आंशिक युद्धविराम का झुनझुना!
इसे ख़ुशख़बरी तो ज़रूर कहा जा सकता है कि अमेरिका के राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप, यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमिर ज़ेलेंस्की और रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के बीच कूटनीतिक वार्ताओं के बाद 30-दिवसीय आंशिक युद्धविराम पर सहमति बन गई है। लेकिन इसे पर्याप्त नहीं कहा जा सकता। यही वजह है कि इसे लेकर अंतरराष्ट्रीय समुदाय की मिश्रित प्रतिक्रिया बहुत उत्साहजनक प्रतीत नहीं हो रही।
बेशक, किसी भी संघर्ष में हिंसा कम करने की दिशा में उठाया गया कोई भी कदम स्वागतयोग्य होता है। लेकिन इस युद्धविराम की सीमित प्रकृति और राष्ट्रपति पुतिन के आश्वासन के तुरंत बाद हुए उल्लंघन को देखते हुए इस समझौते की प्रभावशीलता और यूक्रेन में दीर्घकालिक शांति की संभावनाओं पर संदेह उठना स्वाभाविक है।
आंशिक युद्धविराम पर संदेह: क्या रूस वाकई गंभीर है?
गौरतलब है कि राष्ट्रपति ट्रंप के हस्तक्षेप से घोषित इस समझौते के तहत यूक्रेन के ऊर्जा और बुनियादी ढाँचे पर हमले तुरंत रोकने का संकल्प किया गया, जिसके बाद एक व्यापक युद्धविराम और अंतत संघर्ष समाप्ति की उम्मीद जताई गई। हालांकि, राष्ट्रपति पुतिन की सहमति केवल ऊर्जा संस्थानों पर हमले रोकने तक सीमित रही और उन्होंने संपूर्ण 30-दिवसीय युद्धविराम का समर्थन नहीं किया।
यह दर्शाता है कि यह समझौता पूर्ण सैन्य गतिविधियों को रोकने में असमर्थ है और अन्य क्षेत्रों में लड़ाई जारी रह सकती है। चिंताजनक रूप से, युद्धविराम घोषित होने के कुछ ही घंटों बाद, रूस ने यूक्रेन के नागरिक ठिकानों पर ड्रोन और मिसाइल हमले किए। ख़ासकर, सुमी में एक अस्पताल पर बमबारी की गई, जिसके बाद राष्ट्रपति ज़ेलेंस्की ने कहा कि पुतिन ने युद्धविराम को प्रभावी रूप से ख़ारिज कर दिया!
इस तरह के हमले न केवल समझौते की भावना के खिलाफ हैं, बल्कि यह भी दर्शाते हैं कि रूस शायद संघर्ष को रोकने के बारे में गंभीर नहीं है! यूरोपीय नेताओं ने इस आंशिक युद्धविराम को लेकर गहरा संदेह व्यक्त किया है। जर्मनी के रक्षा मंत्री बोरिस पिस्टोरियस ने इसे पुतिन की रणनीतिक चाल बताया और इस तथ्य को रेखांकित किया कि नागरिक ठिकानों पर हमले युद्धविराम के बावजूद जारी रहे।
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युद्धविराम या दिखावटी पहल: स्थायी शांति कितनी दूर?
उन्होंने यह भी कहा कि रूस की यह माँग कि पश्चिमी देशों को यूक्रेन को सैन्य सहायता बंद कर देनी चाहिए, पूरी तरह अस्वीकार्य है। न नौ मन तेल होगा, न राधा नाचेगी! कहना न होगा कि इस संघर्ष के समाधान में कई महत्वपूर्ण कारकों को ध्यान में रखना ज़रूरी है। युद्धविराम को केवल ऊर्जा संस्थानों तक सीमित रखने के बजाय सभी सैन्य आाढमणों को रोकने के लिए लागू किया जाना चाहिए।
इससे विश्वास बनाने में मदद मिलेगी और उल्लंघनों की संभावना कम होगी। युद्धविराम के पालन की निगरानी के लिए मजबूत तंत्र विकसित किया जाना चाहिए, जिसमें अंतरराष्ट्रीय पर्यवेक्षक या शांति सेना को तैनात करने जैसे कदम शामिल हों। साथ ही, क्षेत्रीय विवाद, राजनीतिक स्वायत्तता और सुरक्षा चिंताओं जैसे मुद्दों को हल करना बेहद ज़रूरी है।
इसके लिए, सभी पक्षों को शामिल कर समावेशी वार्ता आयोजित करनी होगी। ज़रूरी यह भी है कि वैश्विक समुदाय शांति प्रयासों का समर्थन करे; और यह भी कि समझौते का उल्लंघन करने वाले पक्षों पर दबाव बनाया जाए। इसमें कूटनीतिक बातचीत, मानवीय सहायता और ज़रूरत पड़ने पर प्रतिबंध लगाना भी शामिल हो सकता है।
कुल मिलाकर, यूक्रेन में 30-दिवसीय आंशिक युद्धविराम एक छोटे लेकिन सकारात्मक कदम की तरह प्रतीत होता है। लेकिन इसकी सीमित प्रकृति और इसके तत्काल उल्लंघन से यह भी साफ है कि वास्तविक शांति अभी दूर है। भारत सहित अंतरराष्ट्रीय समुदाय को व्यापक और प्रभावी समझौते की वकालत करनी चाहिए, जो न केवल संघर्ष को रोके बल्कि नागरिकों की सुरक्षा भी सुनिश्चित करे।
केवल निरंतर कूटनीतिक प्रयासों और अटूट वैश्विक समर्थन से ही यूक्रेन में एक न्यायसंगत और स्थायी शांति संभव हो सकती है। फिलहाल तो ऐसा लगता है कि राष्ट्रपति पुतिन ने राष्ट्रपति ट्रंप की ज़िद पर राष्ट्रपति ज़ेलेंस्की के हाथ में झुनझुना पकड़ा दिया है!
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