अगला दलाई लामा कौन होगा, यह सवाल हमारी कूटनीति की परीक्षा लेगा?
भारत ने 2003 में तिब्बत पर चीनी संप्रभुता को स्वीकार कर लिया था, लेकिन उत्तराधिकारी के प्रश्न पर यह बात लागू नहीं होती है। इसलिए भारत दलाई लामा को धार्मिक व राजनीतिक आज़ादी देना जारी रख सकता है, बीजिंग को उसके ही शब्द याद दिलाते हुए कि वह दूसरे देशों के आंतरिक मामले में हस्तक्षेप नहीं करेगा। भारत के लिए सबसे आसान रास्ता है कि वह यह कहते हुए कि यह धार्मिक मुद्दा है, राजनीतिक नहीं, उत्तराधिकारी के मुद्दे से दूर रहे। लेकिन तब नई दिल्ली तिब्बती शरणार्थियों के अधिकारों से संबंधित नैतिक प्रश्नों या भारत के विरुद्ध चीनी आक्रामकता को काउंटर करने के लिए घरेलू अपील का कैसे सामना करेगी?
भारत ने सख्ती के साथ चीन के इस दावे को ठुकरा दिया है कि दलाई लामा के उत्तराधिकारी का चयन करने में उसे निर्णायक अधिकार है। भारत ने इस बात पर बल दिया है कि इस मुद्दे पर फैसला केवल तिब्बत के आध्यात्मिक गुरु की इच्छाओं और स्थापित बौद्ध परंपराओं के अनुसार ही हो सकता है। गौरतलब है कि दलाई लामा ने घोषणा की थी कि अपने उत्तराधिकारी पर निर्णय लेने का उन्हें विशिष्ट प्राधिकरण है।
इस पर चीन ने आपत्ति की थी, जिसे भारत ने अनावश्यक हस्तक्षेप कहकर ठुकरा दिया है। संसदीय मामलों व अल्पसंख्यकों के मंत्री किरण रिजीजू के अनुसार, दलाई लामा का पद अति महत्व का है न केवल तिब्बतियों के लिए बल्कि दुनियाभर में उनके लाखों अनुयायियों के लिए भी। अपने उत्तराधिकारी का चयन करने का अधिकार केवल उनका है और वह भी सदियों पुरानी बौद्ध परंपरा के अनुसार।
दलाई लामा उत्तराधिकारी चयन पर चीन असहज
तिब्बती बौद्धों की गेलुग शाखा के 90-वर्षीय आध्यात्मिक गुरु, जो 1959 से भारत में निर्वासन में रह रहे हैं, ने हाल ही में कहा था कि दलाई लामा की संस्था उनकी मृत्यु के बाद भी जारी रहेगी और उनके उत्तराधिकारी का चयन उनके द्वारा स्थापित ग़ैर-मुनाफे वाली गादेन फोड़रंग ट्रस्ट करेगी। इससे पहले दलाई लामा ने कहा था कि उनका उत्तराधिकारी चीन के बाहर रहने वाले उनके समर्थकों में से होगा।
दलाई लामा की यह बात चीन को पसंद नहीं है क्योंकि वह तिब्बत में से अपने किसी वफादार को अगला दलाई लामा बनाना चाहता है। चीन का कहना है , दलाई लामा के पुनर्जन्म को घरेलू पहचान गोल्डन अर्न प्रक्रिया के सिद्धांतों का पालन करना चाहिए और उसे (चीन की) केंद्र सरकार की मंज़ूरी मिलनी चाहिए, धार्मिक परंपराओं व क़ानूनों के अनुसार। तिब्बती जीवन में दलाई लामा का आध्यात्मिक प्राधिकरण बहुत ज़बरदस्त है।
अब जब उनके 90वें जन्मदिन का सप्ताह (30 जून से 6 जुलाई 2025) ज़ोर शोर से धर्मशाला सहित दुनियाभर में मनाया जा रहा है, जिसमें भारत सरकार के प्रतिनिधि भी हिस्सा ले रहे हैं और अगले दलाई लामा के चयन की चर्चा आम हो गई है, जिसके विशाल भू-राजनीतिक प्रभाव संभव हैं, तो इसे लेकर भारत-चीन के कमज़ोर संबंधों पर अतिरिक्त दबाव पड़ता जा रहा है।
15वें दलाई लामा को लेकर चीन की तैयारी
दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय तनाव 2020 के सीमा टकराव से जारी है, जिसमें तनाव की एक परत का इज़ाफा तो उस समय हुआ, जब पहलगाम आतंकी घटना के बाद भारत के ऑपरेशन सिंदूर के दौरान चीन ने पाकिस्तान का खुला समर्थन किया और दूसरी परत दलाई लामा के पुनर्जन्म को लेकर जुड़ गई है, जोकि 15वें दलाई लामा का जन्म होगा। दलाई लामा के पद के महत्व को चीन भी अच्छी तरह से समझता है, इसलिए उसने 14वें दलाई लामा के भारत में 66-वर्ष के निर्वासन के दौरान भी तिब्बती लोगों पर अपना दलाई लामा थोपने का प्रयास नहीं किया है।
बीजिंग इस महत्वपूर्ण तिब्बती संस्था पर कब्ज़ा करने के लिए सही अवसर की प्रतीक्षा कर रहा है। उसे वर्तमान दलाई लामा के निधन का इंतज़ार है। बीजिंग को यह अवसर अपने आप मिल जायेगा अगर पुनर्जन्म के सिद्धांतों के अनुसार चयन के परंपरागत तरीके का पालन किया जाता है। ऐसा इसलिए क्योंकि एक बार जब दलाई लामा का पुनर्जन्म लेने वाले व्यक्ति- जो आमतौर से कम उम्र का लड़का होता है की पहचान कर ली जाती है तो उसे इस ज़िम्मेदार पद के लिए तैयार किया जाता है, जिसमें तकरीबन 20 साल का समय लगता है।
