हमेशा जिंदा रहेगी सदाबहार ‘ही-मैन’ की मुस्कान

चौबीस नवंबर, 2025 की सुबह भारतीय सिनेमा के आकाश का एक चमकदार सितारा सदा-सदा के लिए दिव्य प्रकाश में विलीन हो गया! दिलों को गर्माहट देने वाली मुस्कान, भावनाओं को पारदर्शी बना देने वाली सादगी और वीरता को सहजता से जी लेने वाली शैली – धर्मेंद्र अब स्मृतियों का हिस्सा हैं! पर सच तो यह है कि ऐसे कलाकार कभी जाते नहीं; वे अपने दर्शकों की धड़कनों में, परदे पर जीवित कर दिए गए चरित्रों में और उन गीतों व संवादों में बसे रहते हैं, जिन्हें पीढ़ियाँ गुनगुनाती हैं!

सयाने याद दिला रहे हैं कि धर्मेंद्र के फिल्मी सफ़र की शुरुआत संघर्ष से हुई, लेकिन जल्दी ही उन्होंने साबित कर दिया कि ईमानदार मेहनत और सहज अभिनय किसी भी चुनौती को जब तक तोड़ न दूँ, तब तक छोड़ूँगा नहीं जैसा साहस दे सकते हैं। सिनेमा के स्वर्णिम युग में, जब परदे पर रोमांस और ऐक्शन दोनों ही चरम पर थे, धर्मेंद्र वह पुल बनकर उभरे जो दिल और दिमाग को एक साथ जोड़ देता है।

चुपके चुपके में मासूम हास्य और हल्के-फुल्के अभिनय का जादू

एक ओर जहाँ फूल और पत्थर ने उन्हें स्टार बना दिया, वहीं सत्यकाम ने यह सिद्ध कर दिया कि वे केवल आकर्षक व्यक्तित्व या ऐक्शन हीरो नहीं, बल्कि गहराई से भरपूर अभिनेता भी हैं। सत्यप्रेम, आदर्शवाद और आंतरिक संघर्ष को अपने अभिनय से साकार करते हुए धर्मेंद्र ने जितनी संवेदनशीलता दिखाई, वह आज भी हिंदी सिनेमा के सर्वोत्तम प्रदर्शनों में गिनी जाती है।हँसोड़, हल्के-फुल्के अभिनय की बात करें तो हृषिकेश मुखर्जी की कालजयी फिल्म चुपके चुपके में धर्मेंद्र का अभिनय एक अलग ही दुनिया रच देता है।

बॉटनी के प्रोफेसर बनकर उनकी मासूम शरारतें शायद हिंदी सिनेमा का सबसे प्यारा हास्य बन चुकी हैं। धर्मेंद्र ने अपनी कई फिल्मों में पारिवारिक रिश्तों और भावनाओं को इस तरह जिया कि वे दर्शकों के दिलों में अमर हो गईं। उनकी फिल्म दोस्त दोस्ती और वफादारी की भावनाओं को दिखाती है, तो रखवाला बलिदान और पारिवारिक बंधन को दर्शाती है। यमला पगला दीवाना में उन्होंने अपने असली बेटों सनी देओल और बॉबी देओल के साथ काम किया, जो एक मजेदार पारिवारिक फिल्म है।

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शोले से ग्रामीण संवेदना तक—धर्मेंद्र की बहुआयामी भावनाएँ

शोले में उनकी बहुरंगी अदाकारी ने भारतीय दर्शकों की भावनाओं को जितनी तीव्रता से छुआ, उतना कम ही फिल्में कर पाती हैं। कहना न होगा कि धर्मेंद्र की आत्मीयता, उनका मानवीय पक्ष और उनकी मिट्टी की खुशबू – ये तीनों उनके जीवन-मंत्र थे।गौरतलब है कि भले ही धर्मेंद्र को बतौर ही-मैन देखा गया, लेकिन उनकी असली ताकत उनके हृदय की कोमलता में थी। चाहे परदे पर हों या जीवन में, वे भारतीय ग्रामीण संवेदना, भाईचारे और प्रेम की मिट्टी से जुड़े रहे।

वे ऐसे नायक थे जिनके भीतर किसान जीवन की सादगी, पंजाब की ऊर्जा और एक आम भारतीय की संवेदनशीलता एक साथ धड़कती थीं। धर्मेंद्र को चिर विदा देते हुए यह कहना ज़रूरी है कि वे हिंदी सिनेमा के प्रेमियों के दिलों में अपनी 300 फिल्मों और अनगिनत कालजयी गीतों और संवादों के रूप में सदा-सर्वदा जीवंत और प्रासंगिक बने रहेंगे।

पल-पल दिल के पास (ब्लैकमेल), ड्रीम गर्ल किसी शायर की गज़ल (ड्रीम गर्ल), कोई हसीना जब रूठ जाती है तो, ये दोस्ती हम नहीं तोड़ेंगे (शोले), मेरे दुश्मन (आए दिन बहार के), काजल वाले नैन मिला के, आया है मुझे फिर याद वो ज़ालिम गुज़रा ज़माना बचपन का (देवर) और झिल मिल सितारों का आँगन होगा (जीवन मृत्यु) आज मौसम बड़ा बेईमान है बड़ा, बेईमान है आज मौसम (लोफर) मैं जट यमला पगला दीवाना (प्रतिज्ञा) जैसे गीतों के माध्यम से वे युगों तक मानवीय संवेदनाओं को गुदगुदाते रहेंगे; क्योंकि कला की दुनिया में मृत्यु अंत नहीं है! बस इतना और कि…

गाड़ी बुला रही है, सीटी बजा रही है;
चलना ही ज़िंदगी है, चलती ही जा रही है।

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