कुटिया महल हो गई

जबसे ख़्वाहिशें कम हो गईं
मेरी दुनिया जन्नत हो गई।

वक्त मिलने लगा लोगों से मिलने का
मेरी छोटी-सी कुटिया महल हो गई।

ना कुछ पाने की ख़ुशी न खोने का ग़म
संवेदनाएं पूर्णता को नज़र हो गईं।

किसी डगर जाऊंगा अब नहीं
ज़िंदगी जब ख़ुद ही मंज़िल हो गई।

पिघल गया वो पत्थर भी आखिर ‘अतुल’
जब उसके म़ाफिक तपन हो गई।।

अतुल कुमार खरे

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