बीएनपी का उदय : नई सुबह या काला साया ?
बांग्लादेश के हालिया संसदीय चुनाव एक ऐतिहासिक मोड़ साबित हुए हैं। 2024 के जन-विद्रोह के बाद पहले लोकतांत्रिक चुनाव में बांग्लादेश नैशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) ने करिश्माई नेतृत्वकारी तारिक रहमान के नेतृत्व में संसद में दो-तिहाई बहुमत हासिल कर लिया। अवामी लीग को बहिष्कृत करने के बाद, यह जीत बीएनपी की संगठनात्मक ताकत का प्रमाण है। साथ ही, बांग्लादेशी जनता की अवामी शासन के प्रति गहरी निराशा का आईना भी।
बीएनपी की जीत के मूल में 2024 का वह विस्फोटक विद्रोह है, जिसने शेख हसीना की 15 वर्षीय सत्तावादी हुकूमत को उखाड़ फेंका। आर्थिक मंदी, भ्रष्टाचार, बेरोजगारी और युवा पीढ़ी की आकांक्षाओं का दमन – ये वे घाव थे, जिन्हें अवामी लीग ने लांबे समय तक अनदेखा किया। जेन-ज़ी आंदोलन ने न केवल शेख हसीना को निर्वासित किया, बल्कि अंतरिम सरकार के तहत सुधारों की नींव रखी। बीएनपी ने इस असंतोष को चतुराई से भुनाया।
दिसंबर 2025 में 17 वर्षों के लंबे निर्वासन के बाद लंदन से बांग्लादेश लौटे तारिक रहमान ने लोकतंत्र की बहाली और आर्थिक पुनरुत्थान के वादों से जनाधार मज़बूत किया। चुनाव आयोग की रिपोर्ट के अनुसार, मतदान शांतिपूर्ण (?) रहा और 70 प्रतिशत से अधिक मतदाता युवा थे। इससे बीएनपी की प्रगतिशील छवि का पता चलता है। लेकिन यह जीत कितनी परिपूर्ण है, इस बारे में शक होना स्वाभाविक है। इसमें तो दो राय नहीं न कि अवामी लीग की अनुपस्थिति ने राजनीति में खालीपन पैदा किया। इसका बीएनपी को लाभ मिला। यदि अवामी लीग भाग लेती, तो परिणाम अधिक संतुलित हो सकते थे। फिर भी, यह जीत बांग्लादेश के लोकतांत्रिक पुनरागमन का संकेत है, और सैन्य हस्तक्षेप की आशंका कम हुई है।
दक्षिण एशिया में शक्ति-संतुलन पर असर
भू-राजनीतिक दृष्टि से, बीएनपी की सत्ता में वापसी दक्षिण एशिया के शक्ति-संतुलन को हिला सकती है! बांग्लादेश नैशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) का भारत के प्रति रुख ऐतिहासिक रूप से संदेह, विरोध और तनाव भरा रहा है। अवामी लीग के विपरीत, जो भारत के साथ घनिष्ठ संबंधों के लिए जानी जाती है, बीएनपी ने अपनी राजनीति अक्सर भारत-विरोधी और बांग्लादेशी राष्ट्रवाद के इर्द-गिर्द बुनी है। सयाने याद दिला रहे हैं कि ख़ालिदा जिया के कार्यकाल के दौरान भारत के साथ संबंध सबसे निचले स्तर पर थे।
भारत ने आरोप लगाया था कि बीएनपी सरकार ने पूर्वोत्तर भारत के उग्रवादी समूहों को बांग्लादेश में शरण और प्रशिक्षण दिया। 2004 का कुख्यात चिटगांव हथियार तस्करी मामला इसी दौरान हुआ था, जिसका उद्देश्य भारतीय उग्रवादियों को हथियार पहुँचाना था। लेकिन, शेख हसीना के सत्ता से हटने के बाद, बीएनपी ने अपनी छवि सुधारने की कोशिश की है। हालांकि, उनके 2026 के चुनावी घोषणापत्र में फ्रेंड यस, मास्टर नो का नारा दिया गया था, जो भारत के प्रभाव के प्रति उनके पुराने संदेह को ही दर्शाता है। उन्होंने शेख हसीना के भारत में रहने और उनके प्रत्यर्पण की माँग को भी एक बड़ा मुद्दा बनाया है।
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भारत की बधाई और नए रिश्तों की शुरुआत
भारत सरकार ने तारिक रहमान को बधाई दी है, जो रिश्तों में एक नए अध्याय की शुरूआत का संकेत हो सकता है। देखना होगा कि यह कूटनैतिक शिष्टाचार आगे किस तरह फलित होता है। इसे उम्मीद की किरण कहा जा सकता है कि तारिक रहमान कहते रहे हैं कि क्षेत्रीय स्थिरता के लिए भारत के साथ सहयोग प्राथमिकता होगी। लेकिन खतरा भी है, क्योंकि बीएनपी के सहयोगी जमात-ए-इस्लामी जैसे इस्लामी दलों का उदय अल्पसंख्यक हिंदुओं (बांग्लादेश की 8 प्रतिशत आबादी) पर दबाव बढ़ा सकता है, जो सीधे भारत की चिंता का विषय है।
यदि बीएनपी इस्लामीकरण को रोकने में विफल रहती है, तो पूर्वोत्तर भारत में अलगाववादी तत्व सक्रिय हो सकते हैं! बेशक, भारत-बांग्लादेश रिश्तों के भविष्य को आकार देने के लिए यह जीत सुनहरा अवसर है। जल-विवाद पर अब वार्ता के द्वार खुल सकते हैं, क्योंकि बीएनपी ने साझा संसाधन प्रबंधन का वादा किया है।
कूटनीतिक स्तर पर, नई दिल्ली को तारिक रहमान से ट्रस्ट बिल्डिंग मीटिंग आयोजित करनी चाहिए, जिसमें रोहिंग्या पुनर्वास और आतंकवाद-रोधी सहयोग पर फोकस हो। लेकिन सतर्कता ज़रूरी है, क्योंकि यदि बीएनपी आंतरिक अस्थिरता में फँसती है, तो चीन-पाकिस्तान का काला साया खालीपन को भरने को बेताब बैठा है न! भारत को नेबरहुड फर्स्ट नीति के तहत आर्थिक सहायता बढ़ाने पर भी विचार करना चाहिए और कोशिश करनी चाहिए कि टकराव का नया दौर शुरू न हो!
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