किया। इसी संदर्भ में भारत की भूमिका उभरकर सामने आई। वैक्सीन मैत्री पहल के माध्यम से भारत ने दर्जनों देशों को टीके उपलब्ध कराए, जिससे उसकी छवि एक जिम्मेदार और सहानुभूतिपूर्ण शक्ति के रूप में सुदृढ़ हुई।
आर्थिक मोर्चे पर भी बदलाव स्पष्ट हैं। कंपनियाँ चीन-केंद्रित मैन्युफैक्चरिंग ढाँचे से हटकर विविधीकरण की ओर बढ़ रही हैं। चाइना प्लस वन रणनीति ने भारत को एक संभावित विकल्प के रूप में स्थापित किया है। विशाल घरेलू बाजार, युवा जनसंख्या, डिजिटल बुनियादी ढाँचा और नीति-आधारित सुधार – ये सभी मिलकर भारत को निवेश के लिए आकर्षक बनाते हैं। उत्पादन-आधारित प्रोत्साहन (पीएलआई- प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव) योजनाएँ और बुनियादी ढाँचे में निवेश इस लिहाज से बेहद अहम हैं।
अमेरिका-चीन टकराव से बदला भू-राजनीतिक संतुलन
सयाने ध्यान दिला रहे हैं कि इधर भू-राजनीतिक स्तर पर भी संतुलन बदल रहा है। अमेरिका और चीन की डाँडामेड़ी ने हिंद-प्रशांत को केंद्र में ला दिया है। ऐसे में भारत की सामरिक स्थिति और लोकतांत्रिक पहचान हमें विशिष्ट बनाती है। क्वाड में हमारी सक्रिय भागीदारी और जी-20 की अध्यक्षता ने यह दर्शाया कि भारत अब केवल क्षेत्रीय शक्ति नहीं है। बल्कि वैश्विक विमर्श का नेतृत्व करने की क्षमता रखता है। 2023 में नई दिल्ली में आयोजित जी-20 शिखर सम्मेलन ने ग्लोबल साउथ की आवाज़ को प्रमुखता देकर भारत की कूटनीतिक सक्रियता को उजागर किया।
तकनीकी और डिजिटल क्षेत्र में भारत की प्रगति भी इस नए वैश्विक क्रम का महत्वपूर्ण तत्व है। हमने आधार, यूपीआई और डिजिटल मॉडल के रूप में विकासशील देशों के लिए एक वैकल्पिक विकास-पथ प्रस्तुत किया है। भारत का इस मॉडल को पश्चिमी पूँजीवादी ढाँचे और चीनी राज्य-नियंत्रित मॉडल के बीच एक संतुलित विकल्प के रूप में देखा जा रहा है। वैसे, इस कथन को केवल आशावाद के चश्मे से देखना भी शायद उचित न हो।
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अवसरों के साथ खड़ी आंतरिक चुनौतियाँ
याद रखना होगा कि अवसरों के साथ चुनौतियाँ भी जुड़ी होती ही हैं। बेरोजगारी, कौशल-विकास की कमी, मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र की सीमाएँ और सामाजिक असमानताएँ अभी भी गंभीर प्रश्न हैं। यदि भारत को वैश्विक सप्लाई चेनों का प्रमुख केंद्र बनना है, तो उसे श्रम सुधार, न्यायिक दक्षता और नीति-स्थिरता पर निरंतर काम करना होगा। साथ ही, वैश्विक व्यवस्था में अनिश्चितता भी कम नहीं हुई है।
रूस-यूक्रेन युद्ध, पश्चिम एशिया में तनाव और आर्थिक मंदी की आशंकाएँ अंतरराष्ट्रीय परिदृश्य को अस्थिर बनाए हुए हैं। ऐसे में भारत को रणनीतिक स्वायत्तता बनाए रखते हुए संतुलित कूटनीति अपनानी होगी। एक के लिए दूसरे को छोड़ने का रिस्क तो आज के समय में बुद्धिमता नहीं हो सकती न! आशय यह कि प्रधानमंत्री का कथन असल में अवसर-सूचक है, न कि स्वचालित उपलब्धि की घोषणा!
महामारी के बाद विश्व व्यवस्था में जो पुनर्संतुलन हुआ है, उसने भारत को एक विश्वसनीय, लोकतांत्रिक और उभरती आर्थिक शक्ति के रूप में स्थापित होने का मंच दिया है। किंतु, मंच मिलना और उस पर प्रभावी प्रदर्शन करना दो अलग बातें हैं। आज ज़रूरत इस बात की है कि भारत अपनी आंतरिक मजबूती – शिक्षा, स्वास्थ्य, नवाचार और सामाजिक समरसता – को सुदृढ़ करे। भारत को इस अवसर को रणनीतिक दृष्टि और समावेशी विकास के साथ साधना होगा। तभी सचमुच यह कहा जा सकेगा कि महामारी के बाद की वैश्विक व्यवस्था भारत के पक्ष में है।
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