निश्चितरूप से चीन इतने समय तक इंतज़ार करने वाला नहीं है और वह ल्हासा के पोटाला पैलेस पर अपना दलाई लामा थोप देगा। लेकिन वर्तमान दलाई लामा के तरकश में एक महत्वपूर्ण तीर है – वैधता। ध्यान रहे कि वह पहले यह भी कह चुके हैं कि दलाई लामा के चयन का तरीका ‘निःसृत पदार्थ’ भी हो सकता है, जिससे उनके जीवनकाल में ही उनके उत्तराधिकारी के चयन की संभावनाएं खुल सकती थीं, लेकिन अब उनका कहना है कि उनके उत्तराधिकारी की तलाश उनके निधन के बाद की जायेगी।
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दलाई लामा के उत्तराधिकारी पर भारत-चीन टकराव
वैसे दलाई लामा इस बात को लेकर स्पष्ट हैं कि उनका जानशीं चीन के बाहर मुक्त संसार में पैदा होगा। थ्योरी में यह संभव है कि अगले दलाई लामा की पहचान भारत के तवांग में हो, जहां छठे दलाई लामा का जन्म हुआ था। लेकिन इससे भारत-चीन संबंधों में टकराव का एक और बिंदु उत्पन्न हो जायेगा- दोनों देशों में एक-एक दलाई लामा। दलाई लामा पर राजनीतिक टकराव शी जिनपिंग को पसंद आयेगा, जो 2027 चीनी कम्युनिस्ट पार्टी कांग्रेस में अपने कार्यकाल का विस्तार करने की योजना बनाने में लगे हुए हैं।
चूंकि चीन का तिब्बत पर कब्ज़ा है, इसलिए वह मज़बूत स्थिति में हैं। अपनी माचो अपील में वृद्धि करने के लिए बीजिंग का चुना हुआ दलाई लामा थोपना उनके लिए अन्य विकल्पों (मसलन, ताइवान में सैन्य अभियान) की तुलना में आसान व कम खतरनाक है। लेकिन यहां अमेरिका भी खिलाड़ी है। अमेरिकी कांग्रेस ने हाल ही में एक द्विदलीय प्रस्ताव पारित किया जो बीजिंग के किसी भी हस्तक्षेप को ठुकराते हुए इस बात की पुष्टि करता है कि केवल दलाई लामा को ही अपना उत्तराधिकरी चुनने का ह़क है।
समय आने पर भारत व अमेरिका मिलकर दलाई लामा के चयन में सहयोग भी कर सकते हैं। इसका अर्थ है कि भू-राजनीतिक शतरंज के खेल के केंद्र में तिब्बत की वापसी हो जायेगी। यह सही है कि नैतिक दृष्टि से नई दिल्ली को उत्तराधिकारी के प्रश्न पर वर्तमान दलाई लामा के दृष्टिकोण का समर्थन करना चाहिए, जो वह कर भी रही है, जैसा कि किरण रिजीजू के बयान से ज़ाहिर है और चीन के अनुपालन-चयन का विरोध करना चाहिए, लेकिन रणनीति के नज़रिये से यह काफी महंगा सौदा होगा यानी मामला कठिन है।
दलाई लामा पर भारत-चीन की रणनीतिक चुनौती
इस सिलसिले में दो बातों का संज्ञान लेना ज़रूरी है। एक, अगर नीति के तौरपर चीनी चयन को मान्यता दे दी जाये तो उसके क्या लाभ होंगे? ऐसा करने से यह प्रतीत नहीं होता कि चीन से टेरीटोरियल स्वीकृति मिल जायेगी या भारत-चीन तनाव में कमी आयेगी। ध्यान रहे कि गलवान घटना के बाद दोनों पक्षों का कम से कम वार्ता की मेज़ पर आना कठिन प्रक्रिया रही है और इसे पटरी से उतार देना दोनों राजनयिक व सैन्य दृष्टि से घातक होगा।
दूसरा यह कि क्या भारत 14वें दलाई लामा के निर्णयों का समर्थन करने के बावजूद चीन से बातचीत को ट्रैक पर रख सकेगा?यह बात किसी से छुपी हुई नहीं है कि भारत ने दलाई लामा को पूर्ण स्वतंत्रता प्रदान की है कि वह लोगों की भीड़ जमा करें, धर्मशाला में अपने विदेशी अनुयायियों को आमंत्रित करें और विदेशी अधिकारियों से भी मिलें। हां, भारत ने 2003 में तिब्बत पर चीनी संप्रभुता को स्वीकार कर लिया था, लेकिन उत्तराधिकारी के प्रश्न पर यह बात लागू नहीं होती है।

इसलिए भारत दलाई लामा को धार्मिक व राजनीतिक आज़ादी देना जारी रख सकता है, बीजिंग को उसके ही शब्द याद दिलाते हुए कि वह दूसरे देशों के आंतरिक मामले में हस्तक्षेप नहीं करेगा। भारत के लिए सबसे आसान रास्ता है कि वह यह कहते हुए कि यह धार्मिक मुद्दा है राजनीतिक नहीं (जिसके लिए राजनीति या हस्तक्षेप चाहिए), उत्तराधिकारी के मुद्दे से दूर रहे। लेकिन तब नई दिल्ली तिब्बती शरणार्थियों के अधिकारों से संबंधित नैतिक प्रश्नों या भारत के विरुद्ध चीनी आक्रामकता को काउंटर करने के लिए घरेलू अपील का कैसे सामना करेगी?
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